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मूल्याँकन

 

शमशेरियत और हिन्दी कविता

सृजन-शिल्पी

 

        हर कवि मूलत: सौंदर्य का ही कवि होता है। कवि की चेतना हर समय सौंदर्य का साक्षात्कार पाने के लिए विकल रहती है और इसी कारण वह ऐसे स्थलों पर भी सौंदर्य को रेखांकित करने और उसे उदघाटित करने में सक्षम हो पाती हैं जहाँ सामान्य दृष्टि उसे देख पाने में विफल रहती है। कवि की आँखों में ही एक विशेष सौंदर्य-दृष्टि होती है। परंतु सौंदर्य का कोई-न-कोई सरोकार भी होता है। प्रकृति ने सौंदर्य की सृष्टि उसके साथ अनिवार्य रूप से एक महत्वपूर्ण प्रयोजन को जोड़कर ही की है। कवि या कलाकार की महानता इसमें है कि वह न सिर्फ प्रकृति की सौंदर्य-सृष्टि को निहारे, वरन उसके साथ अभिन्न रूप से जुड़ी उसकी सरोकार-दृष्टि को भी पहचाने। कोई भी बड़ा कवि सौंदर्य को उसके अधूरे आयाम में ही देखकर नहीं रह जाता और विशेषकर शमशेर बहादुर सिंह जैसा प्रतिबद्ध कवि तो कदापि नहीं। इसलिए जब विजयदेवनारायण साही जैसे जाने-माने आलोचक शमशेर को विशुद्ध सौंदर्य का कवि के रूप में संबोधित करते हैं और फिर उन्हें अत्यंत महान कवि भी घोषित करते हैं तो एक साथ कई प्रश्न उठना स्वाभाविक है। अपने चर्चित आलोचनात्मक निबंध शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट में साहीजी लिखते हैं--

 

        तात्विक रूप में शमशेर की काव्यानुभूति सौंदर्य की ही अनुभूति है।....आज तक हिन्दी में विशुद्ध सौंदर्य का कवि यदि कोई हुआ है तो वह शमशेर हैं। और इस आज तक में मैं हिन्दी के सब कवियों को शामिल करके कह रहा हूँ।....सच तो यह है कि शमशेर की सारी कविताएँ यदि शीर्षकहीन छपें, या उन सबका एक ही शीर्षक हो, सौंदर्य, शुद्ध सौंदर्य तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। शमशेर ने किसी विषय पर कविताएँ नहीं लिखी हैं। उन्होंने कविताएँ, सिर्फ कविताएँ लिखी हैं, या यों कहें कि एक ही कविता बार-बार लिखी है।

 

        साहीजी के उपर्युक्त कथन ने हिन्दी आलोचना में बहुत हलचल मचाई। साही जी की इस धारणा का तीव्र प्रतिवाद करते हुए नामवर सिंह ने कहा--

 

        जो शमशेर को शुद्ध सौंदर्य का कवि मानने के आग्रही हैं उनकी आँख खोलने के लिए उन छवियों की ओर संकेत करना पर्याप्त होगा जिनमें अकुंठ मन से शरीर का उत्सव रचा गया है। शमशेर के लिए सौंदर्य एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा है जिसमें जंघाएँ ठोस दरिया/ ठैरे हुए से हैं। .... शमशेर के लिए इतना ही काफी है कि वे कवि हैं--सिर्फ कवि। न शुद्ध कविता (सौंदर्य) का कवि, न कवियों का कवि, न प्रयोग का कवि और न प्रगति का कवि! कुछ कवि ऐसे होते हैं जिन्हें हर विशेषण छोटा कर देता है।

 

        लेकिन साहीजी की स्थापना का सबसे प्रखर शब्दों में खंडन विष्णु खरे ने यह कहते हुए किया--

 

        शमशेर के वक्तव्य के दो अंशों के गलत अथवा विकल पाठ के आधार पर साही ने शमशेर की कविताओं की बनावट और उसके सौंदर्य के बारे में जो स्थापना की है वह दिलचस्प है.... जिन्होंने शमशेर की कविताओं को पढ़ा है क्या वे वाकई उन्हें सौंदर्य, शुद्ध सौंदर्य के (एक ही) शीर्षक के नीचे रख सकते हैं? क्योंकि (तब यह) बहस...एकदम उठेगी, कि अव्वल तो सौंदर्य माने क्या और फिर विशुद्ध सौंदर्य के क्या माने? यदि विशुद्ध सौंदर्य का अर्थ राजनीति के प्रदूषणकारी स्पर्श से मुक्त निजी रागमयता भी मान लें तो शमशेर की दर्जनों वैसी दूषित कविताओं को अन्य उन्हीं की सुन्दर शुद्ध कविताओं के साथ कैसे रखेंगे? और शमशेर के यहाँ जो कथ्य, शिल्प, बिम्ब और संगीत का मिला-जुला वैविध्य है उसे देखते हुए आप यह कैसे कह देंगे कि शमशेर ने एक ही कविता बार-बार लिखी है? यदि शमशेर की हर कविता पर उनकी एक न एक प्रकार की छाप है, जिसे आप पहचान लेते हैं और आनंदित होते हैं, तो भी वे एक ही कविता तो न हुई।

 

        दरअसल जब भी किसी बड़े कवि की कविताओं की सुचिंतित या अनजानी गलत व्याख्या होती है तो प्रकारांतर से वह उसके प्रति बहुत गहरे सम्मान और उसकी कविताओं के दहलाने वाले असर की ही परिचायक होती है। शमशेर इस मामले में हिन्दी के सबसे घातक और खतरनाक कवि हैं। शमशेर उन कुछ कवियों में हैं, जो आलोचकों के सामने एक चुनौती, एक संकट के रूप में सामने आते हैं। उनकी कविता बहुत दौड़ाती है, नचाती है और कसरतें करवाती है। अक्सर वह दूर की कौड़ी लाने के प्रलोभन को प्रोत्साहित करती है। एक तरफ वह आलोचक में बौना या बेचारा हो जाने की आत्मदया जगाती है तो दूसरी ओर मैं कितना प्रतिभावान हूँ कि ऐसे कवि को समझ-समझा रहा हूँ जैसा आत्माभिनंदन उगाती है। जब प्रतिभावान आलोचकों में किसी कवि को व्याख्यायित करने, उस पर एकाधिकार स्थापित करने की होड़ लग जाए तो उनकी आलोचना का जो भी हो, कवि की जगह तो तय हो चुकी।

 

        नामवर सिंह और विष्णु खरे की उपर्युक्त टिप्पणियों को खुद शमशेर की कविताओं और उनके आत्म-वक्तव्यों के सही और समग्र परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें तो शमशेर की सौंदर्य-दृष्टि पर नए सिरे से विचार करने का बेहतर मार्ग मिल सकता है। इसके लिए पहली जरूरत उस व्यापक सौंदर्यशास्त्र की खोज करने की है जिसके अंतर्गत शमशेर को प्रतिबद्धता बनाम निजी एकांतिक रागात्मकता आदि के विवाद से निकालते हुए उनके समग्र सृजन को अकुंठ भाव से स्वीकारा और समझा जा सके।

 

        शमशेर की कविताओं को पढ़ते हुए एक मनोवैज्ञानिक सूत्र मन में रह-रहकर कौंधता है-- जो नहीं है, उस अभाव को अवचेतन निर्बाध स्वप्निल कल्पना के माध्यम से पाट लेना मन का स्वाभाविक धर्म है, लेकिन चूंकि अभाव की यह भाव-पूर्ति क्षणिक होती है इसलिए चेतन अवस्था में वह उस अभाव के मूल कारणों के विरुद्ध संघर्ष भी करता है। शमशेर की कविता में ये दोनों मानसिक प्रक्रियाएँ साथ-साथ घटित होती हैं, क्योंकि वह एक ऐसे मानसिक धरातल से निकलती है जहाँ उसमें अवचेतन और बाल-मन की वितथीकृत साहसपूर्ण कल्पना और चेतन एवं वयस्क मन की प्रतिबद्ध संघर्षशील ऊर्जा एक साथ समाहित हो जाते हैं। इसीलिए उनकी कविता एक छोर पर जहाँ विशुद्ध निजी, एकांतिक रागात्मकता की उपज मालूम पड़ती है, वहीं दूसरे छोर पर घोर प्रगतिवादी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति भी जान पड़ती है। अधिकतर आलोचकों ने शमशेर की सौंदर्य-दृष्टि के इन दो आयामों को एक साथ, समग्र रूप में देखने से प्राय: बचने की कोशिश की है, क्योंकि वे उन्हें अपने-अपने सौंदर्यवादी तथा प्रगतिवादी खेमों में अलग-अलग शामिल करना चाहते रहे हैं। लेकिन खुद शमशेर, जिन्होंने कामयाब कवि बनने की बजाय सच्चा (genuine) कवि बनने में अपने लिए अधिक संतोष की बात समझी, अपनी कविताओं में इस तरह की विभक्त-दृष्टि के चिह्न कहीं नहीं छोड़ते और इस बात को उनकी कविताओं के अविकल पाठ के आधार पर ही परखा जा सकता है। जैसे, अपनी कविता मुझको मिलते हैं अदीब और कलाकार बहुत में वह कहते हैं--

 

मुझको मिलते हैं अदीब और कलाकार बहुत

लेकिन इन्सान के दर्शन हैं मुहाल।

 

दर्द की एक तड़प--

हल्के-से दर्द की एक तड़प,

सच्ची तड़प

मैंने अगलों के यहाँ देखी है;

 

        यहाँ शमशेर अदीब और कलाकार के बजाय उस इन्सान में सौंदर्य खोजते हैं जिसमें दर्द की सच्ची तड़प हो। क्या विशुद्ध सौंदर्य इसी को कहते हैं? यदि हाँ, तो इसका प्रगतिवादी प्रतिबद्धता से विरोध कहाँ है?

 

        शमशेर की कविताओं को यदि समग्र दृष्टिकोण से पढ़ा जाए और उनमें अभिव्यक्त सौंदर्यानुभूति को उपर्युक्त मनौवैज्ञानिक सूत्र के आलोक में समझा जाए तो साहीजी के इस निष्कर्ष की निर्मूलता जाहिर हो जाती है कि शमशेर की नितांत निजीपन वाली और प्रगतिवादी मुद्राओं के बीच एक अलंघ्य खाई है, जिसे वे भर नहीं पाते। लेकिन साहीजी मनोविश्लेषण को कविता की समझ के संदर्भ में उचित उपाय नहीं मानते। वह कहते हैं--

 

        मनोविश्लेषण को ही काव्य-विश्लेषण का पर्याय मानने वाले इस स्थिति को विभाजित व्यक्तित्व का सटीक उदाहरण समझकर संतुष्ट हो जाएंगे। लेकिन मनोविश्लेषण आदमी के व्यक्तित्व के बारे में जो कुछ भी बतलाता हो, कविता के बारे में कुछ नहीं बतलाता। क्योंकि कविता का आधार वह निजीपन है, मनोविश्लेषण का अहं जिसके आगे सतही मालूम पड़ता है।

 

        मेरी दृष्टि में किसी मनोविश्लेषण से असहमत होने की बात तो समझ में आती है, लेकिन यह कहना कि मनोविश्लेषण कविता के बारे में कुछ भी नहीं बतलाता कुछ हजम न होने वाली बात जैसी लगती है। फ्रायड की इस व्याख्या को एकदम नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि सारी कलाएँ दमित, कुंठित इच्छाओं की परिष्कृत प्रतिक्रिया मात्र हैं। मुक्तिबोध ने भी, जिन्होंने शमशेर को सबसे पहले और सबसे सही समझा था, अपने निबंध शमशेर: मेरी दृष्टि में में उनकी कविताओं की मनोवैज्ञानिक व्याख्या ही की है।

 

 

        ‘‘दूसरा सप्तक’’ में प्रकाशित शमशेर के आत्मवक्तव्य के निम्नलिखित वाक्यों को साहीजी अपने निबंध शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट में उनकी कविताओं की सौंदर्यवादी व्याख्या के लिए टेक की तरह करते हैं:

 

        हम आप ही अगर अपने दिल और नजर का दायरा तंग न कर लें तो देखेंगे कि हम सब की मिली-जुली जिंदगी में कला के रूपों का खजाना हर जगह बेहिसाब बिखरा चला गया है। सुन्दरता का अवतार हमारे सामने पल-छिन होता रहता है। अब यह हम पर है, खास तौर से कवियों पर, कि हम अपने सामने और चारों ओर की इस अनंत और अपार लीला को कितना अपने अंदर घुला सकते हैं।

 

        लेकिन इन वाक्यों की स्वयं शमशेर द्वारा ठीक इन्हीं वाक्यों के बाद की गई इस व्याख्या को बिल्कुल नजरंदाज कर देते हैं कि

 

        इसका सीधा-सादा मतलब हुआ अपने चारों तरफ की जिन्दगी में दिलचस्पी लेना, उसको ठीक-ठीक यानी वैज्ञानिक आधार पर (मेरे नजदीक यह वैज्ञानिक आधार मार्क्सवाद है) समझना और अपने अनुभव को इसी समझ और जानकारी से सुलझा कर स्पष्ट करके, पुष्ट करके अपनी कला-भावना को जगाना

 

        शमशेर द्वारा अपनी सौंदर्य-दृष्टि की स्वयं की गई उक्त व्याख्या तथा उनकी कविताओं के पूर्वग्रहमुक्त अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में साहीजी के एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष की परख भी आवश्यक हो जाती है। साहीजी के मुताबिक--

 

        मार्क्सवादी शुद्ध वस्तुपरकता और अतियथार्थवादी शुद्ध आत्मपरकता के दो हाशियों के बीच शमशेर की काव्यानुभूति एक व्याकुल शांति की तरह स्थिर है’, जहाँ एक तरफ कवि को सिर्फ एक मरा वर्तमान और मरा हुआ भविष्य हाथ लगता है तो दूसरी तरफ घिरा हुआ असीम

 

        कोई आलोचक किसी कवि को महान घोषित करते-करते उसे किस सीमा तक अधोगति तक ले जा सकता है, उपर्युक्त निष्कर्ष इसका एक विरल उदाहरण है। ख़ैर। आइए, इस निष्कर्ष पर आगे बात करने से पहले शमशेर की एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता एक नीला आइना बेठोस’  सामने रखते हैं --

 

एक नीला आइना

       बेठोस-सी यह चाँदनी

और अन्दर चल रहा हूँ मैं

       उसी के महातल के मौन में।

मौन में इतिहास का

       कन किरन जीवित, एक, बस।

आत्मा है

अखिल की हठ-सी।

       चाँदनी में घुल गए हैं

बहुत से तारे बहुत कुछ

घुल गया हूँ मैं

बहुत कुछ अब।

रह गया-सा एक सीधा बिंब

चल रहा जो

शांत इंगित-सा

न जाने किधर।

 

        इस कविता की कसौटी पर यदि साहीजी के उपर्युक्त निष्कर्ष को रखें तो वह इस कविता की सतही व्याख्या करता हुआ प्रतीत होता है। यद्यपि, इस कविता में अभिव्यंजित सौंदर्य हर किसी को अभिभूत करने में सक्षम है, परंतु यह कविता भी अवचेतन के स्वप्निल प्रभाव से उपजी वितथीकृत गहन कल्पना और सचेतन की संघर्षशील क्षीण-सी ऊर्जा से समन्वित बिंबों की छटा को ही रूपायित करती है, जिसमें न तो आत्मपरकता हाशिए पर है और न ही वस्तुपरकता। एक दूसरी कविता सागर-तट देखें--

 

पी गया हूँ दृश्य वर्षा का:

हर्ष बादल का

हृदय में भर कर हुआ हूँ हवा सा हलका

धुन रही थीं सर

व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें

वहीं आ-आकर

जहाँ था मैं खड़ा

मौन;

समय के आघात से पोली, खड़ी दीवारें

जिस तरह घहरें

एक के बाद एक, सहसा।

चाँदनी की उँगलियाँ चंचल

क्रोशिये से बुन रही थीं चपल

फेन-झालर बेल, मानो।

 

        इस कविता में संघर्षशील ऊर्जा तीव्र है, एक नीला आइना बेठोस के ठीक विपरीत ध्रुव पर स्थित, जहाँ अवचेतन का शांत कल्पनालोक पूरे परिदृश्य पर छाया हुआ है बिखरी हुई तरल चाँदनी की भाँति, जबकि चेतन की संघर्षशील ऊर्जा एक कन किरन बनकर अखिल की हठ-सी रह गई है। समय के आघात से पोली खड़ी दीवारों के एक के बाद एक, सहसा घहरने की अंतर्ध्वनि 1949 में उदिता की अप्रकाशित भूमिका में साफ सुनाई दे जाती है--

 

        अर्जुन, जिनको तू अपने सामने गर्जन करता हुआ देखता है, उसका नाश तो पहले ही हो चुका है। आँखें खोलकर देख, इतिहास कहाँ से कहाँ पहुँच चुका है। दुनिया भर में एक समान, सुखी मजदूर-किसान का राज है !

 

        बादल का हर्ष हृदय में भरकर हवा-सा हल्का होने की मन:स्थिति किसी चिरसंचित अभिलाषा के पूरा होने की स्थिति में होने वाले आह्लाद की भाँति है जब आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे की भाव-तरंग से व्यक्ति आप्लावित रहता है। इतनी बड़ी खुशी क्या नितांत व्यक्तिपरक हो सकती है!

 

        शमशेर की कविता को पढ़ते हुए अकसर यह प्रश्न मन में उठता है कि वह क्या है जो शमशेर को उदात्त, महाकाव्यात्मक कल्पना और बीहड़ ठोस बिंबों की सृष्टि के लिए उत्प्रेरित करता है? जैसे इन कविताओं को देखिए--

 

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता

 

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता

पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता

बढ़ रहा है

कितनी ऊँची घास चाँद-तारों को छूने-छूने को हैं

जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है

अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ

फिर क्यों

       दो बादलों के तार

       उसे महज उलझा रहे हैं?

.........

                                   

टूटी हुई, बिखरी हुई

 

मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं

       एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।

मुझको सूरज की किरनों में जलने दो--

       ताकि उसकी आँच और लपट में तुम

       फौवारे की तरह नाचो।

 

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।

मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

       और चमक रहा हूँ कहीं....

       न जाने कहाँ।