|
माह के लघुकथाकार -
कृष्णानंद कृष्ण |
1
सदमा
·
''
अरे पंडित जी ! भीतर क्या कर रहे हैं
?
बाहर तो आइये।''
डाकिये की आवाज सुनकर पंडित दीनदयाल थोड़ा सकते में आ गए।
अभी तो चार-पाँच रोज पहले ही प्रकाश की चिट्ठी आई है। फिर
इतनी जल्दी तार। उनका मन आशंकाओं से भर उठा। फिर मन को एक
झटका देकर उठे। नहीं, नही
! सब कुछ ठीक होगा। और वह उठकर दरवाजे की ओर बढ़े।
रास्ते भर मन में कई-कई बातें सोच गये। डाकिए से तार लेकर
वे ऑंगन में लौटे। सारा घर भाँय-भाँय कर रहा था। अब तो
अकेले में उनका मन भी ऊब जाता है। प्रकाश की माँ जब
जिन्दा थी,
तब उन्होंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया था। वह दिन भर
इधर-उधर कुछ न कुछ किया करती थी। प्रकाश की तस्वीर लेकर वह
प्रकाश के बारे में बहुत सारी बातें बतियाया करती थीं।
कभी- कभी तो वह उनकी भावुकता भरी बातों के लिए डाँट भी
देते थे। हालाँकि सारी बातें उन्हें भी अच्छी लगती थी। यही
सब सोचते हुए वे भीतर आ गये।
बिछावन पर रखी हुई चिट्ठी खुली पड़ी थी। सामने प्रकाश के
बेटे की तस्वीर पड़ी हुई थी। वह ठीक प्रकाश के नाक-नक्श का
है। तस्वीर देखकर वे अतीत की कंदराओं में भटकने लगते हैं।
प्रकाश की पढ़ाई-लिखाई। उसका कम्पीटीशन में चुना जाना।,
फिर आईएएस
की ट्रेनिंग और पोस्टिंग,
फिर शादी और प्रकाश का बहू को लेकर अमेरिका जाना। सारी
घटनाएँ चलचित्र की भाँति उनकी ऑंखों के सामने तैर गयीं। वह
भी खुश थे। प्रकाश की माँ के सपनों को तो जैसे पंख लग गए
थे। आखिर उनका बेटा आईएएस जो हो गया था।
''
सर! दरवाजा खोलिए ना।''
मोहन की आवाज़ से उनके भीतर का सपना एकाएक चन्न से टूट
गया।
''
आया भई,
आया ।
''
कहकर वह दरवाजे की ओर बढ़ गये । लौटने पर दूध को आग पर
चढ़ाया और मोहन को टास्क देकर स्वयं तार खोलने ल्रगे। तार
का मजमून देखकर वह धक्क से रह गये। प्रकाश ने लिखा था-''
पापा वहाँ की ज़मीन बेचकर आप भी यहीं चले आईये । यहीं फ्लैट
ले लेंगे।''
प्रकाश इतना गिर जाएगा । इसकी उन्हें कल्पना नहीं थी।
चूल्हे पर दूध के जलने की गंध से उनका ध्यान टूटा। मोहन को
आवाज़ देकर दूध उतारने के लिए कहते हुए उठे और तार को
चिंदी-चिंदी कर बाहर फेंक दिया। तन्मयता से बैठा मोहन अपना
टास्क बना रहा था।
2
औकात
·
पद के मद में आकंठ डूबे श्यामसुंदर दास ने कभी किसी को
तरजीह नहीं दी। एक ही लाठी से सबको हाँकते रहे। क्या घर,
क्या बाहर,
सब जगह एक ही व्यवहार। चाहे वो मातहत कर्मचारी हो या
पदाधिकारी,
दोस्त हो घर-परिवार का कोई सदस्य,
किसी को भी रियाया से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया। कोई सुझाव
देता तो उसे
डाँट देते और कहते - ''तुमको
जब समझ में नहीं आता तो चुप रहा करो। जाओ,
खाओ-पियो और मौज करो। यह सब मेरे प्रताप का फल है,
भोगो।''
और हो-हो कर हँस देते। सारे-के-सारे लोग उनकी हाँ में हाँ
मिलाते रहते थे।
एक बार उनकी सल्तनत को थोड़ा सा झटका लगा। उन्होंने अपने
सिक्योरिटी ऑफिसर को पीकदान उठाने का इशारा किया। उसने
उनकी बातों की ओर ध्यान नहीं दिया। वह चुपचाप अपने मातहतों
को हिदायत देता रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच
रहा था। तभी सामने बैठे पदाधिकारी ने आगे बढ़कर पीकदान थाम
लिया।
''ऐ
मिस्टर! आपको कुछ सुनाता-वुनाता है कि नहीं ?
तूँ कइसे कम्पीट कर गया
?'' - कहते
हुए उन्होंने डाँटा।
''मैंने
कुछ समझा नहीं।''
उसने उत्तर दिया।
''लगता
है,
तुमको यहाँ का कायदा-कानून समझाना पड़ेगा।''
सामने खड़े उच्चाधिकारी ने उसे समझाना चाहा। उसकी लल्लो-चप्पो वाली बातों पर वह बिदक उठा। उसने संयत स्वर में
कहा-''माइंड
योर ओन बिजनेस प्लीज।''
''ऐ
सकसेरिया साहेब! अभी इसको यहाँ का बिजनेस रूल नहीं मालूम
है। जब समझ जाएगा सब ठीक हो जायेगा। नया खून है नूँ।''
कहते हुए उन्होंने पान की पीक पच्च से उगल दी।
''ऐ
मिस्टर! जरा थरमस इधर बढ़ाइये तो।''
उनकी बातों पर ध्यान न देते हुए वह चुपचाप खड़ा रहा। गुस्से
में तमक कर वे बोले-''अरे
आप ही से कह रहा हूँ। आप बहरे-वहरे तो नहीं नूँ हैं?''
इसबार सिक्योरिटी ऑफिसर के चेहरे का रंग बदला। उसने थोड़ी
तल्ख आवाज़ में कहा-''मैं
आपका सिक्योरिटी ऑफिसर हूँ चपरासी नहीं। मैं अपनी डयूटी
कर रहा हूँ।''
''लगता
है आप हमें जानते नहीं हैं''
- कहते
हुए उनका चेहरा तमतमा उठा।
''जानता
हूँ! अच्छी तरह पहचानता हूँ। क्योंकि मैं आपका सिक्योरिटी
ऑफिसर हूँ।''
-
उसने कहा।
उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने वे निरुत्तर थे। चुपचाप उठकर
भीतर कमरे में चले गए।
3
एहसास
·
श्याम मोहन बरामदे में कुर्सी डालकर अकेले बैठे हुए थे।
सुबह का अखबार वे कब का चट कर चुके थे। गंगा भीतर किचेन
में कुछ काम कर रहा था। बरामदे में बैठे-बैठे वे अतीत के
ऑंगन में घुमरी-परैया खेलने लगे थे। एक वक्त वह भी था,
जब समय गौरैया की तरह फुर्र से उड़ जाता और पता तक नहीं
चलता था। सारा घर भरा-पूरा रहता था। बेटे-बेटियों एवं
नौकरों-चाकरों से घर गुंजायमान रहता था।
सामने बिजली के पोल पर बैठे दो पक्षियों को आपस में
बतियाते देख कर उन्हें राहुल के माँ की याद ताजी हो आयी।
उन्हें याद आता है-पहली बार जब राहुल को अमेरिका जाने हेतु
स्कॉलरशिप मिला था,
तो वे कितना खुश थी। घर आने वाले हर व्यक्ति को यह खुशखबरी
सुनाती। हर व्यक्ति का मुँह मीठा कराती। उनके पाँव जमीन पर
नहीं पड़ते थे। वे दूने जोश के साथ कार्य करतीं। लेकिन
राहुल के अमेरिका जाते ही एक मनहूस सन्नाटा पूरे घर में
पसर गया था। जब भी राहुल की चिट्ठी आती,
वो चिट्ठी लेकर ठीक यहीं मेरी बगल वाली कुर्सी पर बैठती और
कई-कई बार उसे पढ़ती थी। उनकी ऑंखों की खुशी देखकर वे भीतर
से काँप उठते थे ।
गेट बजने की आवाज़ से उनका ध्यान भंग हुआ । सामने डाकिया
खड़ा था । उसके हाथ में एक बड़ा-सा पार्सल का पैकट था ।
पैकट खोलकर उन्होंने देखा । उनके मनपसंद रंग का बेहतरीन
स्वेटर था । साथ में एक पत्र और लिफाफे में भीतर एक
गोल-मटोल नन्हें बच्चे की तस्वीर भी थी । पत्र खोलकर
उन्होंने पढ़ा । उनके भीतर प्रसन्नता की लहरें हिलोरें
मारने लगी । वे स्वेटर और पोते की तस्वीर को लेकर
ड्राइंगरुम में निवेदिता के सामने खड़े कह रहे थे-
“देखो
!
तुम्हारे साहबजादे की बहू ने मेरे लिए कितना अच्छा स्वेटर
भेजा है । और सबसे बड़ा तोहफ़ा जिसे में अकेले शेयर नहीं
कर पा रहा हूँ । तुम होती तो कितना खुश होतीं ।”
कहते-कहते आँखों से आँसू लुढक पड़े तभी उन्हें लगा जैसे
निवेदिता कह रही हो
–
“आप
भी गजब करते हैं . खुश होने की बजाय बच्चों जैसे टेसुए बहा
रहे हैं ।”
''
निवेदिता ये ऑंसू दु:ख के नहीं हैं।''
कहते हुए उन्होंने ऑंखें पोंछी।
''
मालिक! चाय ठंढी हो रही है।
''
गंगा की आवाज से उनकी चेतना लौटी । अब उन्हें प्रसन्नता का
सहज एहसास हो रहा था।
4
गद्दार
·
सुदामा बाबू की मनमोहक बातों में लोगों को रस आने लगा था।
जब भी उनका भाषण होता,
लोग टिड्डी की तरह टूट पड़ते। सुदामा बाबू भी खूब
चिकनी-चुपड़ी बातें करते। जब भी उन लोगों के बीच
जात-बिरादरी के पिछड़ेपन की बात करते,
कहते-''भाईयों!
हमारी संख्या लाखों में है फिर भी हम सत्ता से बाहर ही रह
जाते हैं। सत्ता में जब तक हमारी भागीदारी नहीं होगी,
तबतक हम लोग पिछड़े ही रहेंगे।'
लोग तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करते ।
सुदामा बाबू का हौसला बढ़ता जा रहा था। वे भोले-भाले लोगों
को कभी जात के नाम पर,
तो कभी पाँत के नाम पर ठगते। और नहीं तो उनसे अपनी गरीबी
का रोना रोते और उसके नाम पर रुपये-दो-रुपये तक का चन्दा
में भी लेते। लोगों को लगता सुदामा बाबू उनके मसीहा हैं।
और सुदामा बाबू भी लोगो का भावनात्मक शोषण करने से नहीं
चूकते थे।
पहली बार सुदामा बाबू प्रखंड प्रमुख के रूप में चुने गए तो
बिरादरी के लोगों को लगा जैसे अयोध्या का राज मिल गया है।
पहला झटका उन्हें तब लगा जब उनका स्वागत समारोह ठाकुर
गजराज सिंह के यहाँ किया गया। उन लोगों की स्थिति वही रही,
जो पहले थी। सारे लोग गुस्से में थे किन्तु चुप ही रहे।
समारोह के बाद सुदामा बाबू सबलोगों के घर गये और उनका
आशीर्वाद माँगा। लोगों ने मन की रंजिश निकाल कर उन्हें
आशीर्वाद दे भी दिया।
सुदामा बाबू का रंग धीरे-धीरे निखरने लगा था। पहले पैदल
चलते थे। प्रमुख बनते ही डीजल जीप दरवाजे पर आकर खड़ी हो
गयी। बच्चे जीप को देखकर खुश होते। उसे छूकर देखते। बूढ़े
भी गद्-गद् थे। कम-से- कम अपने बीच का एक आदमी तो ऊपर गया।
लोग अपनी समस्याएँ लेकर सुदामा बाबू के यहाँ जाते और निराश
वापस लौटते।
सुदामा बाबू कभी-कभी झल्ला कर ड्राइवर को डाँटते -''देखते
नहीं जिसका मन होता है ऊँट की तरह मुँह उठाए चला आता है।
भगाओ इन भुख्खड़ों को। लगता है यहाँ खैरात बँट रही है।''
''सर!
यही लोग तो हमारी जान हैं। इन्हें इग्नोर मत कीजिए।''
किसी चमचे ने कहा।
''अरे
बोका! इस तरह से नेतागिरी नहीं चलती। मैं महात्मा थोड़े हूँ
कि सबलोग दौडे चले आते हैं आशीर्वाद के लिए। उनको कहो अब
तो भगवान भी बिना चढ़ावे के खुश नहीं होते।''
चमचा सुदामा बाबू के पान से रंगे होठों से झाँकती
मुस्कराहट को देख रहा था। उसे लग रहा था जैसे उनके होठों
पर पान की पीक नहीं बल्कि उन जैसे कमजोर लोगों का खून पसर
गया हो।
5
जागृति
·
एक बार फिर जालिमों ने इस गाँव पर कहर बरपा दिया था। कोई
कसर नहीं छोड़ी थी। इस बार भी खून की होली खेलने के बाद
झोपड़ियों में आग लगाते हुए वे नदी में उतर गये थे। मासूम
बच्चों,
औरतों और बूढ़ों की चीख-पुकार से पूरे गाँव का वातावरण गम
और दहशत में डूबा हुआ था। लोगों की ऑंखों से ऑंसू गायब हो
गये थे। गलियों में इधर-उधर कुत्ते घूमते नजर आ रहे थे।
सबलोगों के चेहरे पर चुप्पी पसरी हुयी थी। बगल के थाने के
कुछ सिपाही लाशों की चौकसी कर रहे थे।
घीरे-धीरे छुटभैये नेताओं के आगमन से गाँव के वातावरण में
सुगबुगाहट होने लगी थी। सारे लोग मंत्री जी की राह देख रहे
थे। उनके आने की प्रतीक्षा में लोग इधर-उधर खुसुर-फुसुर कर
रहे थे। एकाएक सभी लोगों का ध्यान दौड़ते हुए रामकरण
चौकीदार की तरफ गया। उसने बताया-मंत्री जी थाने पर आ गये
हैं। थोड़ी देर में यहाँ पहुँच जायेंगे। मंत्री जी के आने
की खबर सुनते ही छुटभैये नेताओं में हरकत शुरु हो गयी थी।
कोई कमीज-बंडी की धूल झाड़ रहा था तो कोई दाढ़ी सहला रहा था।
कोई धूप चश्मा का शीशा पोंछकर साफ कर रहा था। सबलोग एक्सन
में आ गये थे।
मंत्री जी के आने की खबर सुनकर मुर्दों में भी जान आ गयी
थी। थोड़ी देर में गाड़ियों का काफिला मंत्री जी के साथ
पहुँचा मंत्री जी ने पहले थानेदार को बुलाकर खूब फटकारा और
खड़े-खड़े उनके तबादले का आदेश भी दे दिया। चारों तरफ भीड़
इकट्ठी हो गयी थी। पुलिस वाले भीड़ को इधर-उधर कर रहे थे।
मंत्री जी ने जिलाधीश को बुलाकर आदेश दिया-
''मिस्टर
सिन्हा,
हर पीड़ित परिवार वालों को क्रिया-कर्म के लिए दस-दस हजार
रुपये दिये जायँ। हर आदमी के मकान को एक माह के अन्दर
पक्का बनवाया जाय। मृतकों के परिवार से कम से कम एक
व्यक्ति को सरकारी नौकरी दी जाय।''
''भाईयों,
यह सब बकवास की बातें हैं। सब झूठा आश्वासन है।''
एक नौजवान ने अपना आक्रोश प्रकट किया। उसकी बातें सुनकर कई
लोग उसकी तरफ टूट पड़े। पुलिस उसे पकड़कर अलग ले गयी।
''भाईयो!
आपलोग हमारा साथ दें तो हम सामंती ताकतों को जड़ से उखाड़कर
फेंक देंगे। वे हमारी तरक्की की राह के सबसे बड़े रोड़े हैं।
मैं आपलोगा को आश्वासन देता हूँ कि हत्यारों को तुरत
गिरफ्तार किया जायेगा।''
''हमें
मकान औरें पैसे नहीं चाहिए। हमें सिर्फ अपनी सुरक्षा
चाहिए। क्या आप हमारे परिजनों को लौटा देंगे?
''
के नारे लगाते हुए गाँव के लोग अपने-अपने घरवालों की लाशों
के साथ मंत्री जी के सामने खड़े थे। सारे लोग गाँव वालों के
बदले तेवर को देखकर हतप्रभ खड़े थे।
कृष्णानंद कृष्ण
पथ सं0
- आठ बी,
अशोक
नगर,
कंकड़बाग,
पटना-800020
