रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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  इरफान सिद्दीक़ी  हरजीत सिंह शोभना उइके शोभा गोपाल गर्ग साबिर जबलपुरी

 ● चन्द्रेन विराट   सुखनवर रायपुरी खुर्शीद तलब  ●  अशोक आनन

जंगल में भी बस्ती के आसार निकल आये।

किस सिम्त रिहा होके गिरफ़्तार निकल आये।

 

मैदान में हर चंद मैं तन्हा था मग़र ख़ैर

लौटा तो बहुत मेरे मददगार निकल आये।

 

फिर हम पे सितम हो कि पये हल्का-ए-यारां

कुछ हीला-ए-मछाही सरकार निकल आये।

 

अन्दशा-ए-जां खेमे की दीवार तलक़ है

कुछ भी नहीं होगा अगर एक बार निकल आये।

 

बाज़ार में आये हैं तो क्यों मोल घटाएँ

शायद कोई अपना भी खरीदार निकल आये।

-इरफान सिद्दीक़ी

 

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जंग छिड़ी सरहद सरहद

कांप उठे गुंबद गुंबद

 

पौधों तक वो आ न सकी

धूप रही बरगद बरगद।

 

उम्र समंदर में कश्ती

पतवारें मक्सद मक्सद।

 

आप बिठाया करते हैं

साँपों को मस्नद मस्नद

 

सच था लेकिन सच न कहा

करते रहे शायद शायद।

-हरजीत सिंह

 

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तम हटाने की सौगंध जो खाते रहे।

वो अंधेरा घना और बढ़ाते रहे।

 

जुगनुओं तक को तो कर लिया कुर्क़ है

बाकी दर्पण में तारे दिखाते रहे।

 

मौन कब तक रहें और क्यों कर रहें

जो पसीने से लोहा गलाते रहे।

 

आस्था पर हमें अब भी विश्वास है

आस्था में मगर चोट खाते रहे।

 

चोट खाकर सदा गुनगुनाते रहे

गुनगुनाते रहे दर्द पीते रहे।

 

भोलेपर को हमारे समेटे हुये

रहनुमा बन के वो मुस्कुराते रहे।

 

है अमावस की शोभा यहाँ कालिमा

व्यर्थ दीपक कई झिलमिलाते रहे।   

-शोभना उइके शोभा

 

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तट की माटी से पानी में घुल-घुल गये अजाने दिन।

या सपनों के महाग्रंथ के पीले पृष्ठ, पुराने दिन।


थोड़ी गंध सहजता वाली अकर्षण के साथ गई

साँझ ढले सो जाता, रखकर शेष-गंध सिरहाने दिन।

 

भूले तो तुम नहीं, याद से उतर गये होंगे शायद

फूल किताबों में रखने के बनते रहे बहाने दिन।

 

याद की धरती गिरवी रख कर सुख बंधुआ मज़दूर हुए

जन्में हैं शायद परिचय के दुख का कर्ज चुकाने दिन।

 

शाम ढले मंदिर का गुम्बज सूना क्यों हो जाता है

सोच रहा था एक कबूतर कहाँ गये पहचाने दिन।

 

कुछ दिन तो ताज़ा गुलाब से खिलते मन की क्यारी में

फिर चंदन की लकड़ी जैसे रह जाते अफ़साने दिन।

-गोपाल गर्ग

 

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तुम्हारे ज़ुल्म पै हम सहके इक मेरी जुबां चुप है।

मगर ऐसा ना तुम समझो के ये सारा जहां चुप है।

 

हमारे आशियां के चन्द तिनकों से नहीं खाइफ

हमारा अज़म मुहक़म देख कर बर्के़ तपां चुप है

 

तुम्हारी तीरा बखती खूँ रुलाती है चमन वालों

मगर हम क्या करें जब ख़ुद तुम्हारा बाग़ बां चुप है।

 

सुनो चारोगरों ये वक्त की नब्जें बताती हैं

ना कोई ग़मज़दा चुप है न कोई शादमा चुप है।

 

हज़ारो तिश्ना तब तिश्ना लबीं से मर गए लेकिन

समझ में ये नहीं आता के क्यूँ पीरे मुग़ां चुप है।

 

शिकायत कुछ न कुछ है हर बशर को इस ज़माने से

बड़ा साबिर है वो इस दौर में जिस की जूबां चुप है।

-साबिर जबलपुरी

 

तुमसे ये प्रशन टाल के टाले न जायेंगे।

ये साँप आस्तीन में पाले न जायेंगे।

 

तुम ही जवाबदार हो उठकर जवाब दो

दोगे न तो ज़ुबान से छाले न जायेंगे।

 

ये आदमी की खाल के सिक्के हैं आज से

अब आपकी टकसाल में ढाले न जायेंगे ।

 

सोमालिया में भूख वो देखी की आह! बस

हमसे तो मुँह में आज निवाले न जायेंगे।

 

अय, ज़ुल्म! ख़बरदार कर्बला में इस दफा

नेजे पे तुझसे शीश उछाले न जायेंगे।

 

अब फैसला हो जायगा, इस बार युद्ध में

अपने सरों को चाहने वाले न जायेंगे।

 

हर बेगुनाह लाश का वो बोझ पड़ेगा

तुमसे ये तख़्तो-ताज़ सँभाले न जायेंगे।

-चन्द्रेन विराट

 

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दर्दो-गम़ दिल का दरकिनार करें।

ज़िन्दगी अपनी पुरबहार करें।

 

मिल ही जाएगी मंजिलें मक़सूद

कोशिशें हम जो बार-बार करें।

 

फेंक कर उस तरफ भी तीरे नज़र

उनकी नज़रों को शर्मसार करें।

 

छोड़ देती है साथ पल भर में

ज़िन्दगी पर न ऐतेबार करें।

 

चन्द सिक्कों में बेचकर फ़न को

यूँ न तौहीने शाहकार करें।

 

ऐ सुख़नवर ग़रीब हैं हम भी

फिर ग़रीबों से क्यूँ न प्यार करें।

-सुखनवर रायपुरी

 

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दिन के उजले मंजर उनके, काली रात हमारी,

भैया, अब के युग में क्या हम क्या औक़ात हमारी !

 

हम कीचड़ में रहने वाले आदिवासी लोग !

भैया, कैसी सर्दी-गर्मी क्या बरसात हमारी !

 

रात को गलियारे में देखा मखमल टाट को मिलते

भैया, अपने कानों तक ही रखना बात हमारी।

 

शहर के सारे शौरफ़ा-सैयद रिश्ते लेकर आए

भैया, अपने दिन क्या बदले बदली जात हमारी।

 

कब उजड़ेंगे उस धरती से पिछड़ेपन के पाँव

भैया, जीवन-युद्ध में कब तक होगी मात हमारी ?

 

ठाकुर की कोठी में जब भी लगता है दरबार

भैया, बँट जाती है इज़्ज़त हाथों-हाथ हमारी।

 

और तलब वो होंगे जिनकी होती बात बड़ी

भैया, हम छोटे मुँह वाले छोटी बात हमारी।

-खुर्शीद तलब

 

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दुर्गन्ध का भवन

जुकाम ग्रस्त जन

 

आलपिन-सी पीर

ह्रदय है कुशन

 

धूप का महल

बर्फ का बदन

 

विवेक-शून्य तंत्र

भेड़-सा चलन

 

ज़िन्दगी है लाश

वक्त का कफ़न

 

भूख का शहर

प्यास की तपन

 

बुत से हैं लोग

व्यर्थ आज सृजन

-अशोक आनन

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