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बहुत बार
उपाचारे दिन।।
किन्तु न हुए
सुखारे दिन।।
पंख स्वयं के
काट रहे
दृष्टिहीन,
हत्यारे दिन।
कुछ को धूल
समान यहाँ
कुछ को नभ के
तारे दिन।
मूल्यावान हैं
दिन उनके
सस्ते सिर्फ
हमारे दिन।
लौट कभी क्या
आएँगे
अपने उनके
प्यारे दिन।
-मनोज तोमर
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बदले भला कहाँ
सेहालात इस शहर के।।
वादे तुम्हारे
सारे आँसू हुए मगर के।।
ऐसी पड़ी
डकैती, चौपट हुई है खेती
केवल बची है
रेती पैंदी में इस नहर के ।
घी-दूथ आसमाँ
पर, पानीगया रसातल
बस, सामने
हमारा प्याले बचे जहर के।
डूबी हमारी
कश्ती, टूटी हमारी नावें
बहना पड़ेगा
सबको अब साथ में लहर के।
सब जल गए हैं
पत्ते, फल-फूल बिक चुके हैं
मौसम भला करे
क्या इस बाग में ठहर के।
तूफान क्या उठ
बस, ज्वालामुखी फटा है
संकेत हो रहे
हैं, सब आखरी प्रहर के।
-डॉ. किशोर काबरा
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बाह्मा मुद्रएँ
भली, अन्तःकरम अच्छा नहीं है।।
इन दिनों, इस
देश का वातावरम अच्छा नहीं है।।
स्वर्णनगरों
मेंविलासी, योग के रावण हुए फिर
राम मेरे,
क्रांति-सीता का हरण अच्छा नहीं है।
दीप निर्बल को
बढ़ाकर ,सबल पावक को बढ़ाती
पक्षपाती पवन
का भी संचरण अच्छा नहीं है।
भोग-झंझावत ने
है ज्योति चारित्रिक बुझायी
लग रहा युग-देह
पर तिमिराभरण अच्छा नहीं है।
एकनिष्ठा
चातकों की, सीख बारम्बार देती
गिरगिटों-सा
प्रतिनिमिष रंगान्तरण अच्छा नहीं है।
भूख का पंखा न
चलता, मत्त सत्त-आँधियों में
प्यास के घर
तृप्ति-लकशों का क्षरण अच्छा नहीं है।
-डॉ. अनन्तराम मिश्र
‘अनन्त’
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बाहर जैसा तू
दिखता है, वैसा ही तूअंदर लिख;
दरिया जिसमें
जा मिलता है, उसको तू समंदर लिख।।
देख रहा है
आते-जाते, खूना-खच्चर गलियों में;
लिखने वाले
खुलकर अपने, घर आँगन का मंज़र लिख।
घर तो घर है,
पूजा घर वह, जिसमें राम-रहीम दोनों;
फर्क नहीं
पड़ता पगले वू, मस्जिद लिख या मन्दिर लिख।
आग उगलना ठीक
नहीं पर, लहू अगर कहीं जम जाए;
तब कलम को, कलम
नहीं वू वर्छी-भाला खंज़र लिख।
खोट नहीं जब मन
में तेरे , तब तू क्यों घबराता है
?
लिखता है तो
लिख शायर तू, होकर मस्त कलंदर लिख।
छीने जो औरों
का हिस्सा, रिश्ता तक न जो माने
उसको इंसा’
क्यों लिखता है
? लिखना
है तो बंदर लिख।
‘दीप’-अर्चना
और इबादत, मक्सद ईश्वर को पाना;
शंख ध्वनि,
अरदास, अज़ां, में, नहीं कहीं कोई अंतर लिख।
-विनोद कुमार उइसे
‘दीप’
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बेटियाँ घरों
में जब जबान हो गईं।।
गरदनें पिताओं
की कामान हो गईं।।
निर्धनों का
झोपड़ा न एक भी बचा
गाँव पर घटायें
मेहरबान हो गईं।
जो शिकायतें
ज़बान पर न आ सकीं
वो मेरी निगाह
से बयान हो गईं।
लग रहा है
शौहरों का मोल हर तरफ
शादियाँ दहेज
की दुकान हो गईं।
सब कुछ इनक्लाब
ने उलट पलट दिया
धरतियाँ जो थीं
वो आसमान हो गईं।
-शबाब ललित
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बैरंग चिटठी
में आए हैं स्वर अकुलाए गाँव से ।।
हरखू ,ननुआ,
जुम्मन के कुछ आँसू आए गाँव से।।
क़ातिल पण्डित,
शातिर मुल्ला अब के खड़े चुनाव में
ऐसे में बाबू
सोचो अब किसे जिताए गाँव से।
अब तो मंदिर
मस्जिद में भी जाने से जी डरता है
रुखसत होने को
ही है बस प्यार दुआएँ गाँव से
साँझ ढले चतुरी
की बेटी बँटी सियासतदारों में
ऐसे में बोलो
किस किस की रपट लिखाएँ गाँव से
साहू का
कारिंदा कल था आया साथ अमीन के
कुर्क़ किये घर
खेत ले गया धान सवाए गाँव से
धरती दरकी बूंद
न बरसी फ़सलें सुखा लील गया
साथ छोड़ कर
लोग गये कुछ देश पराए गाँव से
-कृष्ण शलभ