रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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बचपन

 

डॉ.परशुराम की बाल तीन कविताएँ

 

नये साल में मिलकर

भूलकर परस्पर भेदभाव अब सबको गले लगाएँ ।

आओ नये साल में मिलकर, नया गीत गाएँ ।।

नयी बात है, नयी सुबह है,

नया जोश है, नयी उमंगे ।

जन-जन में उल्लास नया है,

सागर में हैं नयी तरंगे ।

नयी सुबह का नया उजाला घर-घर में पहुँचाएँ ।

रहे न कोई भूखा-प्यासा,

हो पूरी सबकी अभिलाषा ।

ऊँच-नीच का भेद मिटाकर,

पूर्ण करें बापू की आशा ।

सभी साक्षर बनें ज्ञान का ऐसा दीप जलाएँ ।

सबको मिले सूर्य की लाली,

खेतों में झूमें हरियाली ।

दृश्य देवता आकर देखें,

ऐसी हो समृद्धि निराली ।

जन-जन की जीवन-बगिया में, कलियाँ नयी खिलाएँ ।

श्रमशक्ति से प्रीति लगा कर,

आलसपन को दूर भगाकर ।

हिम्मत, साहस और लगन से,

एक नया विश्वास जगा कर ।

अखिल विश्व में सबसे ऊँचा, भारत ध्वज फहराएँ ।

आओ नए साल में मिलकर, नया गीत गाएँ ।।

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तीन रंग का बना तिरंगा

तीन रंग का बना तिरंगा, लहर-लहर लहराता है ।

नयी शक्ति भरता तन-मन में, नयी चेतना लाता है ।।

केसरिया रंग इसका हमको,

बलिदानों की याद दिलाता ।

मध्यभाग का धवल श्वेत रंग,

विश्वशांति का पाठ पढ़ाता ।

हरा रंग विश्वास वीरता का संदेश सुनाता है ।

श्वेत भाग में एक चक्र है,

ध्वज में चौबीस छड़ियों वाला ।

चौबीस घण्टे देश-प्रेम की,

अभिनव शिक्षा देने वाला ।

देश-प्रेम का जोश हमेशा, वीरों को हर्षाता है ।

इसकी शान बढ़ायेंगे हम,

इसका मान बढ़ायेंगे हम ।

अपने प्राण रहें या जायें,

भारत ध्वज फहरायेंगे हम ।

भारत ध्वज से जनम-जनम का अपना अभिनव नाता है ।

महाशक्ति भारत बन जाये,

विश्वभारती के यश गायें ।

एक बार फिर ऐसा हो जब,

भारत जगद्-गुरु बन जाये ।

मान करे जग भारत ध्वज का, यही एक अभिलाषा है ।

नयी शक्ति भरता तन-मन में, नयी चेतना लाता है ।

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बुद्धू और बुद्धि

भैया ! बुद्धि कहाँ मिलती है ? तुम मुझको बतलाओ, 

महँगी हो तो सौ रुपये की, बुद्धि ले कर आओ ।

 

पढ़ता हूँ दिनरात मगर मैं, नम्बर पाता जीरो,

सब चीजों में निरा फिसड्डी, बनता मन में हीरो ।

 

पंडित जी डण्डे से मेरी, हरदम मार लगाते,

मम्मी-पापा, तुमसे, हमसे, रोज मार हम खाते ।

 

यार दोस्त सब हँसते मुझ पर, जब उनको मिल जाता,

कौन जतन मैं करूँ बताओ, मेरे अच्छे भ्राता ।

 

सुनकर भैया बोले मुझसे, बुद्धू के घर जाओ,

बुद्धू की घरवालो को तुम, अपने संग ले आओ ।

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बचपन

बच्चों की सबसे बड़ी दौलत प्यार है - जवाहर लाल नेहरू

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