रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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लघुकथा

 

लघुकथाकार - नरेश धीमान, इन्द्र बंसल

 

नरेश धीमान की दो लघुकथाएँ

1 शिक्षा

·                          

        रमेश जी अपने बेटे विकास को अच्छे संस्कारों में डालना चाहते हैं । इसके लिए वे उन्हें तरह-तरह की शिक्षाप्रद कथाएं सुनाते, सच बोलने पर जोर देते, व झूठ छोड़ने के लिए कहते । बेटा पापा की शिक्षाओं का अनुसरण कर रहा था और उन्हें अपना भी रहा था ।

       

        एक शाम को कोई व्यक्ति रमेश जी से मिलने आया । रमेश जी बेटे को पढ़ा रहे थे । बाहर से उस व्यक्ति की आवाज सुनकर रमेश ने अपने बेटे से कहा बेटे जाओ और उसे कहो कि मैं घर पर नहीं हूँ । बेटा बाहर गया और उस आगंतुक को कहा कि पापा घर पर नहीं हैं । वह आदमी चला गया । वापिस आकर बेटे ने पापा से सवाल किया,पापा आप मुझे काफी समय से सच का पाठ पढ़ाते आ रहे हैं । मगर आज आपने मुझे उस आदमी के सामने झूठ बुलवा दिया, यह कैसी शिक्षा है । पापा ने उत्तर दिया, बेटे सच बहुत कटु होता है, हर जगह इसका इस्तेमाल नहीं होता, इसके इस्तेमाल के लिए देश, काल, वातावरण व मानव को देखना पड़ता है कि ये सभी कारक सच के योग्य है या नहीं । यह जो आदमी मुझसे मिलने आया था एक बहुत बड़ा धोखेबाद, कपटी व चालाक किस्म का आदमी है । ऐसे आदमी के सामने झूठ बोलना गलत नहीं है । इस संसार में हर व्यक्ति सम्मान के योग्य नहीं होता । बेटे को उसके प्रश्न का उपयुक्त उत्तर मिल गया था ।

     

2 पक्ष अपना अपना

·                         

        संसद के चुनाव निकट थे । एक सभा में नेता चिल्ला कर भाषण दे रहे थे । कह रहे थे,जाति-पाति ने हमारे देश का बेड़ा गर्क कर दिया है । इस बुराई को हमने जड़ से उखाड़ फैंकन है । देश में सभी जातियों धर्मों में एकता रहनी चाहिए । हमारी पार्टी ने हमेशा सभी जातियों को प्रतिनिधित्व दिया है । आब जो चुनाव होंगे उसमें सभी बिरादरियों को पूरा मान सम्मान दिया जागा और पार्टी का टिकट आपके इस भेज  क्षेत्र से किसी समर्पित कार्य को दिया जाएगा ।

        

         नेता जी का पार्टी हाई थमान में पूरा सम्मान था । इनकी पार्टी की लहर जोरों पर थी । पार्टी के टिकट के लिए खूब मारामारी हो रही थी । पुराने से पुराने पार्टी कार्यकर्ता लाईन में लगे थे । इन्हें पूरा विश्वास था कि पार्टी थे प्रति समर्पण और पुराना रिकार्ड टिकट दिलाने में मदद करेगा ।

 

        ऐन वक्त पर टिकट एक नये कार्यकर्ता जो उस नेता की ही जाति से सम्बन्धित था को मिल गया सभी पुराने व समर्पित कार्यकर्ता अपनी वर्षों की मेहनत व सेवा जो उन्होंने पार्टी के लिए की थी, का विश्लेशषण करने लगे । और दिल को तसल्ली देने लगे कि नेताओं का कोई दीन-ईमान नहीं होता ।

नरेश धीमान

भूगोल प्राध्यापक

आर्य वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (आवासीय)

घरौण्डा (करनाल) हरियाणा - 132114

  

          

3  प्रसूती अवकाश

·                          

        शान्ता एक राजकोप वरिष्ठ उच्च बिद्यालय में अध्यापिका लगी हुई थी । अच्छा वेतन भत्ते-सुविधाएं उसके अधिकार क्षेत्र में थीं। सभी लोग संतुष्ट तथा प्रसन्न थे ।

 

        प्रातः उठ कर घर का सारा कार्य कर के जाना-बस पकड़नी-डयूटी देनी। पति पत्नी मिल कर सब समस्याएं सुलझा लेते थे।

 

        पर-कम्मो-वियारी गरीब-नौकरानी-सारा दिन मैडम के छोटे बच्चों को सम्हालती-घर का शेष काम-कपड़े धोने खाना-पकाना-फोन सुनने सब करती ।

 

        अब शान्ता के दूसरा प्रस्व होने वाला था तथा कम्मो के पहला। वह बहुत कमज़ोर हो गई थी, कम आप शराबी पति-क्रूर सास । विटामिन की कमी-अमानता-विवशता। सब की शिकार थी क्म्मो।

        उधर पहले बच्चे के समय भी शान्ता ने-6 मास का अवकाश सवेतन काटा था । तथा फिर अपने प्रभाव से डॉक्टर से मिल कर 3 मास का अवकाश बढ़वा लिया था। तथा इस बार भी दोनों पति पत्नी की यही योजना थी ।

        डार्लिंग-2 कम्मो आ गई है।"

        कम्मो-साहब ! मैडम ! हम से अब काम न बनत है। तो फिर

        साहब। छुट्टी दे दो ।

        शान्ता हां ! क्यों नहीं । काम वाली भेज देना । और तुम्हारा वेतन उसे दे देंगे।

        कम्मो-पर साहब ! प्रसव के लिये पैसा चाहिये। साहब ! शान्त तुम 6 मास वेतन लोगी। इसे क्यों नहीं। जी मै सरकारी हूँ ना।

इन्द्रा बंसल

 

 

लघुकथा

अनुवाद पठन का सबसे गहन रूप है - आक्टावियो पॉज

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