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..युवा-मन
की प्रतिक्रिया में उभरती जिन्दगी की तस्वीर.. |
भोजपुरी
एक बहुत बडे एवं विस्तृत भारतीय समाज की भाषा है
।
यह जितनी बाहर की भाषा है,
उससे कहीं अधिक भीतर की,
घर की,
घरबार की
।
यही वजह है कि
'घर'
भोजपुरी कविता का अपना स्वाभाविक विषय है
।
गोरख पाण्डेय,
प्रकाश उदय,
अशोक द्विवेदी,
जगदीश पंथी सबकी कविताओं में यह
'घर'
है
।
घर विविध रिश्तेनातों से बनता है
।
भोजपुरी कविता में जब भी
'घर'
की बात चली है,
ये रिश्ते-नाते
किसी न किसी रूप में उचरने लगते हैं
।
इन रिश्तों के उच्चार में देखा जाता है कि जितनी मिठास
होती है,
प्राय: उतनी
खटास
भी
।
भोजपुरी कविता इस मिठास और खटास की स्वाभाविक अभिव्यक्ति
की कविता है
।
मिठास में तो मिठास होती ही है,
खटास में भी प्राय: रिश्तों की गर्माहट
और सक्रियता
ही प्रकट होती है
।
मनोज
'भावुक'
की गजलों में भी,
अच्छी बात है कि यह
'घर'
आता है,
घर का
आँगन
आता है,
रिश्तों के स्पष्ट उच्चार के साथ
।
ये रिश्ते अपने स्वाभाविक ठेठपन में इनकी ग़ज़लों
में उचरते हैं और उल्लेखनीय है कि स्मृतिसम्पन्न एवं
पीडाभरी प्रश्नाकुलता के साथ
'
माई रे,
अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल
भउजी हो,
तोहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल ।'
(ग़जल
सं
1)
यहाँ
'माई
रे'
और
'भउजी
हो'
को देखा जाना अनिवार्य है
।
इस
'रे'
और
'हो'
में भोजपुरिया जीवन शैली और रिश्तों की पारस्परिकता एवं
पारम्परिकता की गंध सुरक्षित है
।
कवि यहाँ
अपने अतीतव्यतीत होते समयसंदर्भों की सक्रियता,
मिठास,
सझियाव एवं खुलेपन को पाना चाहता है
।
यह
'माई
रे'
इसलिए इनकी गजल में है कि यह वह माई है जो अपने बेटे की
खुशी में ही अपनी खुशी तलाशती है
।
उसी की नींद सोती और उसी की जाग जगती है.इनकी गजलों में
व्यतीत होते समय की एक संवेदनशील शिनाख्त है
।
कवि इस बात को लेकर चिंतित,
विह्वल और भावुक हो उठता है कि घर के जिस आँगन
में उसका बचपन गुजरा है,
वह आँगन
अब गायब हो गया है
।
यहाँ
गौर करने की जरूरत है कि कवि यह महसूस करता है कि कमरें तो
हैं,
लोगबाग भी हैं,
ज़िंदगी
की एक अपनी रफ्तार भी है,
पर नहीं है तो वह आँगनजिसमें
तमाम कमरों के दरवाजे खुला करते थे और तमाम गतिविधियां उसी
से होकर संचालित होती थीं
।
यह
आँगन
अब मिट गया है तो इसके भी कुछ कारण हैं
।
ऐसा नहीं कि इनकी
ग़ज़लों
में उन कारणों की परखपडताल नहीं है
।
ये कारण अलग-अलग
ग़ज़लों
में अलग-अलग
ढंग से परखे पहचाने गये हैं
।
मनोज की ग़ज़लों
में सपने बुनता हुआ और सपनों के टूटने से आहत आक्रोशित
होता हुआ एक युवामन भी दिखाई देता है
।
यह मन दुखी भी होता है और अपने दुखों को अपने में ही नहीं
रखता,
बल्कि गा-गाकर
बाँटता
भी है और अपने दुखों को युवासुलभ दार्शनिकता का जामा भी
पहनाता है
।
यहाँ
कहना चाहूँगा
कि सपनों और दुखों का इनका संसार इकहरा है और हद तक सपाट
भी
।
युवामन का सतरंगा इन्द्रधनुष यहाँ
सजने से पहले ही बिखर जाता है
।
संभव है कि कवि कोई खास बात कहना चाहता हो
।
वह प्रतिकूलताओं में
फँसे
युवामन की कसमसाहट को प्रकट करना चाहता हो
।
वह कहना चाहता हो कि एक स्वप्नशील कल्पनाशील मन के लिए
दायरों की कमी है
।
कवि के मन में,
यह सच है कि ये सारे सवाल उथलपुथल मचाये हुए हैं और वह
स्वयं इसे महसूस करता है कि जो मन में शोर मचाये हुऐ हैं,
वे अपने उसी वजन पर प्रकट नहीं हो पा रहे हैं.कवि अपनी
बेचैनी और रचनाप्रक्रिया पर यहाँ
टिप्पणी करते हुए बात स्पष्ट करता है
-
'जे
राग मन में बाटे,
सुर पर सधात नइखे
काहे दो बात मन के,
यारे,
कहात नइखे.'
(ग़ज़ल
सं
12)
भारतीय जनजीवन में व्याप्त निराशा भी इनकी ग़ज़लों
का मुख्य विषय है
।
अशोक द्विवेदी,
मिथिलेश गहमरी आदि की ग़ज़लों
में भी यह निराशा आई हुई है
।
इस निराशा को अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी देखा
जा सकता है
।
लेकिन मनोज की गजल में गहरी निराशा के बावजूद उम्मीद का एक
ऐसा
'दीया'
(दीपक)
भी है,
जो अपनी लय में तो नहीं,
पर जलता है,
भुकभुकाते हुए ही सही
।
कवि कहता है कि यह मन का
'दीया'
है
।
कवि मन की अपराजेयता को अपने ढंग से देखता है
-
'मन
बहुत लरियाह ह,
सोचे ना कवनो बात के
ई त बातेबात पर बारे दिया उम्मीद के ।'
(ग़ज़ल
सं
18)
'ई
अलग बात बा आज ले सीप में,
हमरा हर बेर
'भावुक'
हो बालू मिलल
पर इहे सोच के अभियो डूबल हईं,
एक दिन हम त मोती निकलबे करब'
(ग़ज़ल
सं
40)
भारतीय शासक वर्ग के अमनविरोधी,
जनविरोधी चरित्र की पडताल भी इनकी ग़ज़लों
में है
-
'लाश
के ढेर पर जे बनत बाटे घर,
ओके मंदिर कहीं चाहे मस्जिद कहीं
देवता दू घरी ना ठहरिहें उहाँ,
ऊ पिशाचन के डेरा कहइबे करी'
(ग़ज़ल
सं
37)
कवि यह महसूस करता है कि यहाँ
जो मारकाट है,
गरीबी है,
बेरोजगारी है,
लूटखसोट है,
उम्मीद का टूटना है,
रिश्तेनातों में घिसाव है,
अपने ही परिवेश में परिचय पहचान विहीन
होते जाना है इन सबों के लिए प्रथमतः
सत्ता के केन्द्र में बैठे हुए लोग जिम्मेवार हैं
।
आम आदमी अब अपने को अकेला महसूस कर रहा है
।
ग़ज़ल
जो कोई आम आदमी के अकेलेपन की पीडा,
स्थिति और अवसाद से सम्बन्ध बनाए,
अकेल आदमी की बुदबुदाहट को सुने तो यह उसकी संवेदनशीलता का
एक अहम पक्ष है
।
यहाँ
यह देखने की बात है कि मनोज अपनी ग़ज़ल
को आम आदमी की
'झांझर
मडिइया'
जो
'फूस'
की है,
में पूस की आती हुई धूप तक
ले जाते हैं
।
पूस की धूप बहुत प्यारी होती है,
लेकिन
'पूस
की रात'ह्य
इसको समझने के लिए प्रेमचन्द की कहानी
'पूस
की रात'
को पढना अनिवार्य है
।
इस कष्टकर रात के दुखद अहसास को कवि ने विषय के रूप में
नहीं अपनाया है,
लेकिन यह अहसास इस ग़ज़ल
में आए बिना नहीं रहता. यह गरीबी का एक स्थितिचित्र है
व्यंग्यात्मक
-
'ना
रहित झाँझर मडऌया फूस के
घर में आइत धूप कइसे पूस के.'
(ग़ज़ल
सं
3)
मनोज की ग़ज़लों
में एक उल्लसित युवामन भी है सदिच्छाओं से भरा हुआ
।
आत्मसंवाद भी है
।
युवामन का विचलन,
उसकी आशंकायें आकांक्षायें एवं बेतरतीबियाँ
भी कम नहीं हैं
।
कवि का वह मन भी है जो प्रेम करता है,
कसमें खाता है,
प्रतिज्ञा करता है,
बहकता है,
एक बात की बारबार रट लगाता है. युवा सुलभ रोमान भी इनकी ग़जलों
में शुमार है
-
'दरियाव
उम्र के अब
'भावुक'
उफान पर बा
हमरा से बान्ह एह पर बन्हले बन्हात नइखे'
(ग़ज़ल
सं
12)
मनोज भावुक के ग़ज़ल
संग्रह
'तस्वीर
जिंदगी के'
की ग़ज़लों
में भारतीय समय,
समाज,
राजनीति एवं संस्कृति पर एक युवामन की प्रतिक्रियाए संकलित
हैं
।
ग़ज़ल
के क्षेत्र में ये और नये-नये
प्रयोगों के साथ आएँगे,
पाठक समुदाय इस लिहाज से इनको निहार रहा है
।
ये ग़जल
के सुरताल को नई
ऊँचाई
देंगे,
ऐसा विश्वास बन रहा है
।
·
n
समीक्षक:
डॉ.बलभद्र
n
ग़ज़ल:
तस्वीर ज़िन्दगी के
n
ग़ज़लकार:
मनोज 'भावुक'
n
प्रकाशक:
भोजपुरी संस्थान, पटना
n
मूल्य:
60 रुपये
डॉ. बलभद्र
प्रवक्ता,
हिन्दी
बलदेव पीजी कालेज, बडागाँव
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
