रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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 विभिन्न भाषाओं का अनुवाद-घर

छोटा काला आदमी

एक छोटा काला आदमी शहर में से दौड़ गया ।

सीढ़ियों पर चढ़कर उसने सारी लालटेनें बुझा दी ।

 

धीमें धीमे गोरा चिट्टा प्रभात आ रहा था

जब यह काला आदमी सीढ़ियों पर था

 

शांत सुकुमार छायाएँ शहर पर तैर रही थी

लालटेनों की पीली धारियाँ सो रही थीं

सुबह की उजियाली देहरी पर बिछ रही थी

पर्दों में भिद रही थी, दरवाज़ों में झाँक रही थी ।

 

शहर कितना बेबस सा, कितना श्रीहीन सा

लगता है जब प्रभात आने वाला होता है

 

बाहर घुटनों में सर छिपाये छोटा काला आदमी

ज़ार ज़ार रोता है, सिसकता रहता है ।

मूल रचना - अलेक्जेंडर ब्लाक  

 

 

स्पेनी कविता

निर्वासन का गीत

कौन हो तुम जो इतने भयभीत,

मुझे पुकारते हो

सुदूर से, शब्दहीन -

और स्तब्ध मौन हवाओं पर

चुपचाप

बोलते हो मेरा नाम

 

कौन हो तुम

क्या चाहते हो, क्यों सिसक रहे हो तुम

और इन सुदूर आवाज़ो में

कौन है जो दम तोड़ रहा है;

कौन हो तुम जो इस मूक पुकार से

मेरे अस्थिपंजर तक को

मांस से बाहर खींच रहे हो

 

मेरे दाँतो के नीचे एक

जमे हुए शब्द का स्वाद है

मेरी जीभ पर एक मृत भय का स्वाद

और मेरे हृदय में एक बंद धड़कन का

रक्त में वृषभ-चर्म प्रवाहित है,

समुद्रों में सूखे हुए आँसुओं का सूखा सागर

जिन्होंने मुझे कभी पुकारा था

वह तो कब के जा चुके हैं

मूल रचना - राफाएल आल्बर्ती

 

 

फ्रांसीसी कविता

जन्म

पिटारी में सफ़ेद चादरें

पलँग पर लाल चादरें

माँ में एक शिशु

प्रसव पीड़ा में एक माँ

 

पिता गलियारे में

गलियारा घर में

घर एक नगर में

नगर अंधेरे में

मौत छिपी हुई माँ की एक चीख़ में

बच्चा - नयी ज़िंदगी में

मूल रचना - जाक़ प्रीवर्ट

 

 

तुर्की कविता

हाफ़िज़ का मकबरा

एक सूर्ख़ गुलाब रोज़ खिलता है

जहाँ हाफ़िज़ दफ़न है

आकाशगंगा की छाँहों में

हर मधुमास में गाती हैं बुलबुलें

 

शीराज़ की भूली यादों को ताज़ा

कर जाते हैं इन बुलबुलों के गीत;

जिसमें दिल होता है

ज़िंदगी की आग होती है

उसकी मौत भी सदाबहार बन जाती है

 

हाफ़िज़ का दिल

सोंधी मिट्टी का धूपदान है

जिसमें आज तक धूप सुलग रही है !

उसका दिल युगों को पार कर

आज भी हमें पैगाम देता है

भविष्य की अंधेरी रातों में भी पैगाम देता रहेगा

 

उसकी कब्र के इर्द-गिर्द

लम्बे उदास सगे की छाँह में

सुबह के धुँधलके में

सुर्ख़ गुलाब रोज़ खिलता है

उदास धुँधली शामों में

उसकी याद में दीवानी बुलबुलें

गीतों में सिसकने लगती हैं !

मूल रचना - यहिया कमाल

 

जर्मनी कविता

निजी भाषा

भाषा उग आयी है तुम्हारे अधरों पर

साथ-साथ, उग आयी है तुम्हारे हाथों में एक श्रृंखला

 

खींचो ! उससे तमाम जगत् को अपनी ओर खींचो

वरना तुम बेबस खींच लिये जाओगे !

मूल रचना - ह्यूगो वान हाफ़मान्स्थल

 

सभी रचनाओं का अनुवाद भारती की कृति 'देशान्तर' से - संपादक 

 

छंद

उच्च पद पर टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ी के बिना नहीं पहुँचा जा सकता

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