पौड़ी ।
गढ़वाली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल होने की संभावना को देखते हुए मण्डल मुख्यालय, सांस्कृतिक एवं पर्यटक नगरी पौड़ी में भी हलचल शुरू हो गई है। सांसद सतपाल महाराज द्वारा लोक सभा में इस दिशा में की गई पहल का भी गर्मजोशी से स्वागत किया गया है। वहीं साहित्य अकादमी द्वारा गढ़वाली भाषा के विकास में उत्कृष्ट साहित्य को भी अब प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए के सम्मान की घोषणा के बाद से ही गढ़वाली भाषा में साहित्य सृजन करने वाले लेखकों में अति उत्साह देखा जा रहा है। हाल ही में पौड़ी में आयोजित एक बैठक में सुप्रसिद्ध गीतकार और गायक नरेन्द्र सिंह नेगी की अध्यक्षता में ‘लोक भाषा साहित्य समिति’ का गठन किया गया है।
गठन से पूर्व गढ़वाली भाषा, साहित्य और विकास पर गंभीर चर्चा की गई। गढ़वाली भाषा को बचाए और बनाए रखने में प्रमुख भुमिका निभा रहे नरेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि गढ़वाली भाषा इन्डो-आर्यन के समय से चली आ रही भाषा है। इसे आठवीं अनुसूची में शामिल किया ही जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्कृति और समाज का ज़िंदा रहना उस समाज में बोली जाने वाली भाषा के विकास पर निर्भर करता है। गढ़वाली भाषा, कला और संस्कृति से जुड़े विद्धानों ने लोक भाषा साहित्य समिति के पंजीकरण, कार्य और उद्देश्यों पर चर्चा की। गीतकार एवं गायक नरेन्द्र सिंह नेगी की संरक्षण में समिति का औपचारिक गठन किया गया। उपाध्यक्ष संस्कृतिकर्मी त्रिभुवन उनियाल और महासचिव अद्वैत बहुगुणा को चुना गया। सुप्रसिद्ध चित्रकार बी.मोहन नेगी, गणेश खुगशाल ‘गणी’, खबरसार के संपादक बिमल नेगी, गायक और निर्देशक अनिल बिष्ट, पत्रकार एल.मोहन कोठियाल, नरेन्द्र कठैत, मनोहर चमोली ‘मनु’, वीरेन्द्र पंवार सहित बीस सदस्यीय समिति का तदर्थ गठन किया गया।
जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ को श्रद्धांजलि
जन कवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के देहावसान पर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई और उनके परिवार को हर संभव सहयोग किये जाने पर भी चर्चा हुई। इस अवसर पर उपस्थित संस्कृतिकर्मियों को पौड़ी में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित दो दिवसीय गढ़वाली भाषा सम्मेलन की प्रगति आख्या से भी अवगत कराया गया। गढ़वाली अखबार ‘ख़बरसार’ के संपादक बिमल नेगी ने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएँ बोलने वालों की संख्या के लिहाज से भारत में 16 वें और 17 वें स्थान पर हैं। यही कारण है कि इन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल होने का दावा पुख़्ता हो जाता है।
इस अवसर पर गढ़वाल सभा द्वारा प्रकाशित गढ़वाली शब्दकोश की भी सराहना की गई। पत्रकार और संस्कृतिकर्मी गणेश खुगशाल गणी ने कहा कि संशोधित संस्करणों के परिणामस्वरूप गढ़वाली शब्दकोश में तीन चौथाई तक शब्द संग्रहीत किये जा चुके हैं।
वक्ताओं ने गढ़वाली भाषा के उन्नयन में योगदान कर रहे साहित्यप्रेमियों और संस्कृतिकर्मियों को एक मंच में लाए जाने के प्रयास होने चाहिए। गढ़वाली लोक गीत, गाथाओं, कहावतों और शैलियों का संरक्षण आवश्यक है। गढ़वाली साहित्यकार नरेन्द्र कठैत ने कहा कि संरकारी संरक्षण के बिना भी प्रदेश में ऐसे कई भाषाविद् हैं जिन्होंने अपने स्तर पर गढ़वाली को बचाए और बनाए रखने के सार्थक प्रयास किये हैं। उन्हें भी समिति एक मंच दे और उनके कार्यो का प्रचार-प्रसार भी करे।
इस अवसर पर दुनिया भर में तेज़ी से मर रही भाषाओं पर चिंता जताई गई। संस्कृतिकर्मियों ने कहा कि भविष्य में लोक भाषा साहित्य समिति बोली-भाषाओं के आदान-प्रदान और समन्वय के लिए समारोह का आयोजन करेगी। इस अवसर पर साहित्य अकादमी द्वारा गढ़वाली भाषा में योगदान को पहली बार सम्मानित किए जाने की घोषणा का भी स्वागत किया गया। गौरतलब हो कि हाल ही में साहित्य अकादमी ने गढ़वाली भाषा के सुदामा प्रसाद प्रेमी और प्रेम लाल भट्ट को संयुक्त रूप से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। ये दोनों साहित्यकार मूलतः पौड़ी के ही हैं।

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