रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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कहानी

 

लिटिल बेबी - कमलेश माथुर

 

        बैंगलोर ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। यात्रियों की रेलमपेल। भीड़ ऐसी कि तिल रखने की भी जगह नहीं। जून का महीना, ऊपर से तपन और उमस भरी घुटन। कब ए.सी. कोच में घुसें और ठण्डक का आनन्द लें। धक्का-मुक्की के चलते हम दोनों डिब्बे में जैसे-तैसे घुसे। पता लगा, सीनियर सिटिजन होने पर भी थ्री टायर कोच में मुझे बीच में और इन्हें ऊपर वाली बर्थ मिली है। हिन्दुस्तानी मुसाफ़िरों के दोस्ताना अन्दाज़ के विश्वास में बन्धे रात्रि में किसी यात्री की दरियादिली की प्रतीक्षा में चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गए। गाड़ी चलने से पूर्व परिजनों से बिदा ली। शुभयात्रा के शुभ सन्देश मिले। सभी अपनी सीटें सम्भालने लगे।

 

        दो नीलनयना आधुनिक बहनें लगभग चार वर्षीय लिटिल बेबी के साथ ठीक मेरी सामने वाली सीट पर थीं। उनके साथ वाली अधेड़ स्त्री का पति सबसे ऊपर वाली बर्थ पर जैसे-तैसे पहुँचा दिया गया था। हम दोनो के आजू-बाजू दो नौजवान बैठे थे। आर.ए.एसी. की आरक्षित सीट पर एक नव-विवाहित युगल परस्पर चुहलबाजी कर रहा था। सीनियर सिटिजन होने पर भी रेलवे ध्यान नहीं देती- मैं बुदबुदाई। युगल का ध्यान बँटा। उसी की तरफ देखते हुए मैं पुनः शुरू हो गई- अब देखिये ना ! मैं तो ठीक, लेकिन मेरे इन पति महोदय को सबसे ऊपर वाली बर्थ मिली। ये हार्ट पेशेन्ट हैं। लड़का गम्भीर हो बाला- कोई बात नहीं आण्टी ! अंकल यहाँ मेरी नीचे वाली सीट पर सो जायेंगे। थैंक्यू बेटा। हिंदुस्तानी मुसाफ़िरों की दरियादिली का जवाब नहीं। मैंने भारतीय संस्कृति की विश्वामोहिनी छटा पर छोटा सा प्रवचन सुना डाला।

 

        मैंने सीट पर अब सहज हो बैठना चाहा ही था कि सामने वाली आधुनिक नीलनयना बहनों की लिटिल बेबी मॉम की पैंसिल हील पहने मेरे पैरों पर खड़ी-खड़ी कूदने लगी। मेरे मूँह की चीख सुनते ही पति उन पर आग-बबूला हो बरस पड़े- वी केन नॉट टालरेट सच टाइप ऑफ न्यूसेन्स यू नो ?” उत्तर मिला- वी कान्ट हैल्प हर अंकल यू नो। शी इज सच ए स्मॉल चाइल्ड, हाउ केन वी इन्टरफीयर इन हर पर्सनालिटी। सुनाकर इस तरह चुप हो गई, मानो कुछ हुआ ही नहीं था। इस बार बेबी ने मेरे मुँह पर चप्पल उछाल दी। न जाने कैसे इनका हाथ उस पर उठते-उठते रूक गया, वर्ना हँगामा खड़ा होने में देर नहीं थी। ऐसे यात्रियों के साथ इतना लम्बा सफ़र कैसे कटेगा, कुण्ठित मन बोझिल हो उठा। तुरन्त इस समस्या का समाधान भी नज़र नहीं आ रहा था। नीलनयना फिर शुरू हो गई- शी हेज गॉट हर ओन पर्सनालिटी टू डेवलप यू नो ..........। हाऊ केन वी इन्टरफीयर इन हर पर्सनालिटी। शी हेज गाट हर ओन राइट टू डवलप हर माइन्ड ऑर ब्रेन। नाऊ प्लीज डोन्ट टॉक टू अस एनी मोर। चोरी और सीना जोरी, की कोई हद ही नहीं। बात को विराम देते हुए अपनी सीट पर पसरने लगीं वे दोनों।

 

        बेबी भी सम्भवतः इस बहस से आंशिक आहत हुई थी। कुछ देर कोच में शान्ति रही। भोजन का समय था। सभी ने अपनी-अपनी भोजन व्यवस्था फैलाई। पलभर में स्वादिष्ट भोजन की सुगन्ध डिब्बे में फैल गई। इसके बाद अपनी-अपनी बर्थ पर यात्री फैले पसरे सोने की तैयारी में जुट गए। उस हनीमून युगल ने अपनी नीचे वाली बर्थ हमें सहज में दे दी थी। इसका प्रमाण भी स्पष्ट था। सबसे ऊपर वाली एक ही बर्थ पर युगल एक ही चादर में दोनों एक-दूसरे से लिपटे-चिपटे सबक तैयार करने में व्यस्त हो गए। इस बीच नई नवेली की हल्की चीखें, चुहलबाजी लगभग सभी जाग्रत यात्रियों का ध्यान आकर्षित कर रही थीं। लाइट का बार-बार जलना-बुझना भी उनकी क्रियाकलाप का अंग था। अन्धेरा होते ही लिटिल बेबी ज़ोर से चीखने लगती और उसी के साथ उसकी मॉम और मासी उस कपल को कोसने लगती। मेरे सामने वाली बर्थ पर लेटी अधेड़ महिला ने फौरन हैण्डबैग से रूद्राक्ष माला निकालकर ऊपरी बर्थ पर लेटे अपनी पति को जपने के लिए फेंकी- फिर नींद लग जायेगी, लो यह माला जप-ध्यान कर लो। मैंने तो जप ली। आज्ञाकारी पति लेटे से उठ बैठा। माला जपने लगा। लिटिल बेबी को अभी नींद आ रही थी। खेलने का मूड़ था। वो और मॉम नीचे वाली बर्थ पर ही पसरी पड़ी थी। उसका मूड़ खाना खाने का बन रहा था और मॉम का मूड़ सोने का। मॉम नींद के लिए लोरी सुना रही थी। उसकी लोरी से बेबी डॉल तो नहीं, पर यात्री जरूर प्रभावित हो सोने लगे। मेरी भी आँख लग गई। आधी रात को नींद खुल गई। सांय-सांय करते मद्धिम रोशनी वाले प्लेटफॉर्म पर ट्रेन चूँ-चूँ करते रुका। मेरा मन चाय पीने को था। चाय छोड़ इस सन्नाटे में चिड़िया भी नहीं थी। बर्थ पर इधर-उधर नज़र दौड़ाई, लिटिल बेबी मॉम की छाती से चिपकी थी। उसके सैण्डिल की जोड़ी इधर-उधर बेतरतीब पड़ी थी। मासी और मॉम की पैन्सिल हील वाली नुकीली चप्पलें भी इधर-उधर बेतरतीब पड़ी थी। एक नुकीली हील चप्पल यात्रियों की ठोकर खाते-खाते दरवाज़े तक जा पहुँची थी। मन में ख्याल आया इन्हें ठीक से लाकर बर्थ के नीचे सुरक्षित रख दूँ वर्ना ये सुन्दरियाँ प्लेटफॉर्म पर नंगे पैर चलने को विवश हो जायेगीं। दूसरे ही पल पर्सनालिटी डवलपमेण्ट प्रोग्राम का विचार आया और मैंने हृदय में उपजी इस सहानुभूति को बड़ी सहजता से शून्य में धकेल दिया। यद्यपि ऐसा करते हुए स्वयं को धिक भी महसूस किया। मानवीय मूल्यों की चर्चा करते-करते मानव हृदय में जो परिवर्तन का लक्षण आता है वह पश्चाताप ही होता होगा, क्योंकि कर्त्तव्यबोध के प्रति चैतन्यता को शून्य में धकेलने के बाद अपराधबोध बनना ऐसे परिवर्तन का ही संकेत है। किया धरा कुछ नहीं, बस ख्याली पुलाव बनते रहे और आँख फिर लग गई।

 

        ऊपर वाली बर्थ पर देर रात तक चूमा-चाटी और हल्की-फुल्की चीखें लगभग सभी उनींदे यात्रियों की चेतना केन्द्र बनी थीं। नए युग की बदलती धारा, देहधर्मी संस्कृति के संस्कारी संकेत, उलझन में फ़ँसा मन- सैक्स का खुला उतावलापन, एक- बोल्डनेस !

 

        दूसरे दिन दोपहर ग्यारह बजे सुन्दरियाँ जागी। मेकअप में सराबोर अपने को सज-सँवारने के बाद बोरिया-बिस्तर समेटना शुरू किया। बीच-बीच में अपने सैण्डिल-चप्पल भी खोलने के लिये दूर तक नज़रें दौड़ा रही थीं।

 

        उनका गन्तव्य आ गया। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन थमते ही अगल-बगल झाँकती नीलनयनाएँ बौखलाई हुई अपनी सैण्डिल ढूँढ़ रही थीं। लिटिल बेबी नंगे पैर ही स्टेशन प्लेटफॉर्म पर उतर जाने को उतावली हो रही थी। माँ ने पहले तो लय-सुर में पतली आवाज़ में उसे नंगे पैर से नीचे उतरने के लिये टोका, बेबी ने बालहठ के आवेग में माँ के हाथ में इतनी ज़ोर से दाँत गड़ाए कि मॉम के हाथ से खून निकल आया और ट्रेन एपिसोड के इस अन्तिम दृश्य की पराकाष्ठा में मॉम ने आव देखा न ताव और लिटिल बेबी के गाल पर तड़ाक से एक चाँटा जड़ दिया। सभी हक्के-बक्के देखते रह गये। बेबी ने प्रोटेस्ट में पुनः दाँत गड़ा दिये। वाह क्या सीन है वाला परिदृश्य। दूसरी बार मॉम ने ज्यों ही लिटिल बेबी को मारने के लिये हाथ उठाया, मैंने उसका हाथ कस कर पकड़ लिया। मेरे मुँह से अनायास ही नकल गया- प्लीज़ डोन्ट इन्टर-फियर विद हर पर्सनालिटी। वह हक्की-बक्की मुझे घूर रही थी। इसी के साथ उनके सैण्डिल हाथ में थमाते हुए मैंने उन्हें गुडबॉय कहा। वे तीनों अपने-अपने सैण्डिल प्लेटफॉर्म पर खड़ी पहन रही थी, ट्रेन ने गति पकड़ ली।

 

        सुबह के साढ़े ग्यारह बजे थे। आसमान में बादल छितराए थे। चिप-चिपाहट भरी उमस और गर्मी से ए.सी. कोच के बाहर लोग बेहद परेशान थे, जिसका अन्दाज कोच में मेनगेट पर आने पर ही लगाया जा सकता था। कोच के भीतर यात्री सब सहज थे। हनीमून कपल अभी तक एक ही चादर में लिपटे सो रहा था। ऊपरी बर्थ वाला अधेड़ कपल रात्रि में कहाँ व कब उतरा, पता नहीं। उसकी जगह कॉलेज की दो छात्राएँ बैठी थीं। एक प्राइड एण्ड प्रेजुडिस और दूसरी रीडर्स डाइजेस्ट के पेज पलट रही थी। हम गर्मा-गर्म चाय और टोस्ट का मजा ले रहे थे। पैन्सिल हील की चुभन पर मरहम चगाते हुए उस घटना को बार-बार याद कर रही थी। लिटिल बेबी की मॉम का पर्सनालिटी डवलपमेण्ट का पाठ अब मेरे लिए चिरस्मरणीय बन चुका था। क्यों महानगरीय संस्कृति अपनाने की होड़ में हम स्वयं को भूलने लगे हैं? क्यों भुला देना चाहते हैं हम मूल्यों की पहचान ? अनसुलझे प्रश्नों का न कोई उत्तर है न समाधान। जीवन मूल्यों की सिसकती विरासत का सोच जब-तब भी सालता है। जीवन के सफ़र में कई बार ऐसे ट्रेन एपिसोड देखने रहने की विवशता के लिए कोई रिमोट नहीं होता, सिवाय सोच बदलने के अलावा।

कमलेश माथुर

जयपुर, राजस्थान

 

 

 

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