गुजरात के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के उपाधि समारोह में देश के मुख्य न्यायाधीश और गुजरात के आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री एक साथ मंच पर थे। यह परंपरा है कि ऐसे समारोहों में सत्ता एवं संविधान के कुछ पदों पर मौजूदा लोग रहते ही हैं इसलिए देश के मुख्य न्यायाधीश और उनकी अदालत के आदेश से जाँच के घेरे में रखे गए मोदी दोनों अपने-अपने पद का धर्म निभाते हुए मौजूद थे। कुछ लोगों को यह लग सकता है कि मुख्य न्यायाधीश को इस मंच पर नहीं जाना था। गुजरात के कई लोगों ने ऐसी खुली माँग भी की थी। लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि पद की ज़िम्मेदारी निभाते हुए लोगों को एक तो परंपराओं का ध्यान रखना चाहिए और फिर देश की लोकतांत्रिक न्याय प्रक्रिया से फ़ैसला हुए बिना अदालत या सरकार किसी को अपराधी माने यह ठीक नहीं है। मीडिया के हमारे सरीखे लोग अपने विचार बनाने में और उन्हें लोगों के सामने रखने में आजाद रहते हैं क्योंकि मीडिया का कोई औपचारिक या परंपरागत संवैधानिक रोल नहीं होता। अगर किसी पर लगे आरोपों के हिसाब से सरकार, संसद, न्यायपालिका या संवैधानिक संस्थाओं के लोग एक-दूसरे के साथ संबंध रखने लगें तो भारत जैसे लोकतांत्रिक संघीय ढांचे में काफ़ी दिक्कतें आ खड़ी होंगी।
लोकतंत्र का अपना एक लचीलापन होता है। उसी के चलते विधि विश्वविद्यालय के उपाधि समारोह में नरेन्द्र मोदी भी समारोह का लबादा ओढ़े हुए मंच पर रहते हैं। हालाँकि क़ानून में उनकी आस्था पिछले कई बरसों में लगातार स्थापित होते रही है कि वह कैसी है। लेकिन देश का वर्तमान और देश का इतिहास इसका हिसाब रखते चल रहा है और महज इस बात के लिए मोदी को मंच से परे नहीं रखा जा सकता कि उन्होंने देश के सबसे भयानक दंगे अपनी सरकार की पूरी ताक़त के साथ, उसकी छत्रछाया में होने दिए और इससे भी अधिक उनकी भूमिका हो सकता है कि जाँच में स्थापित हो। अगर मोदी का कोई बहिष्कार होना था तो वह एक मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे दंगों में हज़ारों हत्याओं के बाद उनकी पार्टी के भीतर से होना था या फिर उस वक़्त देश पर राज कर रहे एनडीए की तरफ़ से होना था। लेकिन शरद यादव से लेकर नितिश कुमार तक सत्ता में ऐसे रमे हुए थे कि दिल्ली में एनडीए गठबंधन की मुखिया भाजपा को कोई कड़ी बातें भी सुनने नहीं मिलीं। ऐसा ही हाल 1984 के सिख विरोधी दंगों के वक़्त का था। उन दंगों के खलनायक सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे लोग लगातार कांग्रेस पार्टी की टिकटें पाते रहे और इसकी सत्ता में हिस्सेदार बने रहे। मोदी ने कल सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैनात विशेष जाँच दल के सामने गवाही देने के बाद कांग्रेस को इसी बात के लिए ललकारा कि अब वह भी 1984 के दंगों की ज़िम्मेदारी लेकर बताए।
दागी लोगों के बारे में जब नज़रिया देखते हैं तो पश्चिम बंगाल में तरह-तरह के अपराधी वामपंथियों के भीतर दिखाई पड़ते हैं जिनका कोई राजनीतिक बहिष्कार वे नहीं करते। इसी तरह उत्तरप्रदेश-बिहार के कम से कम तीन बड़े दल ऐसे हैं जो लगातार अपराधियों को गोद में और सिर पर बिठाने का काम करते आए हैं। लेकिन लालू-मुलायम-माया के अपराधियों से लगाव का अंत देश के दूसरे कोई राजनीतिक दल भी उस दौर में भी नहीं कर पाए जब इन दलों के साथ उनका अलग-अलग क़िस्म का गठबंधन रहा, केंद्र में भी और प्रदेशों में भी। यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ख़ुद चाहे कितने ही सज्जन हों, उनकी पिछली सरकार में शिबू सोरेन जैसे लोग हत्या के मामले में अदालत और पुलिस से फ़रार होकर जब भागे हुए थे उस वक़्त भी वे मंत्री थे। भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को बहुत से लोग इस बात के लिए ईमानदार मानते थे कि उत्तर भारत के सबसे बड़े माफ़िया मवालियों से अपने संबंधों को वे छुपाते नहीं थे और खुलकर उनके साथ दोस्ती रखते थे। कहीं कोई भैया राजा तो कहीं कोई फूलन देवी, कहीं गावली तो कहीं कोई और, अपराधियों से किसको कोई परहेज़ रहा? अकालियों ने तो पंजाब से चुनकर एक महिला को इसलिए संसद भेजा कि उसके पति ने इंदिरा गांधी की हत्या की थी। इनमें से कौन ऐसे लोग हैं जिनके साथ बाकी सांसद उठने-बैठने से मना करें या उनका बहिष्कार करें?
पाठकों को याद होगा कि जिस बाबरी मस्जिद को गिराने के ज़िम्मेदार अडवानी और उनके साथी पिछले चार दिनों से चर्चा में आए हैं उस बाबरी मस्जिद को बचाने का हलफ़नामा उत्तरप्रदेश के उस वक़्त के भाजपाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय शांति परिषद, केंद्र सरकार, इन सबके सामने अगर एक निर्वाचित मुख्यमंत्री कोई भरोसा दिलाता है तो उसे देश की बाक़ी संवैधानिक संस्थाएँ किस तरह ख़ारिज़ कर सकती हैं? इसलिए कल्याण सिंह भी बच निकले और बाबरी मस्जिद गिराने के ज़िम्मेदार लालकृष्ण आडवानी जैसे लोग या तो केंद्रीय मंत्री बने या प्रदेशों के मुख्यमंत्री बने, उनका लोकतंत्र कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
लोकतंत्र बिना दांतों वाले मसूड़ों सा होता है, वह लोगों को पकड़ते तो दिखता है लेकिन उन्हें सज़ा आसानी से नहीं दे पाता। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी माँ और देश की प्रधानमंत्री के हत्यारों को सज़ा मिलने में बरसों लग गए थे। ऐसा ही हाल दूसरे बहुत से चर्चित मामलों में होता है और देश की आज की राजनीतिक व्यवस्था इस क़दर अनैतिक और सिद्धांतविहीन हो गई है कि लोग अपनी कुर्सियों पर रहते हुए अपराध करते हुए दुबारा वहीं पर आ जाते हैं और लोकतंत्र के मौजूदा भारतीय ढाँचे में कुर्सियों के अंतरसंबंध ख़ारिज़ नहीं किए जा सकते। लेकिन इन कुर्सियों से परे मीडिया या देश के दूसरे सोचने-विचारने वाले लोग खुलकर लोगों को ख़ारिज़ कर सकते हैं और जनचेतना विकसित करने के लिए अपने-अपने विचार का ऐसा इस्तेमाल लोगों को करना भी चाहिए। फ़िलहाल मोदी के बारे में यही कहा जा सकता है कि उनका बहिष्कार करने का हक़ देश की किस कुर्सी को है? क्या मुख्य न्यायाधीश के उस कुर्सी को जो अपने तले कभी भी संपत्ति को छुपाए रखने के लिए अपनी ही निचली अदालतों के साथ अदालती लड़ाई लड़ रही है?

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