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कुम्भ : जन, जल और आस्था |
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प.विद्यानिवास मिश्र |
हमारे
देश में सन्तों को जंगम तीर्थ कहा गया है, उन्के समागम को
तुलसीदास ने..मुदमंगलमय....तीरथराजू कहा है। यह समागम अगर
देशकाल की
विशेष बिन्दु पर हो तो फिर क्या कहना । इस देश
की संस्कृति के दो पक्ष हैं, एक तो है, सनातन सत्य का
उद्-घोष करने वाले शास्त्र और दूसरा है, उस शास्त्र की
अनुभूति के द्वारा परीक्षा करने वाला और सनातन सत्य को
जीने वाला परिग्रहहीन, गृहहीन सन्त समुदाय, ऐसे लोगों का
समुदाय जो व्यक्ति के रूप में भर चुके हैं, देह के रूप
में शव होते हैं, वे केवल समुदाय और समुदाय के भाव होते
हैं। ये सन्त और कुछ नहीं बटोरते, व्यक्ति, मन की पीड़ा
बटोरते हैं, एक स्थान से बँधे नहीं होते, इसलिये प्रत्येक
स्थान इनका होता है, अपनी निजता खोकर ये सबके हो जाते हैं।
ऐसे सन्तों की साधना के भी रास्ते अलग-अलग होते हैं और
उनका सम्मिलन विभिन्न अनुभूतियों का सम्वाद एक विचित्र
अवसर होता है, एक होने के लिये। एकता का अनुभव साधना के
विभिन्न सोपानों के एक गन्तव्य का दर्शन ही तो
है। कुम्भपर्व का एक बड़ा लक्ष्य एकता का दर्शन है ।
यह एकता कोई ठोस जड़ या सिर्ध पदार्थ नहीं, यह एकता भी एक तरल प्रक्रिया है, बर्फ और जल
एक है, यह पहचान बर्फ के पिघलने पर ही तो होती है। विभिन्न
साधनाओं से गुजरे हुए सन्त जब एक-दूसरे के प्रति विनम्र
होकर, द्रवीभूत होकर एक-दूसरे को अनुभव निवेदन करते हैं तो
एकता की प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रक्रिया हो जाती है।
यह दूसरी बात है-कि इतना ऊँचा आदर्श नहीं निभता, बहुत
जल्दी सीधा रास्ता भी आडम्बर हो जाता है, अपरिग्रह संग्रह
बन जाता है, अकिंचन भाव पूजा जाकर ऐश्वर्य का केन्द्र बन
जाता है, पर इस विकृति के कारण सन्तों के द्वारा भारतीय
समाज को गतिशील बनाये रखने की प्रक्रिया को झुठलाया कैसे
जाये। आज भी इस संस्कृति में जो फकीर या निःस्व होकर,
व्यक्ति के लिये सम्मान है, वह भोग के उपर नियन्त्रण तो
रखता ही है। महाकुम्भों के अवसर पर इतने असंख्य सन्तों के
बीच में रहने का एक अर्थ है यह अनुभव कि निःस्व होकर, निजता
खोकर ही एक हुआ जाता है जीवन के विशाल प्रवाह से । एक
दूसरा अर्थ भी है, विभिन्न सम्प्रदायों की उपासना पद्धतियों
में एक ही भाव का उद्वेलन देखना, विरोध न देखना, एक परस्पर
पूरकता देखना । बाहरी लक्षणों से ही सन्त नहीं जाने जाते,
जो परमहंस होते हैं, उनके कोई चिन्ह नहीं होते, सिवाय एक
सहज मस्ती के, एक बालक जैसी सरलता के, एक माँ जैसी
वत्सलता
के । वे भी महाकुम्भ में अपने को जलबिन्दु बनाने आते हैं,
उन्हें ढूँढों । उन्हें ढूँढ़ने के लिये प्रत्येक मनुष्य
में उस मस्ती को ढूँढ़ो, उस बालक जैसी कुतूहलवृत्ति को
ढूँढ़ो और उस माँ की विह्वलता को ढूँढ़ों जब यह ढूँढ़ना
शुरू करोगे तो तुम्हें लगेगा कि वह परमहंस सूर्य नहीं है,
वह किरण बन गया है, तुम्हारी दृष्टि में, तुम्हारे मन में
वह धूप की तरह पसर गया है । पर पहले कुछ पाने की इच्छा न
रखो, बस अपने को डाल दो उस धूप में, दाने की तरह, देखोगे
तुम अंकुर बनकर उठते हो कि नहीं ।
कुम्भ हमारी संस्कृति में कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण
है। पूर्णताः प्राप्त करना हमारा लक्ष्य है, पूर्णता का
अर्थ है समग्र जीवन के सात एकता, अंग को पूरे अंगी की
प्रतिस्मृति, एक टुकड़े के रूप में होते हुए अपने समूचे
रूप का ध्यान करके अपने छुटपन से मुक्त । इस पूर्णता की
अभिव्यक्ति है पूर्ण कुम्भ। अथर्ववेद में एक कालसूक्त है,
जिसमें काल की महिमा गायी गयी है, उसी के अन्दर
एक मन्त्र
है, जहाँ शायद पूर्ण कुम्भ शब्द का प्रयोग मिलता है, वह
मन्त्र इस प्रकार है-
पूर्णः
कुम्भोधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो जगत्
ता इमा विश्वा
भुवनानि प्रत्यङ् बहुधा नु सन्तः
कालं तमाहु,
परमे व्योमन् ।
इसका मोटा अर्थ है, पूर्ण कुम्भ काल में रखा हुआ है, हम
उसे देखते हैं तो जितने भी अलग-अलग गोचर भाव हैं, उन सबमें
उसी की अभिव्यक्ति पाते हैं, जो काल परम व्योम में है।
अनन्त और अन्त वाला काल दो नहीं एक हैं; पूर्ण कुम्भ दोनों
को भरने वाला है। पुराणों में अमृत-मन्थन की कथा आती है,
उसका भी अभिप्राय यही है कि अन्तर को समस्त सृष्टि के
अलग-अलग तत्त्व मथते हैं तो अमृतकलश उद्भूत होता है, अमृत
की चाह देवता, असुर सबको है, इस अमृतकलश को जगह-जगह
देवगुरु वृहस्पति द्वारा अलग-अलग काल-बिन्दुओं पर रखा गया,
वे जगहें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक हैं, जहाँ
उन्ही काल-बिन्दुओं पर कुम्भ पर्व बारह-बारह वर्षों के
अन्तराल पर आता है बारह वर्ष का फेरा वृहस्पति के राशि
मण्डल में धूम आने का फेरा है। वृहस्पति वाक् के देवता हैं
मन्त्र के, अर्थ के, ध्यान के देवता हैं, वे देवताओं के
प्रतिष्ठापक हैं । यह अमृत वस्तुतः कोई द्रव पदार्थ नहीं
है, यह मृत न होने का जीवन की आकांक्षा से पूर्ण होने का
भाव है। देवता अमर हैं, इसका अर्थ इतना ही है कि उनमें
जीवन की अक्षय भावना है। चारों महाकुम्भ उस अमृत भाव को
प्राप्त करने के पर्व हैं।
ये कुम्भ पर्व इसका स्मरण दिलाते हैं कि तुम्हारा अधूरापन
जब तक रहता है, तुम्हारी विच्छिन्नता जब तक रहती है,
तुम्हारा अपने से भिन्न के प्रति अलगाव जब तक रहता है, तब
तक तुम मृत्यु के भय से ग्रस्त हो। जब तुम सोच लेते हो यह
सब-कुछ मैं हूँ, मुझमें ही सब-कुछ है, मैं पूर्ण कुम्भ
हूँ, जिसमें काल है और काल में
है, तब मृत्यु घेरा नहीं रह जाती, वह पड़ाव बन जाती है, वह
वैदिक ऋषियों के शब्दों में यज्ञ-समाप्ति का स्नान बन जाती
है। कुम्भ स्नान में यही स्मरण कहीं न कहीं अन्तर्निहित है
कि हम अमुक के रूप में विलीन हो रहे हैं, हम जल के भीतर से
सम्पूर्ण बनकर निकल रहे हैं, जीवन के भाव से भरकर, अमृत
होकर, अमृत सन्तान होकर। हमें यह न भूलना चाहिए कि अमृत
विष का सगा भाई है। हम अहंकार मन्थन करते हैं तो पहले विष ही निकलता है, वह कम
लुभावना नहीं होता। जीने की एक लालसा ऐसी भी होती है जब हम
अपने लिये ही जीवन का समस्त उपभोग चाहते हैं, वह लालसा विष
है । जिस जीवन की लालसा अमृत है, उसमें जीना अपने लिये, भोग
अपने लिये नहीं, सबके लिये है, दूसरे से बचे तो अपने लिये
है, परम अमृत है उच्छिष्ट भाव, सबका जूठन बन जाना, सृष्टि
मात्र को निवेदित होकर बच जाना, वही भाव सार्थक अस्तित्व
है । पूर्ण से पूर्णको उलीच देने पर जो बचता है वह
पूर्णातर है।
कुम्भ शब्द का एक अर्थ है रोकना, प्रणों के नियमन को
कुम्भक कहते हैं, प्राणायाम के तीन हिस्से होते हैं, पूरक,
साँस भरना, कुम्भक, साँस रोकना, रेचक, साँस छोड़ना। बीच
में है कुम्भक। यह शरीर भी एक कुम्भ है, घर है, इसमें
प्राणों का प्रवाह है, पर जब हम प्राणों को रोककर पूरे शरीर
को प्राणमय बनाते हैं तो यह घर पूर्ण हो जाता है, पर पूर्ण
बने रहने में क्या रखा है, खाली हो होकर पूर्ण होने के
लिये आकुल होना, यही वास्तविक पूर्णता है।
कुम्भ पर्व
साँसों का मेला है, साँसों का त्योहार है। कितनी लाख-लाख
साँसे एक-दूसरे से मिलती हैं, कितनी साँसे भरती हैं,
कितनी साँसें खाली होती
हैं, कितना उच्छ्वास होता है, आज गंगा-स्नान हुआ,
कितनानिःश्वास होता है, जीवन हमने कितना खोया,किन व्यर्थ
प्रपंचों में हमने अपनी साँस गँवाई, असंख्य-असंख्य लोगों
के भीतर रहते हुए, विशाल महासागर की लहर के रूप में अपने
को अनुभव करते हुए कितनी विशालता का बोध होता है
और यही कभी अपने साथ के लोगों से बिछुड़ने पर
कितनी असहायता, कितनी विपन्नता का बोध होता है। यह पूरक,
यह रेचक, वह कुम्भक सभी महाकुम्भ का ही एक रूप है।
कुम्भ को इस रूप में लेना और अपने शरीर के भीतर कुम्भ को
देखना एक सहज भाव उमड़ाता है, जो ब्रम्हाण्ड
में है, वही पिण्ड में है, जो इस पिण्ड में है, वही
ब्रह्माण्ड में है । इस भाव के उमड़ने से देह के प्रति एक
दूसरी तरह की भावना हो जाती है, यह साधनधाम है, पर
कंचन-काया है, हम खामखाह इसे अपदार्थ माने हुए हैं। इस देह
को साधने की जरूरत है, इस देह को इन्द्रियों के साथ, मन के
साथ, बुद्धि के साथ और आत्मा के साथ जोड़ने की जरूरत है। इस देह को कमल के रूप
में देखने की जरूरत है, ऐसे कमल के रूप में, जिसका नाल
जितना जल के ऊपर है उतना जल के भीतर है, जिसकी पुरइन रूपी
चिति पर पानी की बूँदें आती हैं ढुलक जाती हैं, टिकती
नहीं, जिसके कोष में से स्त्रष्टा निकलते हैं। प्रत्येक
व्यक्ति केवल घड़ा ही नहीं है, वह घड़े के साथ-साथ उस पर
रखा गया पंचपल्लव है, पूरण पात्र है, पूर्ण पात्र पर रखा
गया दीप है, बाहर गोंठी गयी रचना है, उस रचना में खोंसा
गया जौ है और जौ का अंकुर रूपान्तर है। दूसरे शब्दों में
वह एक छोटा विश्व है जो जैसा है, वैसा ही रहना नहीं चाहता,
वह उगना चाहता है, वह आलोकित करना चाहता है, यह भाव भरने
की जरूरत है।
ऐसे कुम्भ से जब जल सींचा जाता है तो अभिवृद्धि होती है।
यही आस्था का जल के रूप में निष्पन्द है। कुम्भ
पर्व
मनुष्य को आस्था में अभिषिक्त करने के लिये तो है ही, वह
मनुष्य को अभिषेक का द्रव बनाने के लिये भी है। द्रव के
सम्पर्क से द्रव नहीं बनता, तप के सम्पर्क से द्रव बनता
है, इसीलिये उस तप की भावना का स्मरण ऐसे पर्व के अवसर पर
आवश्यक है, जिसने गंगा को द्रवित किया, जिसने गंगा को
सर्वजन कल्याण के लिये उन्मोचित किया, जिसने गंगा के
किनारे तप करके इसकी धारा को संस्कृति की मुख्य धारा बनाया।
तपोवन-आस्थातप के बिना, जीवन के कठिन निर्वाह के बिना, जड़
होती है इस महाकुम्भ पर बार-बार याद करें, तभी आप. मंगलमय
कुम्भाभिषेक के अधिकारी होंगे।