रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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मनोज तोमर डॉ. किशोर काबरा डॉ. अनन्तराम मिश्र अनन्त विनोद कुमार उइसे दीप शबाब ललित कृष्ण शलभ  रमेशचन्द्र पाण्डेय शलभ सलीम अख्तर डॉ. बशीर बद्र डॉ. रवीन्द्र उपाध्याय नवरंग ख्वाब अकबराबादी

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बहुत बार उपाचारे दिन।।

किन्तु न हुए सुखारे दिन।।

 

पंख स्वयं के काट रहे

दृष्टिहीन, हत्यारे दिन।

 

कुछ को धूल समान यहाँ

कुछ को नभ के तारे दिन।

 

मूल्यावान हैं दिन उनके

सस्ते सिर्फ हमारे दिन।

 

लौट कभी क्या आएँगे

अपने उनके प्यारे दिन।

-मनोज तोमर

 

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बदले भला कहाँ सेहालात इस शहर के।।

वादे तुम्हारे सारे आँसू हुए मगर के।।

 

ऐसी पड़ी डकैती, चौपट हुई है खेती

केवल बची है रेती पैंदी में इस नहर के ।

 

घी-दूथ आसमाँ पर, पानीगया रसातल

बस, सामने हमारा प्याले बचे जहर के।

 

डूबी हमारी कश्ती, टूटी हमारी नावें

बहना पड़ेगा सबको अब साथ में लहर के।

 

सब जल गए हैं पत्ते, फल-फूल बिक चुके हैं

मौसम भला करे क्या इस बाग में ठहर के।

 

तूफान क्या उठ बस, ज्वालामुखी फटा है

संकेत हो रहे हैं, सब आखरी प्रहर के।

-डॉ. किशोर काबरा

 

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बाह्मा मुद्रएँ भली, अन्तःकरम अच्छा नहीं है।।

इन दिनों, इस देश का वातावरम अच्छा नहीं है।।

 

स्वर्णनगरों मेंविलासी, योग के रावण हुए फिर

राम मेरे, क्रांति-सीता का हरण अच्छा नहीं है।

 

दीप निर्बल को बढ़ाकर ,सबल पावक को बढ़ाती

पक्षपाती पवन का भी संचरण अच्छा नहीं है।

 

भोग-झंझावत ने है ज्योति चारित्रिक बुझायी

लग रहा युग-देह पर तिमिराभरण अच्छा नहीं है।

 

एकनिष्ठा चातकों की, सीख बारम्बार देती

गिरगिटों-सा प्रतिनिमिष रंगान्तरण अच्छा नहीं है।

 

भूख का पंखा न चलता, मत्त सत्त-आँधियों में

प्यास के घर तृप्ति-लकशों का क्षरण अच्छा नहीं है।

-डॉ. अनन्तराम मिश्र अनन्त

 

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बाहर जैसा तू दिखता है, वैसा ही तूअंदर लिख;

दरिया जिसमें जा मिलता है, उसको तू समंदर लिख।।

 

देख रहा है आते-जाते, खूना-खच्चर गलियों में;

लिखने वाले खुलकर अपने, घर आँगन का मंज़र लिख।

 

घर तो घर है, पूजा घर वह, जिसमें राम-रहीम दोनों;

फर्क नहीं पड़ता पगले वू, मस्जिद लिख या मन्दिर लिख।

 

आग उगलना ठीक नहीं पर, लहू अगर कहीं जम जाए;

तब कलम को, कलम नहीं वू वर्छी-भाला खंज़र लिख।

 

खोट नहीं जब मन में तेरे , तब तू क्यों घबराता है ?

लिखता है तो लिख शायर तू, होकर मस्त कलंदर लिख।

 

छीने जो औरों का हिस्सा, रिश्ता तक न जो माने

उसको इंसा क्यों लिखता है ? लिखना है तो बंदर लिख।

 

दीप-अर्चना और इबादत, मक्सद ईश्वर को पाना;

शंख ध्वनि, अरदास, अज़ां, में, नहीं कहीं कोई अंतर लिख।

-विनोद कुमार उइसे दीप

 

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बेटियाँ घरों में जब जबान हो गईं।।

गरदनें पिताओं की कामान हो गईं।।

 

निर्धनों का झोपड़ा न एक भी बचा

गाँव पर घटायें मेहरबान हो गईं।

 

जो शिकायतें ज़बान पर न आ सकीं

वो मेरी निगाह से बयान हो गईं।

 

लग रहा है शौहरों का मोल हर तरफ

शादियाँ दहेज की दुकान हो गईं।

 

सब कुछ इनक्लाब ने उलट पलट दिया

धरतियाँ जो थीं वो आसमान हो गईं।

-शबाब ललित

 

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बैरंग चिटठी में आए हैं स्वर अकुलाए गाँव से ।।

हरखू ,ननुआ, जुम्मन के कुछ आँसू आए गाँव से।।

 

क़ातिल पण्डित, शातिर मुल्ला अब के खड़े चुनाव में

ऐसे में बाबू सोचो अब किसे जिताए गाँव से।

 

अब तो मंदिर मस्जिद में भी जाने से जी डरता है

रुखसत होने को ही है बस प्यार दुआएँ गाँव से

 

साँझ ढले चतुरी की बेटी बँटी सियासतदारों में

ऐसे में बोलो किस किस की रपट लिखाएँ गाँव से

 

साहू का कारिंदा कल था आया साथ अमीन के

कुर्क़ किये घर खेत ले गया धान सवाए गाँव से

 

धरती दरकी बूंद न बरसी फ़सलें सुखा लील गया

साथ छोड़ कर लोग गये कुछ देश पराए गाँव से

-कृष्ण शलभ

 

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भावना विश्वास की बेदम हुई

हर घड़ी पतझर का मौसम हुई

 

पाँव मुड़कर जा लगे हैं पेट से

चादरों की नाप कितनी कम हुई

 

रसघुले संवाद पथरीले हुए

आदमी की देह घातक बम हुई

 

खोखली संवेदना नंगी हुई

सांत्वना भी मुफ्टत का मरहम हुई

 

थी अकेली आज तक भोली शिखा

स्नेह पाकर शलभ का संगम हुई

-रमेशचन्द्र पाण्डेय शलभ

 

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मजबूरों मोहताज सियासत चलने दो

कल की खातिर आज सियासत चलने दो

 

मंदिर मस्जिद गिरते हैं गिर जाने दो

तुम को कैसी लाज सियासत चलने दो

 

भूखे-नंगे लोग तुम्हारी जय बोले

तुम बोलो महाराज सियासत चलने दो

 

घर के बाह बोर्ड लगाओ सेवा का

अंदर गुण्डाराज सियासत चलने दो

 

अपने अपने नाखूलों को तौले सब

मिटे सभी की खाज सियासत चलने दो

 

रहे सलामत आपकी टोपी नेताजी

गिरे अजन्ता, ताज, गिरने दो

-सलीम अख्तर

 

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

 

घरों पे नाम थे,नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला

 

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था

फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला

 

बहुत अजीब है ये कुर्बतों की दूरी भी

वो मिरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला

 

खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने

बर एक शख्स को मांगा, मुझे वो ही न मिला ।

-डॉ. बशीर बद्र

 

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मान बेच कर सुबिधा पाना तौबा-तौबा

साहब के तलवे सहलाना तौबा-तौबा

 

मिहनत-मजदूरी कारुखा-सूखा अमृत

हया गँवाकर हलवा खाना तौबा-तौबा

 

गाँव-गाँव में, शहर-शहर में, डगर-डगर में

नफरत का यह ताना-बाना तौबा-तौबा

 

धरती माँ के फूल भरे दामन के नीचे

पगलों का बारूद बिछाना तौबा-तौबा

 

धरती माँ के फूल भरे दामन के नीचे

पगलों का बारूद बिछाना तौबा-तौबा

 

जिधर देखिए शोख सियासत नाच रही है

नज़र कहीं है कहीं निशाना तौबा-तौबा 

-डॉ. रवीन्द्र उपाध्याय

 

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मासूमियत और बचपना खोते हुए बच्चे

काँधों पे अपनी लाश को ढोते हुए बच्चे

 

कुछ पेटियों मेंकैद हैं इनकी जवानियाँ

बचपन से ही बुजुर्ग से होते हुए बच्चे

 

मी और जून की ये चिलचिलाती धूप

और अपने सर पे गिट्टियाँ ढोते हुए बच्चे

 

आँखों में उतर आई अपने मुक्ल का भविष्य

नंगे बदन फुटपाथ पर सोते हुए बच्चे

 

परवाज़ नहीं, पंख नहीं, आसमाँ नहीं

पिंजरे में बंद परकटे तोते हुए बच्चे

 

आँखों में खून आता है भिंच जाती है मुट्ठी

जब देखता हूँ भूख से रोते हुए बच्चे

-नवरंग

 

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मिरे खुलूस का सब पर असर नहीं होता

हरेक आदमी अहले-नज़र नहीं होता

 

हरिक मकीं में मुहब्बत हो ये जरूरी है

दरो-दिवार के हाने से घर नहीं होता

 

मुझे फ़रेब कभी उम्र भर न दे पाता

अगर वो दोस्त मिरा मोतबर नहीं होता

 

हदें हैं सबकी, हदों में सभी कोरहना है

कभी भी शाम का सूरज क़मर नहीं होता

 

खुदा ने की है अता ख्वाब मुझरो अक़्ले-सनीम

फ़िजूल बातों का मुझ पर असर नहीं होता

-ख्वाब अकबराबादी

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