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प्रवासी कवि -
डॉ. ममता जैन |
( प्रवास मनुष्य की नियति है । यहाँ कोई नये प्रकाश से
जगमगा उठता है और कोई घर से दूर रहने के अवसाद से कराह
उठता है । अधिकांश प्रवासी कविताओं में कुछ छूटते जाने के
बिम्ब मिलते हैं । मन है कि बार-बार ज़मीन की ओर लौटना
चाहता है । यहाँ कवि न चाहकर भी नास्टेल्जिक हो जाया करता
है पर सच यह भी है कि उसी नास्टेल्जिया को अवलंब बनाकर वह
मूल की खोज में फिरता रहता है । साइप्रस की कवि डॉ. ममता
जैन इसी प्रवास की पीड़ा को अपने काव्य में विस्तारित करते
जान पड़ती हैं । प्रकृति, जल, बर्षा, बादल, सावन,
पहाड़, वृक्ष, माँ, चिट्ठी, फोन, यहाँ सिर्फ शब्द नहीं है,
वे इन्हीं के बरक्स अपनी संवेदना के मूल को पकड़ती हैं जो
उनकी कविता में सर्वत्र है । जाहिर है पाश्चात्य ज़मीन में
निवसते हुए भी अपनी सास्कृतिक धरोहर को बचाने की कशमकश कम
पीड़ा दायक नहीं । पर ममता इस पीड़ा को इस तारत्मय में
पिरोती हैं कि वह केवल उनका नहीं रह जाता हर पाठक का हो
जाता है, कविता के लिए इससे बढ़कर कोई उद्देश्य नही और कवि
के लिए इससे बढ़क कोई उपलब्धि नहीं । वे तोल ठोंककर कहती
हैं - साइप्रस नहीं लुभाता । यह आज के समय का पाठ भी है
जिसे बिसार कर हर कोई तथाकथित सुख, समृद्धि के फेर कर
पलायन करता नज़र आ रहा है । यूं तो ममता कई विधाओं में
लिखती हैं - कविता, दोहे, ग़ज़ल, मुक्तक आदि । भारत
की कई पत्र-पत्रिकाओं में भी समादृत हो चुकी हैं पर यहाँ
हम उनकी कविता
संग्रह "साइप्रस
नहीं लुभाता"
से कुछ खास कविताएँ
पाठकों के समक्ष रख रहे हैं । कवि को बधाई
और पाठकों से उम्मीद कि वे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत
कराते रहेंगे लगातार- संपादक
)
डॉ . ममता जैन की पाँच कविताएँ
वर्षा का जल
वर्षा के आने
से
मात्र जल ही नहीं बरसता
धरती की देह ही नहीं नहाती
चेतना के पंख लगा
बहुत दूर दूर तक उड़ाने भरती है कल्पना
बोती है रंगीनी
लबालब भरी नदियाँ मस्तानी हो टेढ़ी-मेढ़ी चलती हैं
जाने कितने घर, खेत बहा ले जाती है
बादल गरज गरज कर बना देती है एक वृन्दावन
और धूप संकुचित सी बार बार
अवसर की ताक में रहती है
बादल और सूरज का यह मोहक युद्ध
बाँझ धरती के सीने में भी गुदगुदी कर
अंकुरण को बाध्य कर देता है
और आँखें बार बार
समर्पण की समृद्धि से
क्षितिज का छोर थाम अपने जलमय हाथों से
किसी न किसी वृक्ष का अभिषेक करती
बादलों को अर्ध्य देती
और अँगडाई लेकर अपनी अलसायी आँखों को जगाती
धरती को अपलक निहारती है
दुलारती है ।
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मिश्र के पिरामिड
मिश्र के पिरामिड
दुनिया का आश्चर्य
पुस्तकों में पढ़ा था
बड़ी बड़ी आकृति
ठीक सामने से छूकर
देख रही हूँ इसकी दीवारें
मीटरों ऊँची दूर तक फैली रेत में
सुरक्षा कर रही है अपनी धरोहर की
बड़े विश्वास से जो इन्हें सौंपी गई थी
इनके अंतस्तल में छिपी संपदा के साक्षी
ये ही इमारतें हैं
जो बोलती हैं अपना इतिहास यथार्थ युगबोध
सर्वत्र सुबोध कलात्मकता
नवागंतुकों के लिए ऐसा प्रकाश स्तम्भ जिसमें
जिजीविषा, प्रेम, सहानुभूति की रश्मियाँ विकीर्ण हो रही
दे रही एक संदेश
देह से विदेह होने की
यही अमर यात्रा है
जिसे तय करनी है हर किसी को ।
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साइप्रस में
इस अनजाने गाँव में
कितना आडम्बर है
भूल-भूलैया के चौराहे पर सब काट रहे हैं चक्कर
धन के पीछे दौड़ रहे हैं भ्रमजाल में फंस-फंसकर
जीवन को बस धन से तौल रहे हैं
सब अपने में लीन न जाने किस धुन में अकेले-अकेले
तुम जरा आओ मेरे पास
जीसस है तेरा आदर्श
उसको ही देख टंग गया था सूली पर
घिरा रहा शूलों से
पर काम, मोह, माया, वासना में कहाँ घिरा
सारी उम्र सत्पथ पर चला
कंचन कामिनी में कब घिरा
अपनी सलीब ढ़ोता हुआ सदा
अकेला चला
संभलो तुम भी
और समझो तुम कौन हो
कहाँ हो ?
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साइप्रस में
सावन बार बार
देखा आकाश
उमड़ता घुमड़ता न कोई बादल
न नन्हीं बूंदे
मल्हार झूले
कुछ भी तो नहीं
मनिहार नहीं आते
न ही चूड़ी पहनाते
माँ ने भेजा है संदेश
मेंहदी लगा लेना
जरी वाली हरी साड़ी पहनना
चूड़ी पहनना बिछुए पहनना
कुछ मीठा भी बना लेना
माँ को कैसे बताऊँ
मुझे सब याद है
सहेलियों की टोली के साथ हँसना खिलखिलाना
झूले झूलना
रंग बिरंगी तिलली बनकर
लंबी लंबी पेंग बढाकर
आकाश को छूना
माँ को कैसे समझाऊँ
जहाँ तक भी देखती हूँ
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक
भावशून्य गौरी देह
खुलकर पसरी पड़ी है
माँ को कैसे बतलाऊँ
यहाँ
सावन आकाश में नहीं
समुद्र में बरसता है ।
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साइप्रस नहीं लुभाता
न जाने कहाँ कहाँ से
आते हैं इस सुंदर द्वीप में लोग
पर मुझे नहीं दिखता
यहाँ कहीं कोई आकर्षण
जब भी इसकी धरा पर पैर रखा
इस रेगिस्तान में
शरद में भी जल उठे हैं पैर मेरे
लहराता महासागर भी
नहीं पिघलता
रेत नहीं सोखता पानी
बस पानी ही सूखता हुआ
बिना वजह नहीं बन रही है यहाँ कविताएँ
इस पश्चिम की ओर पीठ करके जब भी
चाहा है लिखना
स्याही सूख जाती रही
नही होती कविता पूरी
और फिर वही शुष्क सा महासागर
प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है मेरे सामने
आखिर
यह सुंदर द्वीप
मुझे क्यों सुंदर नहीं लगता ?
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डॉ.
ममता जैन
Flat no-501, Artika
Court, Raffail Street
3107, Limasol, CYPRUS
