रेखाचित्र
|
पेड़ का आत्मकथ्य
:
मनोज सोनकर |
मैं
पेड़ हूँ और नाम है गुलमोहर । जड़ मेरी मजबूत है, तना खूब
तना है।
इधर-उधर फैली हुई डालियाँ काफी मजबूत हैं। मेरी हर
डाल पत्तियों से लदी हुई झूम रही है। मैं बरसात में हहराता
हूँ और सर्दी में लहराता हूँ । गर्मी में तो मैं खिलखिला
कर हँसता हूँ । मेरी हर डाल लाल-लाल फूलों से भर जाती हैं,
कहीं भी एक हरी पत्ती नज़र नहीं आती है। लोग गर्मी से
चिड़ते हैं, लेकिन मैं इससे प्रेम करता हूँ। वह मुझे
रूप-रंग देती है और दिल खोल कर देती है। दूसरे पेड़-पौधे
हमारे इश्क से जलते हैं; सूखते और झड़ते हैं । मेरे बगल
में खड़ी नीम सूख रही हैं; उसके हरे रंग को गहरा पीला चॉप
रहा है। उस जामुन के पेड़ पर न पत्ती है, न फूल है; न फल
है । वह पूरी तरह सूख कर ढूँठ हो गया है। उसकी डालियों पर
बैठे हुए कुछ कौंवे इधर-उधर ताक रहे हैं।
मैं
आदमी की तरह तंगदिल नहीं हूँ; दरिया दिल हूँ। मेरी डालियों
पर अलग-अलग किस्म के पंछियों का बसेरा है। मैं कभी उनसे
भाड़ा नहीं माँगता हूँ। बसेरा खाली करने के लिए उन्हें कभी
नोटिस भी नहीं देता हूँ । वे मुझे मुफ़्त में मिले हुए
रेडियोग्राम हैं। वे कभी-कभी बजते भी हैं और कभी-कभी बजते
हुए अचानक बंद भी हो जाते हैं।सुबह उनका संगीत मुझे बड़ा
अच्छा लगता है। कुछ शरारती बच्चे उनकी तरफ पत्थर भी उछालते
हैं; लेकिन कामयाब नहीं हो पाते हैं। वे मेरी ऊँचाई से खार
खाते हैं। कभी-कभी कुछ बंदर भी आ कर मेरी डालियों पर झूला
झूलने लगते हैं। उनकी झूलन-कला देखने के लिए मेरे
इर्द-गिर्द काफी भीड़ जमा हो जाती है। पेट से बच्चा चिपका
कर इस डाल से उस डाल पर कूदने वाली बंदरिया तो विशेश, रूप
से आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। जब बह किसी डाल पर बैठ
कर अपने बच्चे को चूमती-चाटती है; तब कुछ लोग उसकी
तस्वीरें भी खींचते हैं। लेकिन वानर-सेना को मैं ज़्यादा
रास नहीं आता हूँ । वह मेरे फूलों को रौंदती हुई फलदार
पेड़ों की तरफ बढ़ जाती है।
1946 तक
इस शहर पर मेरा बहुत बड़ा साम्राज्य था। मेरी सेना बहुत
बड़ी और विशाल सेना थी। उसमें नारियल, चिक्कू, अमरूद,
जामुन, इमली पीपल, बरगद और आम शामिल थे। मेरी सेना के जवान
इस शहर के चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद खड़े थे।
दक्षिण
की तरफ बड़े-बड़े घने और सुंदर बगीचे थे । कुछ बगीचे तो
इतने घने थे, कि दिन में भी उनमें घुसने की किसी की हिम्मत
नहीं होती थी। इन बगीचों में इक्की-दुक्की घुसी हुई सूरज
की किरणें सर्चे लाइट की तरह लगती थीं। इन बगीचों में
पंछियों का शादी-ब्याह भी होता था । पूरब की तरफ झूमती हूई
नारियलों की सुंदर कतार थी। यह कतार हिलती-डूलती ज़रूर थी;
लेकिन गिरती नहीं थी। इस कतार को जामुन शराबियों का कबीला
बताती थी। एक शराबी तो झुक कर उससे लिपट गया था; वह शरमा
गई थी। पश्चिंम की तरफ आमों का झुंड बहुत लंबा-चौड़ा था ।
जैसे ही उन पर बौर आते थे; हवा में खुशबू फैल जाती थी।
उनको दबे बल्बों की तरह लटके हुए टीकोरे से लिए बच्चों में
हाथापाई भी हो जाती थी, कुछ लड़के उन पर पत्थर भी बरसाते
थे और झोले भर घर लौट जाते थे। -अच्छा हुआ
! मुझ
पर फूल की साथ फल नहीं आए। मैं मुस्कुराता था।
विभाजन
के बाद इस शहर में भीड़ बढ़ी थी और खूब बढ़ी थी। और खूब
बढ़ी थी। मेरे साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया था। मेरे
सैनिकों की हत्या शुरू हुई थी और बड़ी निर्मम हत्या शुरू
हुई थी, उनकी लाशों पर बिल्डिंगें खड़ी हुईं थीं। आज भी
भीड़ बढ़ती जा रही है और लगातार बढ़ती जा रही है। मेरे
सिपाहियों की हत्या हो रही है और उनकी लाशों पर महल खड़े
हो रहे हैं। अब मेरी सेना सेना न रह कर घायल क्रिकेट टीम
हो गई है । उसे मुँह चिढ़ाती हुई सीमेन्ट हँस रही है;
खिलखिला रही है और खिलाखिलाती ही जा रही है।
·
मनोज
सोनकर
पताः 599/3,
शर्मा निवास, जामेजमशेद रोड
मुंबई,
महाराष्ट्र -
400019
