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नागा लोककथाःमूस की मज़दूरी
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रामनंदन |
बहुत
समय पहले की बात है । उस समय आदमी के पास धान नहीं था ।
सबसे पहले आदमी ने धान का पौधा एक पोखरी के बीच में देखा ।
धान की बालियाँ झूम-झूमकर जैसे आदमी को बुला रही थीं । पर
गहरे पानी के कारण धान तक पहुँचना कठिन था ।
आदमी
सोचता हुआ खड़ा ही था कि वहीं पर एक मूस दिखलाई पड़ा ।
आदमी ने मूस का पास बुलाया और कहा
–
मूस भाई,
पोखरी के बीच में देखो उन धान की प्यारी बालियों को
झूम-झूम कर वे मुझे बुला रही हैं लेकिन पानी गहरा है । यदि
तुम उन्हें हमारे लिए ला दो, तो हम तुम्हें मेहनताने का
हिस्सा दे देंगे ।
मूस को भला
क्या एतराज़ था !
वह सरसर तैर गया और बालियों को दाँतो
से कुतर-कुतर कर किनारे पर लाने लगा । थोड़ी-ही देर में
किनारे पर धान की बालियों का ढेर बन गया ।
तब
आदमी ने प्रसन्न होकर कहा
– मूस
भाई, अब इसमें से अपन मज़दूरी का हिस्सा तुम स्वयँ ले लो ।
पर
मूस ने कहा –
भाई मेरे, मैं ठहरा छोटा जीव । मेरा सिर भी है छोटा । अपना
हिस्सा इस छोटे से सिर पर ढोकर कैसे ले जाऊँगा ?
इसलिए अच्छा तो यह होगा कि तुम यह पूरा
धान अपने घर ले जाओ और मैं तुम्हारे घर पर ही आकर अपने
हिस्से का थोड़ा धान खा लिया करूँगा ।
आदमी
ने ऐसा ही किया और तभी से मूस आदमी के घर धान खाता चला आ
रहा है ।