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सत्य का मतलब
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जयप्रकाश मानस |
सत्य
सृष्टि से भी सयाना है । सृष्टि-शेष के बाद
भी यदि कुछ अशेष
बचा रहेगा तो वह
सत्य ही है । वस्तुतः सत्य का न कोई आदि है, न
कोई अंत । अनंत आयु है इसकी । सत्य हर भोर का सूरज है ।
सर्वत्र, सार्वजनीक उजियारा फैलानेवाला । सूरज रोज डूब
जाता है, यह लोगों का भ्रम है । शाम की बखत कहाँ, रात में
वह कूबत कहाँ, जो उसका चेहरा ढ़ाँप सके । सत्य स्वयं चाहे
तो भी डूब नहीं सकता । वह अस्तहीन किरणों का दरिया जो है ।
वह अंतहीन प्रकाश का महासागर जो है । सत्य को दबोचने का हर
उद्यम व्यर्थ साबित हुआ है । उस पर भी कलुषचेता भूठ चुप
नहीं बैठता है । सत्य बेपहवाही से इठलाता रहता है । यही
उसका स्वभाव है ।
सत्य
सचमुच बेपरवाह होता है । क्योंकि सत्य सर्वोत्तम सत्ता है
। उससे सुपीरियर कोई
भी नहीं । छान्दोग्यपनिषद में प्रमाण
मिलता है
–
तदैक्षत
बहुस्यां प्रजायेयेति । तत्तेजो सृजत । तत्तेज ऐक्षत ।
बहुस्यां प्रजायेयेति ।
तदयोसृजत ।
तस्माद्य त्र क्क च शोभति स्वेदते वा पुरुषस्जेजस एवं
तदध्यायो जायन्ते ।
(प्रपाठक 6 खण्ड 2 प्रवाह 3)
इसका निहितार्थ स्पष्ट है । कि जगत का संगठन सत-संकल्प का
परिणाम है । सत्य ही सृष्टि का रचयिता है । वह महाबीज है ।
सृष्टि की प्रत्येक रचना एक वृक्ष । ऐसे महाबली का कोई
बाल-बांका कैसे कर सकता है
? कीचड़
उछालने का काम भले ही पीठ पीछे करता रहे ।
सत अर्थात्
‘है’
। असत्य अर्थात्
‘नहीं’
। सत्य ही अस्तितववान है । अस्मितावान है । जो नहीं है ऐसे
असत्य का कैसा अस्तित्व
? कैसी
अस्मिता
? जो
सत्य यानी
‘है’,
उसका अंत संभव नहीं है । किससे संभव है
? मेरी
नानीमाँ अक्सर कहा करती है-
“सत के
जरी पाताल में ।”
सत्य कोई चरौंटा का पौधा नहीं । नहीं भाया तो उखाड़ फेंका ।
उसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि तूफान उठे या भूकंप ।
ज्वालामुखी फूटे या सुनामी लहरें । उसकी निर्मूलन असंभव है
। रावण ने भाई-बन्धु सहित सारी सेना झोंक दी । क्या हुआ
? चंद
भालू-वानरों के हाथों हार गया ना
!
साधनहीन वनवासी राम के साथ कुछ भी ऐसा विशेष न था जो रावण
के पास न था । पर रावण के पास सत्य की वह शक्ति न ती जो
राम के पास थी । सच तो यह है कि वह राम मात्र की विजय नहीं
थी । वह तो सत्य की विजय थी ।
सत् का एक खास अर्थ भी है । कोई जब किसी कार्य की सिद्धि
नियमों के आलोक में करता है तो उसे
‘सत’
या
‘उचित’
माना जाता है । किसी नियम के प्रतिकूल जाकर लक्ष्यपूर्ति
को
‘असत’
या
‘अनुचित’
कहा गया है ।
‘उचित’
शब्द के लिए अंग्रेजी में
‘राइट’
प्रयुक्त होता है ।
यह
राइट लेटिन के
‘रेक्टस’
से आया है । रेक्टस का अर्थ है सीधा या नियम के अनुसार ।
जिसमें वक्रता न हो । जो सहजता से संपुष्ट हो । कलुषता से
मुक्त हो । ऋजुता सत्य की नींव है। ऋजुता से मिथ्यात्व की
धूल-गर्दा साफ होने लगता है। आचरण स्वयमेव विनम्रता से
नाता जोड़ने लगता है। विनम्रता से सरलता और सरलता से
निष्कपटता की वृति विंकसित होती है। ऋजुता का विरोध ध्रुव
अप्राकृत है। मतलब कृत्रिमता और असामाजिक । आज का समय
ऋजुताविरोधी समय है। यहाँ सत्य को जानने के
सारे मार्ग
अवरूद्ध हैं। आज हर आदमी कोठरी में बंद है। बंद व्यक्ति
अपने से ही लड़ता रहता है। और यही कारण है कि आज का उत्तर
आधुनिक मानुष आत्मविस्मृत होकर संघर्ष का शिकार है।
व्यक्ति व्यैक्तिक, पारिवारिक,सामुदायिक, राजनीतिक,
साँस्कृतिक हर स्तर पर कुटिलता का पुतला हो चुका है । इससे
निजात पाने का एकमात्र पथ
है-अमानित्वमदम्भित्वमहिंसाक्षांतिरार्जवम
सत्य सबका हितैषी है। उससे किसी भी हाल में किसी का अहित
नहीं होता है। सत्य होगा तो वह सबका हित होगा।
उसमें सबका हित होगा । सत्य
का सबसे बड़ा गुण उसका अहिंसक स्वभाव है। सभी को उसमें
शुभता का दर्शन होगा
। सत्य सर्वोच्च शुभम् है। सिर्फ
व्यक्ति का नहीं परिवार, जाति, देश, काल का भी नहीं । सभी के
लिए शुभ। इसीलिए सत्य परमशुभ है
। कल्याणकारी है। मंगलप्रद
है। शुभता ही सत्य का चरित्र है । भारतीय मनीषा सत्य, शुभ
और शुभद का पुजारी रहा है। यही भारतीयता का मूल
है। इसी नीति की नौका में भारत की सवारी है। नयनान्नीति
रूच्यते । गाँधी जी अक्सर कहा करते थे कि सच्ची नैतिकता का
अर्थ सत्य की प्राप्ति है। पंचशील, गुटनिरपेक्षता,
निरस्त्रीकरण के पीछे इन्हीं मूल्यों की प्रेरणा रही है।
पश्चिम पूरब को बौना देखता है। पूरब के सच की खिल्ली
उडा़ता है
। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, मुहम्मद पूरब की
संताने हैं। क्राइस्ट भी मूलतः पश्चिम से नहीं आये । सब के
सब एशिया के महासत्य हैं । एशिया का मतलब उदित सूर्य का
प्रदेश है । बेबीलोनियन भाषा के शब्द
‘आसू’
से एशिया बना । असू कामायने
‘सूर्य
का देश’
होता है । यूरोप इसका विरूद्धार्थी है। यूरोप अशीरियन भाषा
का शब्द है। यूरोप का अपभ्रंश
‘अरेश’
है, जिसका मायने अंधकार, शाम अर्थात् डूबते सूर्य का
प्रदेश होता
है । उनका सच डूबना और हमारा सच उगना है
। उनकी
सत्यता विज्ञान है। हमारी सत्यता ज्ञान। पूरब भीतरी दुनिया
का साधक है और पश्चिम बाहरी दुनिया का । वे देह की साधना
करते हैं, हम आत्मा के । देह कल रहा, न रहा । आत्मा तो कल
भी थी, अब भी है और हरदम रहेगी।
सत्य के स्वभाव को लेकर काफी मतभेद है । सत्य अरूप है।
अरूप के स्वरूप तय करने में भूल-भ्रम होता है। सत्य एकाकी
सत्य नहीं है
। वह बहुत सारे चीजों के साथ ही दृष्ट्रव्य
है। सत्य सदैव सापेक्ष होता है और हम हैं कि
निरपेक्ष सत्य निकष चाहते हैं। यही भूल और भ्रम दोनों का
कारण है। तैत्तिरीयोपनिषद का एक प्रसंग याद आता है :
जिज्ञासु भृगु ने पिता वरुण से पूछा : मैं ब्रह्मज्ञान
पाना चाहता हूँ।
पिता ने तप करने का मार्ग सुझाया। कष्टसाध्य तप से पुत्र
ने पाया कि अन्न ही ब्रह्म है।
पिता ने फिर तप करने को कहा। पुत्र ने तब पता लगाया :
‘प्राण
ही ब्रह्मा है।’
“तुम्हारी
साधना को कुछ और तप की आवश्यकता है।”
: पिता ने सुझाया।
इस बार पुत्र ने आकर बताया :
“ब्रह्मा
मन ही कोई और नहीं।"
पिता अब भी
संतुष्ट नहीं थे।
पुत्र
ने फिर तपसिद्धि का परिणाम बताया कि विज्ञान ही ब्रह्मा
है।
“बस्स
! थोड़ा
सा तप और करलो । साधना पूर्णता की ओर है।”:
पिता ने सुझाया ।
साधना
की गहनतम् भूमिकाओं के उस पार जाकर पुत्र ने निष्कर्ष दिया
:
“आनंद
ही ब्रह्मा है।”
अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद सभी सत्य के स्तर हैं।
सापेक्ष सत्य हैं। अंतिम सत्य नहीं । फिर भी स्वयं में
सत्य ही हैं। निरपेक्ष सत्य की प्रतीति एकदम संभव नहीं है
।
सत्य की
तलाश अक्सर जंगल से की जाती है। कुछेक सत्य को ढूँढ़ने
मंदिर का शरण लेते हैं कुछेक तीर्थस्थलों की । मुझे यह
देखकर बड़ी हँसी आती है। जंगल, मंदिर या तीर्थों में शांति
तो मिल सकती है। सुकून मिल सकता है
। सत्य मिले ही इसकी कोई
गांरटी नहीं। जंगल बर्बरता का दूसरा नाम है । मंदिर और
तीर्थ भी एक बंधन है। एक प्रकार की भीड़ हैं। बंधन और भीड़
में दृष्टि नहीं होती। सत्य को ऐसी जगहों पर तलाशने का
मतलब सत्य को धर्म के सीमित अर्थों में देखना है। इसका आशय
यह भी है कि सत्य इन स्थलों के अलावा कहीं है ही नहीं।
सत्य सर्वत्र उपस्थित है। सर्वदा है। सत्य मात्र धर्म नहीं
है । वह स्वयं धर्म है। धर्म तो एक व्यवहार है। व्यवह्यृत
होने से ही वह धर्म है। हाँ
! धर्म
भी एक प्रकाश का सत्य है। इन्हीं संदर्भों में सत्य को
ईश्वर कहा गया है। सत्य कृष्ण है। अक्षुण्ण महारास का
संचालक । सत्य के महारास का द्वार कहीं बंद नहीं होता ।
जिस क्षण से चाहो, सम्मिलित हुआ जा सकता है। उद्धव बनकर
नहीं । गोपी बनकर । सारे अनअस्तित्वों को छोड़कर। सत्य
अनअस्तित्व से महाप्रस्थान है। इस यात्रा में सब कुछ खो
जाता है। विचार, वासना, तृष्णा, सब कुछ। वह सब, जो है ही
नहीं। असत है। दरअसल यह यात्रा नहीं, संप्राप्ति का झरना
है । जहाँ सारे स्वप्न खो जाते हैं। स्वप्न समाप्ति ही
सत्य संप्राप्ति है।
सत्य
संप्राप्ति का सरलतम तरीका है - सबसे समीप के सत्य का सतत्
सानिध्य । स्वयं का सत्य ही सबसे समीप है। शेष सब दूर-दूर
। पास है तो मात्र स्वयं । जो स्वयं से दूर होगा, अपरिचित
होगा। वह सत्य से दूर होगा । सत्य स्वयं की खुदाई है।
न्यायालय को नई दुनिया में सत्य का अन्वेषणालय कहा जाता
है। मैं इस पर भी अपनी विनम्र असहमति जताना चाहता हूँ ।
सत्य का परीक्षण केवल सत्य के आँखों ही संभव है। वकील झूठ
के पक्ष में जा खड़ा हो तो दलीलें
झूठी ही होंगी। माना
दलीलें सत्यनिष्ठ हों । फिर भी न्यायाधीश ही सत्य-संकल्पित
न हो तो दूध का दूध और पानी का पानी कौन करेगा
?
सत्य
न्यायालय के अभाव में भी नहीं मरता । सच का गला कोई नहीं
घोंट सकता । मुवक्किल, गवाह वकील, न्यायाधीश सभी के चूक
जाने पर भी सत्य चूकता नहीं । सत्य न्यायालय का शरणार्थी
नहीं। न्यायालय सत्य की आड़ में संचालित नाट्यगृह है, जहाँ
सत्य का छायामंचन होता है।
सत्य अक्षर है।
अक्षरें भी सत्य है। पर सत्य अक्षरों की पकड़ से बाहर है।
शब्द सेतु मात्र है । सत्य को जोड़ने का साधन । शब्दों की
एक निश्चित जाति होती है। एक संप्रदाय होता है। एक भूगोल
भी होता है। इस मायने में शब्द भी हमारे और सत्य के मध्य
एक बाधा है। एक दीवार है। उसमें पारदर्शिता नहीं। जो
पारदर्शी नहीं उससे भला कैसे सत्य को देखा जा सकता है
? फिर
भी मुझे देखिए
! सत्य
को अक्षरों से बताने का दुष्चेटा किये जा रहा हूँ ।
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जयप्रकाश मानस
संपादक,
सृजनगाथा
रायपुर,
छत्तीसगढ -492001
