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हाथ बढ़ाना भूल गया
इसीलिए अपना घर रोशन नहीं हुआ,
अपने घर का दिया जलाना भूल गया । 
दाता आकर दरवाजे से चला गया, मैं ही अपना हाथ बढ़ाना भूल
गया ।
भूल गया मैं घाव हृदय के दिखलाना, लौट गई हर बार हकीमों की
टोली,
समय निवेदन हम से करता रहा मगर, हमने खोली नहीं कभी अपनी
झोली ।
इसीलिए मन चाहा अम्बर छू न सका, मैं सपनों में पंख लगाना
भूल गया ।
भूल गया मैं गीत सुनाना मौसम का, इसीलिए ऋतुराज रूठकर चला
गया,
बहुत समय के बाद मुझे यह ज्ञात हुआ, अपना जीवन अपने द्वारा
छला गया ।
दाग इसीसे चेहरे पर आबाद हुए, चेहरे को दर्पण दिखलाना भूल
गया ।
मुझको बेपरवाह देखकर गुस्से में, आँगन ने अनुराग बेदखल कर
डाला,
अपमानित यामिनी तुनक कर चली गयी, दृश्य देख अंधियार हो गया
मतवाला ।
इसीलिए अब तलक अधर में लटका हूँ, मैं धरती पर पाँव टिकाना
भूल गया ।
जीवन को रंगीन बनाने के क्षण को, कई बार हाथों में लेकर
छोड़ दिया,
फल की चिंता किए बिना संबंधों के, प्रीति दिखाने वाले पुल
को तोड़ दिया ।
बच्चे भूल गये रिश्तों का सम्बोधन, मैं रिश्तों का अर्थ
बताना भूल गया ।
मंयक श्रीवास्तव
काकी
दो रोटी को तरस रही है, अब भी 'बूढ़ी
काकी' ।
वैसे ही अब भी लोगों के यहाँ दावतें होती,
लेकिन काकी पड़ी किनारे, एकाकीपन ढोतीं ।
इधर सूखता गला प्यास से, और उधर मधु-साकी ।
खोज ख़बर तक लेने, उनकी कोई पास न आये,
बचा-खुचा खाना भी नौकर ही आकर दे जाये ।
आँख थक गई इंतजार करते-करते 'रूपा'
की ।
छोटी नातिन आँख बचाकर कभी पास आ जाती,
अपने हिस्से के बिस्कुट, चुपके से उन्हें खिलाती ।
मन ही मन कुढ़ती रहती वह, इन बातों से माँ की ।
अब तो बिल्कुल टूट चुकी, कुछ नहीं किसी से कहती,
गुमसुम पड़ी आख़िरी पल की, बाट जोहती रहतीं ।
और पूछती प्रभु से, अपने कितने दिन हैं बाकी ।
कृपाशंकर पाण्डेय
मन-मृग भटक रहा व्याकुल हो
मन-मृग भटक रहा है व्याकुल हो
होती नहीं लालसा पूरी ।
मरुथल में बढ़ती ही जाती, संतापों से सतत पिपासा,
किन्तु लगी रहती है प्रतिपल, सदा अमिट जीवन की आशा ।
होता व्यर्थ प्रयास, न होती कम मरीचिका से है दूरी ।
पाने को मादकतम सौरभ, गति चरणों की होती चंचल,
लेकिन सुलभ नहीं होता है, स्नेह सुरभि का कोई अंचल ।
वह सुगंध से वंचित जिसकी, बसी नाभि में कस्तूरी ।
चाह राह पर चल देने को, प्रेरित निशिदिन करती रहती,
बढ़ो इष्ट की ओर निडर हो, है कामना निरंतर कहती ।
मगर न मिलती मंजिल अपनी, रह जाती है तृप्ति अधूरी ।
विनोदचन्द्र पांडेय 'विनोद'

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