वर्धा ।
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ की ओर से ‘हमारा समय और साहित्य’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान समारोह में बतौर मुख्य वक्ता के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार आलोचक प्रो. शिवकुमार मिश्र ने कहा कि मानव ने चुनौतियों के बीच ही सभ्यता का विकास किया है। आज हम भूमण्डलीकरण के दौर में शामिल होकर आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। आज की केन्द्रीय चिंता मनुष्य का मनुष्य बने रहने की है। बाज़ार, पूँजी, सत्ता आदि मनुष्यता को छीने जा रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति हमें हिंसक बनाती हैं, हिंसक रूप अख़्तियार कर ही हम भौतिक सुख-सुविधाओं को अपनाना चाहते हैं। आज का समय सबसे कठिन समय है और क्रूर भी। साथ ही रचना विरोधी और मनुष्यता विरोधी भी है। साहित्य हमें मनुष्य होने की तमीज देता है। मनुष्यता के लिए हमें साहित्य से जुडे रहने की ज़रूरत है।
प्रो. मिश्र ने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘कविता क्या है’ में कविता का संबंध आदमीयत से जोडा है। धूमिल ने भी कविता को आदमी होने की तमीज़ बताया है। प्रेमचन्द के महाजनी सभ्यता का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सारे मानवीय व सामाजिक संबंध व्यावसायिक संबंधों में तब्दील हो चुके हैं। आज दुनिया बाजार में बदल रही है जो चुनौती औपनिवेशिक दौर में थी आज उससे भी भयावह हो गई है। कुछ छिपी ताक़तें मुखौटे लगाकर जनतंत्र् की रक्षा, जनकल्याण आदि जुमले देकर अपना हित साध रही हैं। आज जो नया मध्यवर्ग है वो बाज़ार के तिलिस्म को स्वीकार किए हुए हैं। उन्होंने कहा कि हमारे समय में बाजारू शब्द को गाली समझा जाता था पर आज बाज़ारू होना आन, बान और शान जैसा माना जाने लगा है। साहित्यकार एक-दूसरे पर प्रयोजनबद्ध तरीके से लेखन कर रहे हैं इसलिए साहित्य और जनता के बीच बहुत बडी खाई आ गई है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि आज हम उत्तर आधुनिकता की बात करते हैं। दुनिया के कई सारे देशों में आधुनिकता भी नहीं आयी है। उन्होंने प्रो. मिश्र के वक्तव्यों का समर्थन करते हुए कहा कि यह सही है कि आज का समय क्रूर व मनुष्यता विरोधी है। उन्होंने आशावादी नज़रिए से कहा कि मुश्किल समय में बेहतर साहित्य रचे जाते हैं। आज हम जितनी मुश्किल घडी से गुज़र रहे हैं, ऐसे में भी मनुष्यत्व के लिए अच्छी रचनाएँ रची जाएँगी। स्वागत वक्तव्य में साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि एक तरफ उदारीकरण, अमेरिकीकरण हो रहा है, तो दूसरी ओर हम जाति, वर्ग विभाजन की खाई से कबीलाई संस्कृति की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। आज मुद्दा यह बन गया है कि कैसे हम मनुष्यता को बचाए रखें तथा प्रगतिशील बने रहें।
विश्वविद्यालय के विशेष कर्त्तव्याधिकारी राकेश ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि सच्ची बात कहने के साहस से ही सच्ची रचना बन जाती है। संचालन साहित्य विद्यापीठ के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अरुणेश नीरन ने किया।

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