किसी भी लोक का इतिहास, परंपरा और
संस्कृति उसकी बोली में ही सुरक्षित रहती है। हमारा देश इस दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ हज़ारों बोलियाँ बोली और समझी जाती हैं। जो लोग जिन बोलियों में अपने को व्यक्त करते हैं, उनके जीवन का उत्सव-उल्लास, उनका रस-रंग, उनके संस्कार, सुख-दुख, रहन-सहन, रीति-रिवाज, उनकी विजयगाथाएँ, उनका नेतृत्व कौशल और उनके प्रयोगधर्मी पूर्वजों द्वारा संकलित समस्त ज्ञान का भंडार उस बोली में सुरक्षित रहता है। ये बोलियाँ हमारी विविधरंगी संस्कृति और ज्ञान परंपरा की वाहक हैं।
वैश्वीकरण के इस दौर में शहरी समृद्धि तो बढ़ी है, नूतन ज्ञान-विज्ञान द्वारा उपलब्ध करायी गयीं सुविधाएँ जीवन को ज़्यादा वैभव संपन्न और सुखी बनाने में तो समर्थ हुई हैं परंतु तमाम तरह के अभावों के बावजूद अपनी बोली और संस्कृति को जीने वाले ग़रीब ग्राम्यांचलों की अपनी जीवन-शैली पर गहरा संकट भी पैदा हुआ है। गाँव को बाज़ार की तरह देखने वाले उन्हें उनकी समस्त सांस्कृतिक सत्ता के साथ निगल जाने को तैयार हैं। अभाव, भूख और शोषण की पीड़ा के बावजूद सदियों से हँसते-गाते उत्सवाकुल गाँव-देहात भी इस चमक की ओर ललचाई नज़रों से देख रहे हैं। वे अपने संस्कार, अपने उत्सव अपनी बोली तक को छोड़कर नयी अर्थसभ्यता की नंगई में गोता लगाने की प्रतीक्षा में हैं। देश के लिए यह एक बड़ा सांस्कृतिक संकट है। शायद हज़ार साल लंबी गुलामी से भी दुर्धर्ष और भयानक। इसी भयावह पृष्ठभूमि में आगरा में 22-23 मई कोविश्व भोजपुरी सम्मेलन आयोजित हुआ। भारत के अलावा सम्मेलन में मारिशस, सूरीनाम, सिंगापुर, मलेशिया समेत कई देशों से भोजपुरी के विद्वान, बुद्धिजीवी और साहित्यकार अद्वितीय प्रेम और सुलहकुल के इस शहर में मिले। संकट केवल भोजपुरी का ही नहीं है, सारी लोकभाषाओं का है।
कभी साहित्य की भाषा के रूप में विख्यात रही ब्रजभाषा की छाँव में इस सम्मेलन का अपना विशेष महत्व समझा जायेगा। ब्रज और अवधी के विद्वान भी सम्मेलन के कई सत्रों में उपस्थित रहे। इसे सूर और कबीर के मिलन की संज्ञा दी गयी, हरिदास की भूमि पर कबीर के पदार्पण से अभिहित किया गया और सबने मिलकर लोकभाषाओं के अस्तित्व पर आसन्न संकट की गंभीरता पर विचार-विमर्श किया, उनके विकास और समृद्धि के लिए उपायों पर चिंतन किया।
कभी भारतीय साहित्य के अप्रतिम विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी के लिए अलग प्रांत की माँग की थी। उन्होंने बहुत पहले भोजपुरी पर मंडराते ख़तरे को पहचान लिया था। उनका कहना था कि जिन्हें ऊँची पढ़ाई करनी है, वे हिंदी पढ़ें, अँगरेज़ी पढ़ें लेकिन बाक़ी सबको अपनी बोली-भाषा का इतना तो ज्ञान रहना चाहिए कि वे किताबें पढ़ सकें, चिट्ठी-पत्री बाँच सकें। महापंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सोगहग शब्द में भोजपुरी की प्राणशक्ति देखी थी। बचपन में उन्होंने यह शब्द कहानियों में सुना था और बाद में डा. शिवप्रसाद सिंह के अलग-अलग बैतरनी में इसका प्रयोग देखकर इसके उद्गम की पड़ताल की। उन्हें लगा कि संस्कृत के सयुगभाग शब्द का परवर्ती रूप है सोगहग। सयुगभाग का अर्थ है, दोनों हिस्सों समेत यानि सम्पूर्ण। उन्होंने 1976 में अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन में कहा था, सोगहग प्रेम कोई मामूली चीज़ नहीं है, यह निर्मल और निष्कलुष है। सोगहग प्रेम मगर निर्मल चित्त से। भोजपुरी का यह आदर्श सोगहग बराबर स्वीकृत रहेगा और इसी नाते हिंदी के अंतर्गत आने वाली सभी भाषाओं में सर्जनात्मक साहित्य लिखा जाता रहेगा। साथ ही साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान भी मिलता रहेगा।
आगरे का विश्व भोजपुरी सम्मेलन इसी संदर्भ में केवल भोजपुरी के संकट पर केंद्रित नहीं रहा बल्कि सभी बोलियों पर मंडराते संकट को उजागर करने और उसके लिए सबको उठ खड़े होने का संदेश देने में भी कामयाब हुआ। विद्वानों में इस बात पर एकराय दिखी कि भोजपुरी की शब्द संपदा और उसका साहित्य ही उसकी प्राणशक्ति है, इसलिए प्रयास किया जाना चाहिए कि इसे समृद्ध किया जाय। इसके लिए पहली बात तो यह कि भोजपुरी का अपना शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए। भोजपुरी के शब्दों में जो अर्थसंपन्नता है, जीवन के रस-रंग, दुख-दर्द और लोकजीवन के विविध रूपों को अभिव्यक्त करने की जो सामर्थ्य है, वह दुनिया की शायद ही किसी भाषा में हो। इसलिए सर्वाधिक जरूरी काम है, खो जाने या विस्मृत हो जाने से पहले उनका संरक्षण। इस दृष्टि से बिना देर किये भोजपुरी का संपूर्ण शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए। यह सही है कि भोजपुरी में भिखारी ठाकुर जैसा लोककवि हुआ, यह भी सही है कि साहित्य के नज़रिए से भी यह भाषा बहुत समृद्ध रही लेकिन इसका बहुत सारा हिस्सा नष्ट हो चुका है। जो बचा-खुचा है, चाहे प्रकाशित है या लोकस्मृति में, उसका संग्रह बहुत आवश्यक है।
ज़रूरी यह भी है कि ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिभासंपन्न रचनाकार भोजपुरी में लिखें। ऐसे प्रोत्साहन का मार्ग भी तभी खुलेगा, जब भोजपुरी समर्थ दिखेगी। और वह समर्थ होगी अपने लेखकों की रचनाओं के अलावा देश और विदेश की दूसरी भाषाओं के अच्छे साहित्य की उपलब्धता से। ऐसे में दूसरा जो बड़ा काम होना चाहिए, वह अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का भोजपुरी में अनुवाद। हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, उड़िया, कन्नड़ के अलावा अँगरेज़ी, रसियन तथा अन्य विश्व भाषाओं के बड़े लेखकों, कवियों को भोजपुरीभाषी अगर अपनी भाषा में पढ़ पायें, तो भोजपुरी से नयी पीढ़ी को भी जोड़े रखना संभव हो पायेगा।
मारिशस से आयीं सरिता बुधू ने याद किया वह दिन, जब कोलकाता से पहला जहाज बिहार और यूपी के मज़दूरों को लेकर रवाना हुआ था। कलकतवा सेचलल बा जहजिया, बयरिया रे धीरे बहो। जब हिंदुस्तान के गुलाम गिरमिटिया मज़दूर के रूप में भेजे गये, तब वे अपने साथ गीता, रामायण भी ले गये। उनके साथ पूरी भाषा-संस्कृति जहाज पर सवार हुई थी। वे अपना स्वाभिमान, अपनी मेहनत, अपनी कर्मनिष्ठा भी ले गये। यही कारण था कि वे गये तो मजूर वनकर पर अब हैं हुजूर बनकर, गये तो थे गिरमिटिया के रूप में पर अब कई देशों में हैं गवर्नमेंट के रूप में। भोजपुरी अब भी मारिशस, सूरीनाम, टोबागो, ट्रीनीडाड में बोली जाती है लेकिन जैसा भोजपुरियों का सबसे घुलमिल जाने का आचरण रहा है, वैसे ही अलग-अलग देशों में जाकर भोजपुरी भाषा ने भी वहाँ की स्थानीय भाषाओं के तमाम शब्द आत्मसात कर लिये, उन भाषाओं को भी अपने शब्द दिये। भारत के भोजपुरीभाषियों को उनसे सबक लेना चाहिए। भोजपुरी को उन शब्दों से परहेज़ नहीं करना चाहिए, जो दूसरी भाषाओं के होकर भी उनके लोकमानस में गहरे उतर गये हैं। उन्हें अपना बना कर भोजपुरी और मज़बूत होगी। भोजपुरी को अपनी खिड़कियाँ, दरवाज़े खुले रखने चाहिए, ताकि विश्वस्तरीय साहित्य सर्जन की ताज़ी हवा से वह वंचित न रहे।
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भी उभरी लेकिन उस पर बहुत ज़ोर नहीं दिखा। भोजपुरी जब सामर्थ्यवान होगी, समृद्ध होगी, उच्च कोटि के साहित्य से संपन्न होगी, तब सरकार पर स्वयं ही इस बात का दबाव बनेगा कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में डाल दिया जाना चाहिए। भोजपुरी साहित्य के लिए समर्पित जो कवि, लेखक और विद्वान सम्मेलन में शामिल हुए उनका भी नज़रिया यही था कि भोजपुरी आंदोलन को राजनीतिक बनाने की जगह उसे सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इससे भोजपुरी को दूसरी लोकभाषाओं के समर्थ नेतृत्व का समर्थन भी मिलेगा। सम्मलेन के अंतिम दिन भोजपुरी मां की सेवा में समूची जिंदगी होम कर देने वाले साहित्यकार और भोजपुरी आन्दोलन को निरंतर संगठित रखने में अपना सर्वस्व निछावर कर देने वालेपाण्डेय कपिल को सेतु सम्मान दिया गया। कपिलजी भोजपुरी साहित्य सम्मलेन पत्रिका के संपादक रहे। उनकाफुलसुंघी उपन्यास काफ़ी चर्चित रहा। भोजपुरी में एक ग़ज़ल संग्रह अचके कहा गईल भी उनके नाम है। भोजपुरी के समर्थ रचनाकार औरपाती के संपादक अशोकद्विवेदी तथा भोजपुरी गीतों के सुकुमार गायक डा. कमलेश राय का मानना है कि पांडेयजी का सम्मान इस सम्मेलन की एक बड़ी उपलब्धि है। इससे भोजपुरी के लिए लड़ने वालों का उत्साह बढेगा।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 34 साल पहले भोजपुरियों से आग्रह किया था, हम आप लोगनि के यादि दिलाईं जे हिंदी आ भोजपुरी के एके समझि के काम करेके चाही। दूनो के दुइ मन से झंझट होई। भोजपुरी लिखे वाला साहित्यकार भी नमस्य बाड़े आ हिंदी में लिखे वाला भी प्रणम्य बाडे। भोजपुरियों को यह भाव मैथिल, ब्रज, अवधी और अन्य बोलियों तक भी ले जाना चाहिए। इसी से भोजपुरी की शक्ति बढ़ेगी, इसी में हमारी संस्कृति और भाषा का संरक्षण सुनिश्चित हो सकेगा।

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