प्रक्रति
के टूटने में भी सौंदर्य होता है। उसका टूटना भी सर्जन को
जन्म देता है। करोड़ों वर्ष पहले एक तारा टूटा । पृथ्वी का
जन्म होता गया । नवग्रहों का रहस्यमयताओं से भरा एक परिवार
सौर मंडल में झूलने लगा । केंद्र टूटा तो परिधि का जन्म
हुआ। शून्य चहचहाहट से भर ग
या। केंद्रीय चेतना बिखरी तो
वैश्विक सौंदर्य कण-कण में जाग उठा । धरती की माटी की
एक-एक रज रस से भरी हुई है। धरती का रस वनस्पति में
शुभ के
संदर्भ लिखने लगा । केंद्र की चेतना धरती में और धरती की
चेतना वानस्पतिक सत्य में मुस्कुराने लगी,
समुद्र ने स्वयं
को तपाया तो आकाश में गए । बादल हजारों बूँदों में बिखरकर
जीवन के अर्थ भासने लगा।
बादल का सौंदर्य केवल आकाश में
तैरते रहने में ही नहीं है, उसका सौंदर्य आकाश के शून्य
में नाचती, कुलाटी मारती बूँदों का धरती पर मोती-सा बिखर
जाने में है। बादल का सौंदर्य बूँदों में शिवत्व बनकर बहता
है। पहाड़ का हृदय टूटता है तो झरने का जन्म होता है।
पहाड़ का झरना बन जाना स्थिर सौंदर्य का गतिमान हो जाना
है। तरल हो जाना है। जीवन हो जाना है। शुभ से भर जाना है।
प्रकृति का
सर्जन भी परम सत्ता ने किया है । परम चैतन्य कैवल्य है ।
अकेला है । एक ही है।
‘स
एष एक एकवृदेक एव’
(अथर्ववेद 13-57)
उसके समान और
समानांतर कोई दूसरा है ही नहीं । उसी में अनंत ब्रह्मांड
हैं । उसीसे अनंत-अनंत ब्रह्मांड स्फुटिक होते हैं और
उसीमें समाहित होते हैं । जैसे सूर्य से किरणों प्रकटती हैं
और उसी में सिमट जाती हैं।
“प्रभा
जाई किमि बिहाई।”
सूर्य का किरणों में प्रभावान होना ही उसकी सत्ता की
महत्ता है। ऐसा नहीं होता तो पता नहीं क्या होता
?
पृथ्वी पर जीवन नहीं होता। सृष्टि का स्वरूप कुछ और होता।
पर उस चैतन्य ने अपनी शक्ति को, अपनी इच्छा को विस्तार
दिया तो गति पैदा हुई। गति आई तो वायु का शीतल झोंका शून्य
में झूल गया। वायु ने पुकार लगाई तो अग्नि दौड़ी चली आई।
सूर्य अपनी प्रभा के से सत्य को नये-नये वस्त्रों से
सज्जित करने लगा । यदि यह सब नहीं होता तो परम सत्ता के
होने का भी क्या अर्थ रहता
?
सत्ता की महत्ता सत्ता से
इतर और सत्ता से जुड़े लोगों और
तत्वों के कारण ही होती है। कोई निर्बल है, उसकी तुलना में
ही किसी हलवान को परिभाषित किया जा सकता है। कोई असुंदर है
इसलिए ही कोई सुंदर है। असुंदर की तुलना में ही कोई सुंदर
है। हालाँकि यह भाव ठीक नहीं है। सृष्टि में कुछ असुंदर
नहीं है। कुछ भी त्याज्य नहीं है। पूरा मामला कार्य-कारण
का परिणाम है। कोई विस्तारित हुआ;
धऱती के गमले में फुल खिल उठे और आकाश के महल में दीप जल
उठे।
यदि संसार का
सौंदर्य नही जन्माया जाता तो परमात्मा का जन्म भी नहीं
होता। जिस क्षण संसार बना, उसी क्षण परमात्मा का जन्म भी
हुआ । संसार के जन्म से पहले वह परम चेतना अपनी सत्ता में
मौजूद थी, तो थी;
उससे किसी का कोई संबंध ही नहीं था । क्योंकि संबंधों का
जन्म भी सृष्टरचना के साथ ही हुआ है। संबंध, रचना से ही
जन्मते हैं। रचना होते ही सौंदर्य को बिंबित पाते हैं ।
जैसे माँ, बेटे में सत्य को ही सौंदर्य रूप में देखती है।
सृष्टिरचना यदि नहीं होती तो वह परम सत्ता भी संबंध रहित
और सौंदर्यहीन होती । एक स्त्री बच्चे को जन्म देते ही माँ
बन जाती है. बच्चे के जन्म से पहले वह स्त्री तो रहती है,
परंतु माँन हीं होती । स्त्री, देह का एक सत्य है, एक जैविक
संरचना आधारित सत्य है। लेकिन वह क्षण-क्षण की तृष्ति,
विस्तार और व्यवहार में प्रकट होता है । यह प्रकटन ही शिव
है। बच्चे के जन्म के साथ ही दो का जन्म हुआ-एक जगत की
सत्ता का, दूसरा परम-सत्ता का। अन्यथा परम-सत्ता अपने
रहस्य में स्थित थी। उसे कौन सत्ता की तुलना में परम-सत्ता
की संज्ञा देनेवाला था
?
बिना सृष्टि के
सृष्टा का संबोधन झूठा है । जो रचना करता है, वह
सृष्ट है । रचना का सर्जन सत्य को सौंदर्य रूप में
उपजाता है । उसका व्यापक प्रभाव सृष्टि के तत्व-तत्व पर
पड़ता है । वह शिव है । वह शुभ है । इस रूप में कवि दूसरा
सृष्टा है । परम-सत्ता ने सृष्टि को उपजाया । माँ ने
जीवन का दीप जलाया । कवि ने शब्द-रचना में सृष्टि को गाया
। एक सत्य है । दूसरा सौंदर्य है तीसरा शिव है । कविता का
मूल लक्ष्य तो शिवत्व ही है । सत्य, सौंदर्य और शिव ईश्वर,
धरती, माँ और कवि की रचना में सहज तथा अनायास प्रकट होते
हैं । जो प्रयास से हो वह रचना नहीं । कविता नहीं । वह
निर्माण है । निर्माण में बुद्धि लगती है । रचना में ह्रदय
ही प्रकट होता है । बुद्धि उसे संवारती है । काँट-छाँट
करती है । ह्रदय आगे रहता है । बुद्धि पीछे रहती है । जैसे
सृष्टि का जन्म शून्य में सहज हुआ । बच्चे का जन्म
स्वाभाविक रूप में होती है । उसी तरह कविता भी शून्य मे
प्रकटती है । जो जन्मजात कवि होता है, उसकी कविता रचना
होती है;
निर्माण नहीं
। कविता रची जाती है, निर्माण नहीं की जा
सकती । सहज स्फुरित कविता और सप्रयास की गई कविता में उतना
ही फर्क है, जितना रचना और निर्माण में होता है ।
रचना और
निर्माण का फर्क स्वाभाविक रूप से, प्राकृतिक रूप से जन्म
लिए हुए बच्चे और टेस्ट ट्यूब से पैदा किए गए बच्चे जैसा
है । दोनों स्त्री-पुरुष के ही अंश हैं, परंतु प्राकृतिक
रूप से गर्भस्थ बालक और टेस्ट ट्यूब में स्त्री-पुरुष के
अंश को संरक्षित–संवर्धित
गर्भस्थ बालक के गुण- धर्म में बहुत अंतर होगा । लाख कोशिश
और सावधानी के बाद टेस्ट ट्यूब से तैयार स्त्री-पुरुष के
बीजाणु को बाहरी वातावरण का धक्का तो लगेगा ही । अतः
प्राकृतिक रुप से
जन्मे बालक की अपेक्षा टेस्ट ट्यूब के बाद माँ के पेट में
गर्भस्थ होकर जन्मा बालक कमजोर होगा । यही प्रतिभाजन्य
कविता और कोशिश कर बनाई गई कविता की भी स्थिति होती है।
सच्चे कवि से कविता हो जाती है। उसे कविता बनानी नही पड़ती
। कविता की कोई पूर्ण निर्धारित फ्रेम नहीं होती । जो
कविता व्यक्ति को मुक्त करती है । पहले
उसका स्वयं मुक्त होना आवश्यक है । उसकी प्रतिबद्धता केवल
सृष्टि के प्रति होती है । जीवन के प्रति होती है ।
सृष्टि और जीवन की समग्रता के प्रति होती है ।
यह समग्रता आती
है केंद्र से परिधि की ओर तथा परिधि के केंद्र की ओर बढ़ने
तथा जाने से। ईश्वर की संपूर्णता संसार को मिलाकर ही है ।
जर्रे-जर्रे में जो रस प्रतिबिंबित है, उन सबसे मिलकर ही
महारस बनता है । वह स्त्रष्टा ही महारस है । महाललित है ।
महारस ही बूँद-बुँद सृष्टि के अण- परमाणु में सरस है और यह
बूँद-बूँद रस मिलकर ही महारस का संकेंद्रण है ।
असंख्य-असंख्य नदियाँ महासमुद्र में जीवन डालती हैं और वह
महासागर ही बूँद-बूँद वारि से नदियों को भरता है।
पहाड़ों-घाटियों, दरों से टपकती बूँदों का संचयन ही नदी
बनता है। एक जीवित नदी।
श्रोतस्विनी ।
गंगा-नर्मदा-वोल्गा-मिसीसिपी । एक चक्र
है-समुद्र-बादल-बूँद-नदी फिर समुद्र । बीज-वृक्ष, फूल-फल
फिर बीज । पंच तत्व, जन्म-जीवन-मृत्यु फिर पंच तत्व। इसके
केंद्र और परिधि के बीच रस
बहता रहता है।
असली कवि के
काव्य का स्वरूप इस केंद्र और परिधि के बीच के संबंधों के
आधार पर बनता है। वह परिधिगत बिंबों से कविता में रस ग्रहण
करते हुए केंद्र की ओर बढ़ता है। वह दिल्ली से खंडवा को
नहीं देखता। बल्कि खंडवा के पास के गाँव से दिल्ली को देखने
पाने की कोशिश करता है। काव्य-रुप का भी एक राष्ट्रीय
स्वरूप होता है। यह स्वरूप सारे देश में बिखरे सौंदर्य और
सत्य को अनुभव और भाषित कर ही रचा जा सकता है । स्थानीयता
से पुष्ट होकर ही वैश्विकता से लड़ा जा सकता है।
विश्वग्राम में सबका चेहरा या तो गुम गया है या बेपहचान हो
गया है। कारण विविधता का सौंदर्य खत्म हो गया है। कविता
इसी विविधता में आश्रित सौंदर्य को पकड़ती है। जीवन भी
विविधताओं का पुष्प-स्तबक है। इसलिए कविता को दूर-दराज के
सौंदर्य तक जाना ही होगा। स्थानीयता से जोड़ना ही होगा।
उत्तर आधुनिकता में भी स्थानीयता पर बल है। यह स्थानीयता
लगभग पूरे विश्व में आई हैं। व्यक्तिगत आकांक्षाओं का
सौंदर्य सक्रिय हो रहा है।
महानगरों में
ग्रामीण बिंब गायब हो रहे हैं। महानगरों में जीवन प्रकृति
से दूर जा रहा है। सहजता से दूर जा रहा है। अतः महानगरों
में उपजी और केंद्रित कविता भी प्रकृति से दूर हो रही है।
असहज हो रही है। महानगरों जैसे कि दिल्ली में साहित्य का
केंद्रीकरण ठीक नहीं है। महानगरों के केद्र साहित्य कम,
राजनीति ज्यादा कर रहें हैं। राजनीति का अपना महत्व है।
उसका अपना क्षेत्र भी है। परंतु साहित्य में राजनीति कविता
या साहित्य अप्राकृतिक बनाती है। महानगरों का स्थूल
सौंदर्य भी कविता को विविधता से दूर कर रहा है। वहाँ नदी
ड्राइंग रूम में फ्रेम होकर टँगी है। यदि सचमुच की नदी है
भी तो वह दिल्ली को यमुना या कानपुर की गंगा है। तब
बूँद-बूँद का रस और रज-रज की महक कविता मैं कैसे आएगी
?
गाँव में राजनीति घुस जाने और गाँवों के बदल जाने के बाद
भी अभी बहुत कुछ प्राकृतिक और सहज बचा हुआ है। नये बिंबों
को प्राप्त करने और कविता को नयी बनाने के लिए गाँवों की
ओर लौटना होगा। प्रकृति की ओर जाना होगा ।
प्रकृति
परमाप्रकृति की सहज कविता है। वह परमसत्ता के हृदय-कुंभ से
छलकी अमृत की बूँदें हैं। प्रकृति का सान्निध्य ही कवि को
प्राकृत से संस्कृत बनाता है। प्रकृति का सान्निध्य कवि को
संस्कारित करता है। प्रकृति का सहज स्वरूप अपने
स्वानुशासन से बँधा होता है। प्रकृति से संस्कारित कविता
भी सहज प्रकट होती हुई स्वानुशासन में बद्ध होती है।
समस्त प्रकृति एक नैसर्गिक लय
पर चल रही है। वह जड़-चेतन सबकी
धड़कनों में धड़क रही है। वह प्रकृति में सहज विकास पाती
है। वह लय ही कवि की प्रतिभा से कविता बनकर, साहित्य बनकर
बहती है। इस कारण जो सहज लयबद्धता प्रकृति में है, वही
लयबद्धता सहज कविता में भी होती है । इसीलिए कवि बार-बार
वनफूलों की ओर जाता है
। वह खेतों की ओर लौटता है। उसकी
कविता चाहती है-
‘सुखी
रोटी खाएगा जब कृषक खेत में धरकर हल, तब मैं तृप्ति दूँगी
उसे बनकर लोटे का गंगाजल ।’
(दिनकर) कविता मेहनत के सिपाही पर द्रवित होती है तो
प्रकृति होती है तो प्रकृति पसीज उठती है। उसकी कविता गाती
है-
‘अमल
धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है।’
(नागार्जुन) घिरे हुए आतुर-आकुल बादल जब धरती पर बरसते हैं
तो कवि की वाणी फिर गाती है-
‘बरसात
आ गई रे,।’
(भवानीप्रसाद मिश्र) कविता इस रूप में प्रकृति की लय से
जुड़कर चराचर की लय को पकड़ती है। वह गीत की संस्कृति रचती
है।
ऋग्वेद में आता
है कि
‘न
देवानामति व्रतं शतात्मा च न जीवत’
।(10.33.9) देवताओं के नियम को तोड़कर कोई सौ वर्ष नहीं जी
सकता । प्रकृति भी देवता है। मनुष्य के भीतर बैठा शब्द भी
देवता है। जब अनुभव का घड़ा भर जाता है तो अपने-आप न उभलाने
लगता है। जिस क्षण अनुभव रसधार बनकर कविता के रूप में झरता
है, उसी क्षण कवि का जन्म हो जाता है। कविता स्वयं तो
जन्मती है, कवि को भी जन्म देती है। इस सहजजन्मा कविता ही
झूठ से बचकर सत्य को धारण कर सकती है। हम कामना करें-हिंदी
कविता और विश्व कविता विखंडन के बर्फीले ध्रुवों से निकलकर
अमेजान, नील, ह्वांगहो और गंगा-नर्मदा के कछारों की खुली
धरती पर अमरता के छंद रचेगी।