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ललित-निबंध

 

समय के इस घमासान मेः डॉ.कृष्ण कमार रत्तू

 

        जिन दिनों समय का चेहरा बदलता है उन दिनों आदमी अपने अंदर से डरने लगता है, फिर आस्थाएँ टूटती हैं और बहुत कुछ ऐसा होता है जो समय के इस घमासान में हमसे दूर जा गिरता है । प्रश्न उस पर मलाल का नहीं, प्रश्न यह है कि इस तूफान के बाद जो बचता है वो कितना हमारा है ?  इन दिनों मौन होते हम और हमारा समय साक्षी है कि हमने भूला दिया उनको, जो इस खुली हवा के झोंके के पीछे थे । मसलन, आज इस बात की किसे फ़ुरसत है कि वो भगतसिंह नाम के किसी तेईस वर्षीय युवक को याद रखें, या फिर शहीद राजगुरु, सुखदेव को इस दिन याद करें । बीता 23 मार्च उनकी शहादत का दिवस था । पर सब मौन ।  कहीं कोई हलचल नहीं । कौन जाने, कितने लोग इस पर शहीद हो गए, कौन याद रखे । यह हमारे एक उस विचार, स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है जो हममें पनप रहा है । हम यह भी भूल गए कि इस दिन का कुछ लगाव संसद में दहाड़ने वाले उस आदमी से भी है, जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया के नाम से जाना जाता है ।

 

        यूं तो यह एक साधारण बात हो सकती है पर आने वाली पीढ़ियों के लिए जिस तरह की धरोहर हम पैदा करते आ रहे हैं, क्या उससे कुछ उम्मीद रखी जा सकती है कि आने वाले दिनों में हम किसी पुरखे को समझ सकते हैं । रघुवीर सहाय का लिखा याद आने लगता हैः

 

यह क्या है, जो इस जूते में गड़ता है,

यह कील कहाँ से रोज़ निकल आती है

इस दुख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है ।

 

        समय साक्षी है, हमारी इन दिनों की टूटन का । और सच में, ईमानदारी इसी में है कि समय की किताब से हमने बहुत ऐसा छोड़ दिया है, जो हमारा था । हमने तो छोड़ दिया अपने पुरखों का वो इतिहास जहाँ से आज़ादी की अलख जगाई जाती थी । हमने छोड़ दिये वे सब पहचान चिन्ह जो बनाते थे एक नया भारत!  और सच यह भी है कि हमने तो छोड़ दिया बहुत पीछे भारत नाम का एक देश और लिपट गए इंडिया पर ।

 

        समय के इस घमासान में हमें लगता है कि हम इस शताब्दी के उन कुछ लोगों में रहे हो सकते हैं, जिनके लिए इसी शताब्दी की कोख से सुनहरी आज़ादी का ताज तो सजा परन्तु इस आज़ादी पर समय के हस्ताक्षर हम नहीं पढ़ पाए । पचास वर्ष इस प्रयत्न में बीत गए कि अभी यह कल की बात है । सब ठीक हो जाएगा, तंग गलियों से गुजरता इस देश का आम आदमी, आप और हमसे डरता क्यों है ? हममें इतना साहस क्यों नहीं आता कि उससे आँख मिला सकें । यह सच है कि हमारे समय का घमासान, सबसे ज्यादा उस आदमी के अंदर है जो भाग रहा है, हाँफ रहा है, यूं भी माना जा सकता है कि उसका दम निकल रहा है । यह एक उस स्थिति का चेहरा है, जो हमें हर स्थान पर दिखाई पड़ेगा ।

 

        समय के इस घमासान में शायद हमने अपने आपको ही पीछे किया है । संस्कृति संरक्षण के नाम पर हमने भारत को कहाँ-कहाँ, किस-किस तरह बेच दिया, इसके कई नमूने हैं । एक बेहतर नमूना है- यात्री और ताज । हमने अपना बेहतरीन वैभव, इतिहास, दर्शन और सोन चिरैया की गान तक बेच दी औऱ खुश हुए कि विलायती चाल में ढल गए । इस आदमी को इंडिया में सब रास आएगा ।

 

        इन दिनों इस अंतरमन की पीड़ा को बयान किससे करें कि हम मर रहे हैं, जीने के बहाने ढूंढ रहे हैं ? राजनीति की इन पगडंडियों पर चलकर हम कहाँ पहुचे हैं, यहाँ से हमारा ही चेहरा गायब है ।

 

        मुझे लगता है कि हम उस संक्रमणकाल की पीड़ा से जूझ रहे हैं जो इस नई सदी के शुरु में हमें उस पतनकाल के मुहाने पर ले जा चुकी है, जहाँ से पीछे लौटना बहुत असंभव है । वैचारिक और सामाजिक सतहों पर टूट चुके हम उस बिखराव के घेरे में घिर चुके हैं, जहाँ से शून्य की परिभाषा शुरु होती है । खत्म होती है । सृजन कर्म आज आतंकित करता है । इन दिनों इस रस्साकसी में चलते हुए हिन्दू मंदिर वाला कट्टर हिन्दू हो गया है और मुसलमान मस्जिद वाला कट्टर मुसलमान हो गया है, आदमी तो बस इस मस्जिद और मंदिर के बीच लटक कर रह गया है ।

 

        हमारे इन दिनों की इस गाथा में सत्य का एक पन्ना यह भी दर्शाता है कि हमने सत्य को छोड़ दिया है । किसने उचारा था,

अव्वल अल्हा नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे।

एक नूर ते सब जग उपजिया, कौन भले कौन मंदे।

        कबीर और रविदास का आम आदमी कहाँ खो गया ? नानक और बुद्ध के अपने से घर-गृहस्थी वाले आम आदमी को हम कहाँ छोड़ आए ? इस देश की एक अरब जनता को इस प्रश्न का उत्तर जिस दिन मिल जाएगा, उस दिन लगेगा कि इस आज़ादी का कोई चेहरा इस घमासान से उस आदमी के हिस्से में भी आया है, जो इस देश का साधारण बाशिंदा है और इसके कई इतिहास और बदलाव के क्षण देखे हैं ।

 

        हम भूल गए हैं कि इस देश  की धरोहर पर विश्व की शोध और तहज़ीब के कई पहलू जूड़े हुए हैं और हमने इसे गंवा दिया है ।

 

        अपने दड़बों में से ज़रा सा झांककर देखें तो पता चलेगा कि तुम कितने पानी में हो ! बेगानी बांसुरी पर सुर निकालना और वाहवाही लेना, सचमुच कितना आसान है, यह तो आपने देख ही लिया है ।

 

        जमुना किनारे जान्नी की बांसुरी और क्या दिखाती है । आज थिरकता है, मन और तन उस भटकन के पीछे जो अपनी भी नहीं और इस धरती की भी नहीं । बहुत पीछे छोड़ दिया आपने उस एहसास का किनारा जहाँ से वतन के लोगों को देखा जा सकता था, यहाँ से अहले-वतन की याद आती थी और उसकी महक बाकी थी ।

 

        समय के इस घमासान में हारने का अर्थ अपने अंदर से टूटना है और यह कट्टर सच्चाई है कि अंदर से साबुत न होना पराजय की ओर बढ़ने वाला पहला कदम है । इस कदम के आत्मघाती होने से पहले सोच लेना चाहिए कि हम किस दिशा में जा रहे हैं ।

 

        शताब्दियों पहले खंडहर हुई इमारत की इबारत आज भी ताजा है । उन खंडहरों से गुजरो तो पूछना, कहाँ है, वह सपनीला सम्मोहन और इतिहास ? कहाँ है तिलिस्मी दरवाजा जिसकी चौखट पर उम्मीदों के सूरज उगते थे ? परन्तु समय के घमासान में वक्त किसके पास है कि इस ओर मुड़कर भी देख सकें । वक्त है कि हाथ में आता ही नहीं है । समय शेष स्मृति न बन जाए उससे पहले इस घमासान से बाहर आओ और देखो, इस दुनिया में, इस धरती पर अभी भी कितना कुछ सुंदर बाकी है तुम्हारे लिए !

· 

डॉ.कृष्ण कुमार रत्तू

श्रीकमल कुंज

9/850, मालवीय नगर

जयपुर, राजस्थान - 302017

 

 

 

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