SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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आतिया की कविताएंँ


साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन

इन क्रांतियों से ऊपजी परिस्थितियों ने युरोप के लोगों को दो बुनियादी चुनौती को समझने तथा बरतने के लिए अनुप्रेरित किया। एक चुनौती थी समानता और राष्ट्रवाद की अवधारणा से परिचिति से उत्पन्न मूल्यबोध से संपन्न नागरिक जमात से शासन का सलूक और इसी से जुड़ी दूसरी चुनौती यह कि तेजी से घटित हो रहे औद्योगिकीकरण के साथ उतनी ही तेजी से बढ़ती हुई असमानता के दुष्प्रभाव से समाज को कैसे बचाया जाये
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राजनीतिक के साथ सांस्कृतिक समर भी है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

दलीय विचारधारा का प्रतिनिधि बनकर समाज में वोट मांगने आना है। संभव है इससे कुछ व्यक्ति नेता के रूप में प्रसिद्ध हो जाएं। यह भी संभव है कि वे निर्वाचित होकर संसद और विधान मंडलों की शोभा बढ़ाने लगें। वे जानते हैं की उनके पीछे समाज की वास्तविक ताकत नहीं है। राजनीतिक दल की बैशाखी थामकर वे सत्ता में पहुंचे हैं, इस कारण वे हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं। उन्हें अपने ऊपर भरोसा ही नहीं होता। इसलिए समाज को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता
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कविता के साथ क्या हुआ!

मैथिली आदि में ही मैथिली आदि की कविता लिखना लगभग असंभव हो गया! इस हादसा से निबटने के लिए हिंदी आदि के कवियों ने भारतीय कविता की बात शुरू कर दी। स्थानिकता, कह लें आंचलिकता, को दबाने में राष्ट्रीयता से बड़ा चिक (बाँस की कमानियों से बना पर्दा) और क्या हो सकता था। तो हिंदी कवि हिंदी कविता की जगह भारतीय कविता की और बढ़ गये। इधर स्थानीय कवि भी लपककर भारतीय कविता बनाने की दौड़ में शामिल हो गये तो अगला विश्व-कविता लिखने लगा
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अयोध्या पर वार्ता संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट फैसले से न बचे संपादकीय

बात किसी धर्म के मानने वाले तो कर सकते हैं कि आस्था किसी भी अदालत से ऊपर है, लेकिन अदालत का अपनी जिम्मेदारी से कतराना ठीक नहीं है। ऐसा भी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी नहीं है कि इसके पहले भी मध्यस्थता की बहुत कोशिश हो चुकी है, और बात किसी किनारे नहीं पहुंची है। इस बीच बाबरी मस्जिद को गिराने का मामला अदालत में चल ही रहा है
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हिंदी के हक की पहल

भूपेन्द्र यादव ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा - उच्च न्यायालयों में वादी अपनी भाषा में न्याय की गुहार लगा सके और प्रतिवादी को भी अपनी भाषा में अपनी बात रखने का अधिकार हो यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यह सर्वथा अनुचित है कि हमारे देशवासी अपने ही देश में अपनी भाषाओं में अपने उच्च न्यायालयों में न्याय की गुहार नहीं लगा सकते हैं
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नफरतजीवी मुख्यमंत्री लोकतंत्र हक्का-बक्का

शायद यह भी एक वजह है कि आज खुलकर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया है जो कि मुस्लिमों से नफरत की बात करने की राजनीति ही करते आया है, और जिसकी साख गांव-गांव की मामूली बातों को लेकर साम्प्रदायिक दंगा खड़ा करने की है। उत्तरप्रदेश के अपने प्रभावक्षेत्र में आदित्यनाथ ने हिन्दू धर्म के नाम पर एक ऐसा आक्रामक संगठन खड़ा करके रखा है जो कि रात-दिन मुस्लिमों को मटियामेट करने का मुद्दा लेकर चलता है
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Garbh Gruh

मुझे आज यह खतरा उठाना ही पड़ेगा क्योंकि अगर आज नहीं तो फिर मैं कभी भी तुम्हारे सामने खड़े होने का साहस जुटा नहीं पाऊँगा और यह भी नहीं कह पाऊँगा कि मेरी बदकिस्मती ने मेरे साथ एक खतरनाक खेल खेला है। फिलहाल मैं ज्यूडिशियरी कस्टडी में एक विचाराधीन कैदी हूँ। हालाँकि अभी तक मेरे खिलाफ कोई चार्ज फ्रेम नहीं किया जा सका है। मैं सोच रहा हूँ इसके खिलाफ मुझे सुप्रीम कोर्ट में रिट-पीटिशन दाखिल करनी चाहिए कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को दोषी करार देना कानूनी जुर्म है
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देवेंद्र गोस्वामी की कविताएँ


फ्रांस में एक अतिदक्षिणपंथी नेता के बेटे ने की बड़ी हिंसा

इनका खतरा तुरंत तो नहीं दिखता है, लेकिन बचपन से ही लोगों पर इसका असर पडऩे लगता है। जिन परिवारों में मां-बाप सिगरेट-तम्बाखू, या शराब-जुएं की लत रखते हैं, उन परिवारों में बच्चों का भी इस खतरे में पडऩा अधिक होता है। जहां पर मां-बाप जाति या धर्म के आधार पर, विचारधारा या रंग के आधार पर नफरत की बातें करते हैं, वहां पर बच्चे तुरंत ही नफरत को अपना लेते हैं, और उसे आगे भी बढ़ाते चलते हैं
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प्रेम से परहेज करेंगे तो स्त्री का मन मरेगा, तन उभरेगा

रामनाथ पांडेय ने महेंदर मिसिर’ और पांडेय कपिल ने ‘फुलसुंघी’ नाम से उन पर बहुत पहले ही कालजयी उपन्यास लिखा था, उनके गीत कई दशक से उनके गीत आकाशवाणी से गूंजते रहे हैं लेकिन इधर कुछ सालों से दूसरी वजहों से चरचे में हैं
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राजनीतिक कीर्तन या निंदा से परे आत्ममंथन की जरूरत

जब 140 अक्षरों के ट्वीट पर विश्लेषण कर दिया जाता है, तो लोग अतिसरलीकरण के शिकार हो जाते हैं। और आज यही हो भी रहा है। मोदी की उत्तरप्रदेश में इस ऐतिहासिक जीत को जो लोग वोटिंग मशीन का घपला मानकर चल रहे हैं, वे लोग अपने आपको धोखा दे रहे हैं। अगर मोदी या किसी के भी हाथ में मशीनों से छेड़छाड़ की ताकत होती, तो पंजाब में अकाली-भाजपा आज फुटपाथ पर क्यों बैठे होते
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आलोचना, अज्ञान और अवसर

विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का इस तरह की आलोचना में मुख्य योगदान है । पूरी तैयारी के साथ आलोचना लेखन का स्थान सरसरी तौर पर रचना का परिचय देने और सार संक्षेप बताने तक सीमित होने लगा । यह वैसा ही हुआ कि हाईवे पर जाने की बजाए हिंदी आलोचना ने आसान पगडंडियां ढूंढनी शुरू कर दी ताकि कठिन रास्ते से जाने का श्रम नहीं करना पड़े । आलोचकों और समीक्षकों ने भी हाल के दिनों में साहस के साथ लिखना छोड़ दिया है
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कांग्रेस का राहुलमुक्त होना आज उसके जिंदा बचने की पहली शर्त

यह चेहरा जनधारणा के मुताबिक बहुत ही मामूली समझ वाला चेहरा है। लोग राहुल गांधी को इतने बरसों की कांग्रेसी-मेहनत के बावजूद गंभीरता से नहीं ले पाए हैं, क्योंकि राहुल में लीडरशिप की खूबियां सिरे से ही नहीं उपज पाई हैं, नहीं पनप पाई हैं। राहुल गांधी की अगुवाई में 2019 या 2024 में भी कांग्रेस पार्टी कभी सत्ता तक पहुंच पाएगी, ऐसा कोई संकेत आज नहीं मिलता। कांग्रेस के इतिहास में इतनी कमजोर लीडरशिप कभी याद नहीं पड़ती, और जब देश की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी थी
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महाकवि काशीनाथ पाण्डेय की जयंती

पटना। आई आई बी एम सभागार में डॉ.उत्तम सिंह की अध्यक्षता में महाकवि काशीनाथ पाण्डेय का जयंती समारोह सुसंपन्न हुआ। सर्वश्री श्रीराम तिवारी, विशुद्धानंद पाण्डेय, डॉ.शंकर, डॉ.सतीशराज पुष्करणा, डॉ.लक्ष्मी सिंह, कल्याणी सिंह, डॉ.पुष्पा जमुआर, डॉ.विनोद कुमार मंगलम, अरुण शाद्वल एवं डॉ. बी .एन. विश्वकर्मा ने समवेत रूप से दीपप्रज्जवलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की
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Garbh Gruh

क्लासिक चित्रकला की शैली की तरफ रुख करते हुए पारंपरिक वेशभूषा और आदमियों के सटीक चेहरों के चित्र बनाना शुरु कर दिया था । उस समय उनकी मॉडेल हुआ करती थी, मारितेरेज बाल्टेयर। मगर अचानक विश्वयुद्ध की विभीषिका ने उनकी चित्रकला की शैली को बदल दिया था। धीरे-धीरे उनके मॉडल का चेहरा विकृत होता जा रहा था। विश्वयुद्ध के परवर्ती समय में अनुशासन हीनता, अत्याचार, निराशा, हताशा और दुख के भावों को पिकासो ने एक विकृत चेहरे के माध्यम से पेश करने का प्रयास किया था
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समय सजग कवि हैं विनय: रविभूषण

पटना । माॅल में कबूतर भारतीय भाषाओं में संभवतः अकेली पुस्तक होगी जिसकी सभी कविताएं बाजार केंद्रित हैं। संग्रह की 38 कविताओं में से 15 में माॅल की चर्चा है। माॅल आखिर है क्या और बाजार आखिर है क्या? बाजार पहले बाजार में था अब बाजार में नहीं है
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चुनावी साजिश में भागीदार मीडिया लोकतंत्र का स्तंभ कैसे हो सकता है

प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया से होते हुए कचरे की टोकरी में पहुंच गया, जबकि इसकी जांच रिपोर्ट में यह बात खुलकर सामने आई थी कि इन सारे बड़े-बड़े अखबारों ने भारी भ्रष्टाचार के तहत ऐसी रिपोर्ट छापी थीं। जब उस पूरे मामले में जांच के बाद भी कुछ नहीं हो पाया, तो अब चुनाव आयोग ने खुद पुलिस रिपोर्ट लिखवाना शुरू किया है
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बिहार दिवस पर गूंजेगी सुनिधि चौहान की आवाज

पटना । बिहार दिवस समारोह में बॉलीवुड की मशहूर गायिका सुनिधि चौहान पटना आएंगी। गांधी मैदान में 22 मार्च को उनकी सुरीली आवाज का लोग आनंद उठाएंगे। मुख्य मंच पर उनका कार्यक्रम होगा
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हिंदी लेखन के पंचमुखी दीपक

जिन उपन्यासों पर फिल्में बनीं वो हैं- वर्दी वाला गुंडा, सबसे बड़ा खिलाड़ी और इंटरनेशनल खिलाड़ी प्रमुख हैं । उन्नीस सौ पचासी में उनके उपन्यास ‘बहू मांगे इंसाफ’ पर शशिलाल नायर के निर्देशन में ‘बहू की आवाज’ के नाम से फिल्म बनी थी । उन्होंने कई फिल्मों की स्क्रिप्ट और सीरियल के लिए भी लेखन किया । वेद प्रकाश शर्मा हर साल दो तीन उपन्यास लिखते थे और हर उपन्यास की शुरुआती डेढ लाख प्रतियां छपती थीं
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सार्वजनिक जीवन के लोग तो दावतों पर खर्च सीमित रखने जितनी समझदारी दिखाएं...

बाद में आर्थिक उदारीकरण की आंधी में उस एक्ट के पन्ने कहां गए, यह भी लोगों को याद नहीं है। लेकिन आज इस पर चर्चा की फिर से जरूरत है क्योंकि देश में आर्थिक असमानता इतनी बढ़ रही है कि बड़े लोगों की देखा-देखी मध्यम वर्ग भी अपनी ताकत से बाहर का खर्च करने लगा है, और दिखावे में देश की उत्पादकता तो खत्म हो ही रही है
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