
माँ
एक ममतालु तरलता है, माँ एक वत्सल ऋजुता है, माँ एक
स्नेहिल स्निग्धता है, माँ एक करुणामय आर्द्रता है- इन
सारे वाक्यांशों के माध्यम से माँ का एक झीना-सा आभास मिल
सकता है;
लेकिन फिर भी ये सारे वाक्यांश मिलकर अलग-अलग रहते, या इन
जैसे अनन्त कथन मिलकर भी वस्तुतः माँ को सही-सही
निरुपित नहीं कर पाते । हाँ, इनके माध्यम से
माँ की एक
हल्की-सी आहट जरुर मिल जाती है ।
पद्मपुराण में लंका से लौटने के बाद राम के जीवन-वृत्त का
जितना विस्तार से वर्णन है, शायद अन्यत्र कहीं रामकथा का
वह पक्ष उतने विस्तार से नहीं दिया गया है । उसी पद्मपुराण
के पातालखंड में एक प्रसंग हैः
राम का एक
गुप्तचर प्रजा का हालचाल जानने के लिए विचरण कर रहा है ।
वह देखता है कि एक भवन में एक तरुणी अपने बच्चे को स्तनपान
करा रही है । शिशु किसी कारण से स्तन मूँह में नहीं ले रहा
है
–
बार-बार उसे मूंह में लेकर छोड़ देता है ।
माँ उसे सम्बोधित
कर बड़े आग्रह करती है-
‘मेरा
मीठा दूध पी ले मेरे बेटे!
मेरा मन भी तुझे छककर दूध पिलाने का है । क्या तुझे मालूम
नहीं कि हम रामराज्य में हैं
? हमारी
मुक्ति निश्चित है ।
अब न मुझे माँ के रुप में जनमना है और
न तुझे बेटे के रुप में ।
कैसा दुर्भाग्य है
! माँ
का दूध दुबारा पाना रामराज्य में रहने वालों के भाग्य में
नहीं होता । इसलिए इस
माँ के दुर्लभ दूध को तू बारम्बार पी
ले मेरे लाल
!’ यह
कहते-कहते उस
माँ का कन्ठावरोध हो जाता है । भगवान राम को
यह संवाद देते हुएक गुप्तचर की आँखें भी आर्द्र हो आती हैं
और राजीव-लोचन राम के नेत्र भी तरल हो आते हैं ।
भारतीय जीवन में सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि आवागमन से
मुक्ति को माना गया है । उसकी तुलना में भी अधिक सुखद एवं
श्रेयस्कर लगता है एक
माँ को अपने बैटे को दूध पिलाना ।
उसे इसका खेद है कि मुक्ति के चलते उसे अपने बेटे को
बारम्बार दूध पिलाने का अवसर उपलब्ध नहीं होगा । अपनी
संतति के स्नेह-दुलार, उसकी ममता और क्षेम-कामना में
रसी-बसी यह
माँ केवल माँ है ।
मैक्सिम गोर्की
की रुसी माँ हो, पर्ल बक की चीनी
माँ हो, मेरी कारेली की
फ्रांसीसी
माँ हो, ग्राजिया देलेद्दा की इतालवी
माँ हो;
रोमाँ रोलाँ की लम्बी कहानी की माँ हो, गेम्स जायस की
कहानी की माँ हो, विश्वंभर शर्मा कौशिक की माँ हो,
अन्नपूर्णा भट्टाचार्य की बंगला
माँ हो या
‘श्यामची
आई’
की मरीठी माँ हो - वह माँ केवल माँ ही है ।
किञ्चित्कुञ्चितलोचनस्य पिबतः पर्याप्तमेकं स्तनं
सद्यः
प्रस्त्रुतदुग्धबिन्दुमपरं हस्तेन संमार्जतः ।
मात्रै
काग्ङगुलिलालितस्य चिबुके स्मेराननस्यानना-
च्छौरेः
क्षीरकरावलीव पतिता दन्तद्युतिः पातु वः।।
-जब शिशु
श्रीकृष्ण आँखों को थोड़ा मूँदकर माता यशोदा के एक स्तन
का दूध छककर पी चुके, तब अत्यन्त वत्सला
माँ के दूसरे स्तन
से दूध की धार बह निकली । उसके बिंदू के गिरते ही
श्रीकृष्ण ने झट से अपने हाथ से दूसरे स्तन की दूग्ध धार
को पोंछा और स्वाभाविक रुप से माता यशोदा की एक उंगली शिशु
के चिबुक को नेह से सहलाने लगी । उस समय क्षीर-कणिका के
समान खिलती हुई श्रीकृष्ण की दन्तकांति आपकी रक्षा करे।
भविष्य में
बेटे को दूध न पिला सकने की आशंका से पीडि़त
रामराज्य-वासिनी
माँ के दर्द की तुलना इस आशीर्वचन की
माँ
यशोदा के सौभाग्य से करें । अज्ञातनामा प्राकृत कवि
गौरवर्णा स्थूलकाय यशोदा के सौभाग्य की सराहना करता हुआ
कहता है-‘री
बड़-भागिन यशोदा
! किसे
पता था कि श्रीकृष्ण की नन्ही-नन्ही श्याम हथेलियों में
संभला हुआ तेरा यह पीन पयोधर उसकी इतनी बड़ी विवशता बन
जायेगा कि वह महाभारत के युद्ध में भी पांचजन्य बनकर उसके
मुँह से लगा रहेगा ।’
कितना बड़ा कैन्वास है इस छन्द का
!
सामान्यतः यह कहा भी जाता है कि बेटे के पराक्रम में
माँ
का दूध ही बोलता है; या
पराभूत होने पर उसे छठी का दूध याद आने की बात कही जाती है
।
वही बड़भागिन यशोदा कृष्ण मथुरा-प्रवास के बाद कलपती है ।
ममता की मारी जसुमति देवकी को संदेश भिजवाती हैः
संदेसी देवकी
सो कहियो ।
हौं तो धाय
तिहारे सुत की मया करत नित रहियों ।
जदपि देव तुम
जानत उसकी तदपि मोहि कही आवै,
प्रातः उठत
तुम्हारे कान्ह को माखन-रोटी भावै ।
तेल-उबटनौ अरु
तातो जल देखि-देखि भजि जावै,
जोई-जोई माँगत
सोई-सोई देती ज्यों-त्यों करि-करि न्हावै।
सूर स्याम सोहि
यहै रैन-दिन बढ़यौ रहत उर सोच,
मेरो अलक
लड़ैतो मोहन ह्वै है करत सकोच ।।
बात उन दिनों की है जब गुप्तचरी करने वाले अमरीकी यू-2
हवाई जहाज को रुस ने मार गिराया था । जहाज का चालक गैरी
पावर्स गिरफ्तार कर लिया गया था । तत्कालीन रुसी प्रधान–मन्त्री
ख्रुश्चोव ने संसार के प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं को आमन्त्रित
किया था और उनकी उपस्थिति में गैरी पावर्स पर मुकद्दमा चलाया गया था । उस मुकद्दमें में गैरी पावर्स के माता-पिता
भी सादर बुलाये गये थे । मुकद्दमे के फलस्वरुप गैरी पावर्स
को दस साल की सजा सुनायी गयी । गैरी पावर्स की
माँ भी
अदालत में उपस्थित थी । सजा सुनकर मुर्छित-सी होकर गिरने
को हुई । एक रुसी नौजवान ने उसे सहारा दिया । इस पर उस
माँ
ने साश्चर्य पूछा-
‘तुम
मुझे सहारा दे रहे हो । तुम तो रुसी नौजवान हो
!’ इस
पर उस रुसी नौजवान ने उत्तर दिया-
‘इससे
क्या हुआ
! मेरे
निकट यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप अमरीकी हैं और में रुसी
हूँ । आप माँ हैं, यही मेरे लिए बहुत है ।’
अपने बच्चों के बीच रोज-रोज के छोटे-मोटे विवादों में सहज
ही सुख लेती हूई
माँ पार्वती की यह छबि हमारे-आपके घरों
में रसी-बसी
माँ से क्या कुछ भिन्न है
?
हे हेरम्ब
किमम्ब रोदिसि कथं करर्गौ लुठत्यग्निभूः
किं ते स्कन्द
विचेष्टितं मम पुरा संख्याकृता चक्षुषाम् ।
नैतत्तेप्युचितं गजास्य चरितं नासां मिमीतेम्ब मे
तावेवं सहस
विलोक्य हस्तिव्यग्रा शिवा पातु वः ।।
-है गणेश
! तू
क्यों रो रहा है
? षडानन
(कार्तिकेय) ने मेरे कान खींच दिये । क्यों रे स्कन्द, यह
शरारत क्यों की
! यह जो
मेरी आँखे गिनकर मुझे चिढ़ा रहा था
! गणेश
! यह
तुम्हारी हरकत तो उचित नहीं है । यह
भी तो मेरी नाक की
लम्बाई नाप रहा था । इस पर सहसा ठठाकर हँसती हुई पार्वती
रक्षा करे ।
सुप्रसिद्ध सन्त बायजीद ने शांति और अध्यात्मपिपासा की
तुप्ति के लिए गृह-त्याग कर दिया था । उन्हें मालूम हुआ,
उनकी माँ ने रोते-रोते अपनी द्दष्टि खो दी है । वे लौट आये
और उन्होंने शेष जीवन
माँ की सेवा में बिताने का निश्चय किया । जाड़े की दाँत किटकिटाती हुई रात थी । सोती हुई
माँ
की नींद टूटी और उसने पानी माँगा । बायजीद झट से पानी लेकर
पहुच; पर
माँ को पुनः झपकी आ गयी थी । गिलास ज़मीन पर रखने की खटखट
से माँ की नींद टूट सकती है और चूँकि
माँ प्यासी ही सो गयी है, इसलिए उसकी नींद जल्द ही भंग होगी और वह पानी माँगेगी
– यह
सोचकर शिशिर की उस रात में पीनी-भरी गिलास लिये बायजीद
माँ
के सिरहाने ही खड़े रहे ।
माँ की नींद टूटी, उसने पानी
माँगा । बायजीद ने
माँ को पानी पिलाया । उसके बाद बायजीद
लिखते हैं-
‘मैं
कितना मूर्ख था, जिस शांति की तालाश में मैं दर-दर
मारा-मारा फिर रहा था, मुझे क्या पता था कि वह शांति मेरी
माँ के कदमों के नीचे है
!’
पिछले दिनों उदयपूर में दो राजस्थानी लोरियाँ सुनने को
मिली थी । उनके शब्द तो स्मरण नहीं रहे, लेकिन उनके उदात्त
अर्थों की लय और उनकी अनुगूँज अब तक शिराओं में झनझनाती-सी
रहती है । उनका कथ्य लगभग इस प्रकार थाः
(1)
माँ
! मैं
चन्द्रमा लूँगा ।
तुझे चंद्रमा लेना ही है तो कुठ दिन और ठहर
मैं तुझे पूनम का चंदा नहीं दूँगी, जो तेरे
हाथों में गेंद-सा उछले ।
मैं तुझे दूज का चंदा दूँगी जो तेरे हाथ में
कटार बनकर चमके ।
(2)
माँ
! मैं
तेरे दूध से उऋण होना चाहता हूँ ।
वह तो बहुत
सरल है
।
कैसे
?
तुझे सुलाने के वास्ते मैं जितनी बार तेरा पालना डुला रही
हूँ,
बड़ा होकर पराक्रम से उतनी बार तू धरती हिला देना-
मेरे दूध से उऋण हो जायेगा ।
यह राजस्थानी
माँ की एक छबि है । यह वह
राजस्थान है, जिसके बारे में
कर्नल टाड ने लिखा है-
‘नाहक
यूरोप को एक थर्मापिली पर बड़ा नाज है । राजस्थान के तो
चप्पे-चप्पे में थर्मापिली है।’
दूध से उऋण होने की बात उठी तो एक लोककथा याद हो आयी । एक
बार एक बेटे ने
माँ से कहा
–
‘माँ
! अब
मैं बड़ा हो गया हूँ, तेरे दूध के ऋण से उऋण होना चाहता
हूँ । क्या करना होगा
?’ माँ
हँसी-
‘बेटा
! आज
रात तू मेरे पास ही सोना, तब तुझे मैं उऋण होने का उपाय
बता दूँगी ।’
रात को माँ-बेटे साथ-साथ लेटे। तरह-तरह कीघर-गृहस्थी की,
रोजमर्रा की समस्याओं पर बात हो रही थी । बेटा अपना प्रश्न
भी भूल चला था । धीरे-धीरे नींद से उसकी पलकें बोझिल होने
लगीं । मगर
बेटा जैसे ही सोने को हुआ, माँ ने सिरहाने रखे
डोल-भर पानी से एक छींटा उसके मुँह पर दिया । बेटा इस
विनोद पर हंस पड़ा -
‘क्या
करती हो माँ
! मुझे
सोने नहीं दोगी
?’
‘बस!
माँ के दूध से उऋण होने का हौसला पस्त हो गया
? जाड़े
की दाँत किटकिटाती रातों में तू रोज बिस्तर खराब कर दिया
करता थ, तुझे बिस्तर के सूखे हिस्से में लिटाकर मैं एक-दो
नहीं वर्षों तक सारी-सारी रात भीगे बिस्तर पर पड़ी रहती थी
और तू एक ही रात में झूँझला गया
?’
बहेटे ने माँ के चरण पकड़ लिये-
‘माँ,
यह मेरी हिमाकत थी। तेरे दूध से उऋण होना सम्भव नहीं है।’
‘कुपुत्रो
जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति’
की प्रार्थना इस सन्दर्भ में एक उदात्त सत्य को घोषित करती
है। लगता है माँ के पयोधर में हिलकोरते क्षीर-सागर में ही
नारायण सो रहे हैं। माँ आशीष के छतनार छाँह वाले बरगद की
भांति हमारे साथ निरन्तर होती
है;
लेकिन हम जीवन के छोटे-मोटे स्वार्थों से घिरे होने के कारण
उसे महसूस नहीं कर पाते।
पहले छह-सात बच्चे मारे गये और आठवाँ जो बचा वह उसकी नजर
से दूर रहा-अपने उस बेटे के लिए तरसती ममता की मारी देवकी
ने गंगा से प्रार्थना की थी
–‘सुना
है माँ
! तुमने
अपनी कोख के सात फूलों को अपनी ही लहरों में डुबाकर मार
डाला था और जब आठवें को उसी परिणति के लिए ले
चली तो
शांतनु ने तुम्हें बरजा और तुम उसे छोड़कर चली गयीं । अपने
उस पाषाण-हृदय का एक खन्ड मुझे भी दे दो, ताकि पुत्र के लिए
कलपने की मेरी समस्या ही न रहे ।’
लेकिन तुरन्त ही उसने अपनी प्रर्थना वापस लेते हुए कहा-
‘मैं
पथरायी दूध-भरी छाती का दुखता दर्द
झेल लूंगी, लेकिन
ममता-वात्सल्य-हीन मातृत्व का वरदान मुझे नहीं चाहिये
। अपनी प्रर्थाना, जो मैंने नादानी में की थी, मैं
वापस लेती
हूँ माँ
!’
डेनमार्क में जनमी नार्वेजियन साहित्यकार सीग्रिड ऊंडसेट
को सन् 1928 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया ।
पुरस्कार-घोषणा के साथ ही उनका साक्षात्कार पाने, उनके
चित्र लेने विश्व के बड़े समाचारपत्रों के अनेक प्रतिनिधि
उनके यहाँ आ पहुँचे । उस वक्त उनका बेटा उन्हें छोड़ नहीं
रहा था। अन्ततः वे आयीं और क्षमा माँगते हुए बिनती की
–
‘इस ममय
मेरा बेटा मुझे छोड़ नहीं रहा है। अपनी यश चर्चा से अधिक
महत्त्वपूर्ण मुझे उसकी जिद को दुलार देना लगता है। मैं
क्षमाप्रार्थी हूँ । आप लोग फिर कभी आइएगा।’
रामराज्य की उस माँ से लेकर सीग्रिड उंडसेट तक या उससे भी
आगे मातृत्व की यह सीधी-सादी रेखा ज्यों की त्यों सरल-तरल
है और आगे भी रहेगी।
मेरे प्रिय रचनाकार श्री नरेश मेहता अभी हाल में अपनी
जन्मभूमि मालवा गये थे। मैंने उनसे पूछा-
‘आपका
मालवा-प्रवास कैसा रहा
?’
बतलाने लगे-
‘मैं
डेढ़ साल का था तभी मेरी माँ का निधन हो गया था, मुझे उनकी
शक्ल का रत्ती- भर याद नहीं रह गयीं थी। घर में
उनका मेरे
पास कोई चित्र भी न था । ऐसी स्थिति में माँ मेरे लिए
मात्र एक शब्द थी। इस बार मुझे घर के पुराने कागज़ात में
चाचाजी के यहाँ माँ का एक पियराया हुआ चित्र मिला, यह मेरे
इस प्रवास की सर्वोपरि उपलब्धि थी।’
इतना कह कर उन्होंने पूज्या माँ का चित्र सामने रख दिया।
उस क्षण नरेशजी की आँखों की दीप्ति कह रही थी- एक शब्द जो
ब्रह्म था, निराकार
परमात्मा, वह अकस्मात् उनके सामने
मूर्त हो गया था। वैष्णवी सगुणोपासना यह नहीं है तो और
क्या है
?
माँ की महिमा
के अनेक प्रसंग स्मृति में उग रहे हैं । सबको समेट लेने का
सामर्थ्य मुझमें नहीं है और जब माँ का गुणानुवाद करने के
सामर्थ्य छीजता गले, तो
‘हरि
अनन्त हरि-कथा अनन्ता’
कहकर ही सन्तोष करना पड़ता है।