रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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लघुकथा

 
तमाचा

कालीचरण प्रेमी

नौयडा सिटी से वापस गाजियाबाद लौटते समय प्रतिदिन नए बस अड्डे से शास्त्री नगर जाने के लिए उसे बस पकड़नी पड़ती है। दूरी यही कोई तीन-चार किलोमीटर है बस। किराया मात्र एक रूपया देना होता है। किंतु एक रूपए की भले ही आज के ज़माने से कोई औकात न हो, किंतु उसने देखा है कि लोग अक्सर किसी.न किसी तरह एक रूपया बचा ही लेते हैं। कंक्टर जब पैसे माँगता है तो कोई कह देता है कि स्टाफ है, कोई स्टूडेन्ट तो कोई हो गया यार कहकर टाल देता है। कोई यूं ही छूट जाता है। कोई तो स्वयं को पुलिस का स्टाफ बताकर किराया देने से बच जाता है। सबके अपने अलग-अलग तरीके हैं-एक रुपया चोरी करने के । सभी की तरह वह भी देखा-देखी कोई न कोई बहाना बनाकर आजकल एक रूपया बचा लेता है। यानी महीने में दोनों तरफ से पचास रुपए की विशुद्ध बचत।

 

अन्य दिनों की भांति उस दिन भी वह बस में चढ़ा और एक अफ़सर जैसे दिखने वाले शख्स के पास वाली सीट पर जाकर बैठ गया। कुछ देर बाद अन्य सवारियों से निपटकर कंडक्टर उसकी ओर लपका,- हां बाबूजी टिकट?”

 

उसे नागवार-सा गुजरा। वह कंडक्टर की तरफ आँखें तरेरते हुए बोला अरे हो तो गया, बार-बार क्यों तंग करता है ?” इधर उसके इतना कहते ही बराबर वाले साहब को गुस्सा आ गया । वे साहब उसके प्रति सहानुभूति का भाव प्रकट करते हुए कंडक्डर पर गुर्राये और उसकी ओर आँखें निकाल कर बोले- तू बहुत बदतमीज कंडक्टर है। जब टिकट ले रखा है तो बार-बार क्यों परेशान करता है सवारियों को ?”

 

बातों-बातों में बात बढ़ गई । कंडक्टर जिरह पर उतर आया । साहब ने कंडक्टर के मुँह पर तमाचा जड़ दिया । उसके लिए यह स्थिति अप्रत्याशित थी । उसने साहब को रोका- जाने दीजिए सर, छोटे आदमी के मुँह नहीं लगना चाहिए ।

 

उसने मुश्किल से साहब को शान्त किया ।

 

शास्त्री नगर बस स्टाप पर उतर कर वह घर की ओर चल पड़ा । रह-रह कर तमाचा वाला दृश्य उसके ह्रदय को कचोट रहा था । उसे लगा जैसे साहब ने कंडक्टर के मुँह पर नहीं, बल्कि, उसके ही मुँह पर तमाचा मारा हो ।     

 

 

लघुकथा 

सत्य को असत्य ढक लेता है -छांदोग्योनिषद

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