जंगल में भी बस्ती के आसार निकल आये।
किस सिम्त रिहा होके गिरफ़्तार निकल आये।
मैदान में हर चंद मैं
तन्हा था मग़र ख़ैर
लौटा तो बहुत मेरे मददगार निकल आये।
फिर हम पे सितम हो कि पये हल्का-ए-यारां
कुछ हीला-ए-मछाही सरकार निकल आये।
अन्दशा-ए-जां खेमे की दीवार तलक़ है
कुछ भी नहीं होगा अगर एक बार निकल आये।
बाज़ार में आये हैं तो क्यों मोल घटाएँ
शायद कोई अपना भी खरीदार निकल आये।
-इरफान सिद्दीक़ी
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जंग छिड़ी सरहद सरहद
कांप उठे गुंबद गुंबद
पौधों तक वो आ न सकी
धूप रही बरगद बरगद।
उम्र समंदर में कश्ती
पतवारें मक्सद मक्सद।
आप बिठाया करते हैं
साँपों को मस्नद मस्नद
सच था लेकिन सच न कहा
करते रहे शायद शायद।
-हरजीत सिंह
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तम हटाने की सौगंध जो खाते रहे।
वो अंधेरा घना और बढ़ाते रहे।
जुगनुओं तक को तो कर लिया कुर्क़ है
बाकी दर्पण में तारे दिखाते रहे।
मौन कब तक रहें और क्यों कर रहें
जो पसीने से लोहा गलाते रहे।
आस्था पर हमें अब भी विश्वास है
आस्था में मगर चोट खाते रहे।
चोट खाकर सदा गुनगुनाते रहे
गुनगुनाते रहे दर्द पीते रहे।
भोलेपर को हमारे समेटे हुये
रहनुमा बन के वो मुस्कुराते रहे।
है अमावस की
‘शोभा’
यहाँ कालिमा
व्यर्थ दीपक कई झिलमिलाते रहे।
-शोभना उइके
‘शोभा’
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तट की माटी से पानी में घुल-घुल गये अजाने दिन।
या सपनों के महाग्रंथ के पीले पृष्ठ, पुराने दिन।
थोड़ी गंध सहजता वाली अकर्षण के साथ गई
साँझ ढले सो जाता, रखकर शेष-गंध सिरहाने दिन।
भूले तो तुम नहीं, याद से उतर गये होंगे शायद
फूल किताबों में रखने के बनते रहे बहाने दिन।
याद की धरती गिरवी रख कर सुख बंधुआ मज़दूर हुए
जन्में हैं शायद परिचय के दुख का कर्ज चुकाने दिन।
शाम ढले मंदिर का गुम्बज सूना क्यों हो जाता है
सोच रहा था एक कबूतर कहाँ गये पहचाने दिन।
कुछ दिन तो ताज़ा गुलाब से खिलते मन की क्यारी में
फिर चंदन की लकड़ी जैसे रह जाते अफ़साने दिन।
-गोपाल गर्ग
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तुम्हारे ज़ुल्म पै हम सहके इक मेरी जुबां चुप है।
मगर ऐसा ना तुम समझो के ये सारा जहां चुप है।
हमारे आशियां के चन्द तिनकों से नहीं खाइफ
हमारा अज़म मुहक़म देख कर बर्के़ तपां चुप है
तुम्हारी तीरा बखती खूँ रुलाती है चमन वालों
मगर हम क्या करें जब ख़ुद तुम्हारा बाग़ बां चुप है।
सुनो चारोगरों ये वक्त की नब्जें बताती हैं
ना कोई ग़मज़दा चुप है न कोई शादमा चुप है।
हज़ारो तिश्ना तब तिश्ना लबीं से मर गए लेकिन
समझ में ये नहीं आता के क्यूँ पीरे मुग़ां चुप है।
शिकायत कुछ न कुछ है हर बशर को इस ज़माने से
बड़ा
‘साबिर’
है वो इस दौर में जिस की जूबां चुप है।
-साबिर जबलपुरी