रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  विजय वाते  डॉ. अजय चौधरी विजय कुमार सिंघल विनोद तिवारी नदीम सिद्दीकी

 ● माजिद देवबन्दी हस्तीमल हस्ती निसार शिमलवी  ●  कुष्ण सुकुमार बी.एल. अग्रवाल स्नेही

 000

केंचुओं में भी छोटा बड़ा केंचुआ।

कितने ऊँचे पे जा के चढ़ा केंचुआ।

 

गन्दे नाले का पानी क्यों रुकने लगा

लो देखो मुहाने अड़ा केंचुआ।

 

शक्तिशाली के आगे तो बेबस है वो

आम जन के लिए नकचढ़ा केंचुआ।

 

यों तो सब के लिए मांस का लोथड़ा

केंचुए की नज़र में गड़ा केंचुआ।

-विजय वाते

 

 000 

कैसी भी हो बात जमूरा बोलेगा।

सबके दिल का हाल जमूरा खोलेगा।

 

कष्ट न होगा बरसों की आदत ठहरी

भूखा होगा पेट जमूरा सो लेगा।

 

सारी पूँजी आँखों का पानी, उसका

सुख की होगी बात जमूरा रो लेगा।

 

वो समझेगा सब संकेत मदारी के

मजमे में हर बात जमूरा बोलेगा।

 

अपनी जीवित लाश उठाने वाला वो

कितना भी हो बोझ जमूरा ढो लेगा।

 

इस बस्ती में सब पर भारी होकर भी

हल्का सबसे खुद को जमूरा तोलेगा।

-डॉ. अजय चौधरी

 

000 

कैसा जुनून भर गई उनके सरों में रात।

वो सुबह तक उड़ते रहे लेकर परों में रात।

 

दिन में भी कोई शख्स जहाँ ठहरता नहीं

कैसे गुज़ारते रहे हम उन घरों में रात।

 

हमको कचोटते रहे अपने ही फैसले

हमको उठाके ले गई फिर कटघरों में रात।

 

नारों के शोर के सिवा क्या मिल सका हमें

होनी थी कत्ल हो गई जलसाघरों में रात।

 

ये और बात है हमें आई नहीं हँसी

गो बट गई खै़रात सी कुछ मसखरों में रात।

 

कोई भी उसके दर्द का चारा न कर सका

बैठी रही लाचार-सी कुछ मसखरों में रात।

 

-विजय कुमार सिंघल

 

 000 

खुदा जाने कहाँ पर खो गई हैं चाँदनी रातें।

अब तो एक सपना हो गई हैं चाँदनी रातें।

 

शहर में आजकल अपने अँधेरा ही अँधेरा है

परिन्दों-सी सहम कर सो गई हैं चाँदनी रातें।

 

सितारे हो गए हैं होटलों के साथ वावस्ता

सुना है खूब महँगी हो गई हैं चाँदनी रातें।

 

वो लड़की रौशनी का नाम सुनकर काँप जाती है

ये किस दहशत के काँटे बो गई हैं चाँदनी रातें।

 

भटकते फिर रहे हैं जिन्दगी के बीहड़ों में हम

नहीं लौटी पलट कर जो गई हैं चाँदनी रातें।

-विनोद तिवारी

 

000 

गहरे समन्दरों में विल आखिर उतर गए।

खुशफहमियों का ज़हर पिया और मर गए।

 

हम अहदेनव के लोग भी अल्लाह की पनाह

कासा उठाए हाथ में अपने ही घर गए।

 

कुछ लाग उड़ रहे थे हवाओं के दोश पर

क्या जाने किस ख्याल से हम भी उधर गए।

 

कल रात पी पिला के बड़ी मस्तियाँ हुईं

आखिर को थक थका के फिर अपने ही घर गए।

 

क्या क्या न बन रहे थे यहाँ हज़रते नदीम

सूरज को छूने निकले थे साए से डर गए।

-नदीम सिद्दीकी

 

 

 

 000

घर सलामत है ना सामाने सफ़र बाकी है

ये खुदा की है इनायत कि बशर बाक़ी है।

 

पूछती फिरती है तहज़ीब मेरे पुरखों की

मेरे मिटने में अभी कितनी कसर बाक़ी है।

 

आग बरसा के गुज़र तो गये बादल लेकिन

आज तक शहर में गरमी का असर बाक़ी है।

 

दम घूटा जाता है तारीकिये शब से लेकिन

ये भी क्या कम है कि उम्मीदे सहर बाक़ी है।

 

एक सन्नाटा मुसल्लत है सरे राहे जुनूँ

राह रौ कोई नहीं राहगुजर बाक़ी है।

 

वो जो कातिल है हज़ारों का यहाँ ए माजिद

उसको बाक़ी नहीं रहना था मगर बाक़ी है। 

-माजिद देवबन्दी
 

 000 

चाहे जिससे भी वास्ता रखना।

चल सको उतना फासला रखना।

 

दर्द आये भी तो गुज़र जाये

जिस्म को एक रास्ता रखना।

 

कितना मुश्किल है कितना मुश्किल है

पर को परवाज़ से जुदा रखना।

 

रास्ते भी रहा करें रौशन

इस तरह बाम पे दिया रखना।

 

उज्र तस्वीरों से नहीं लेकिन

आइने के लिये जगह रखना।

 

फासलों की है नींद नजदीकी

ध्यान में ये भी फलसफा रखना।

-हस्तीमल हस्ती

 

  000 

छीन कर मुझसे मेरे ख्वाबों के मन्ज़र ले गया।

चुनने आया था जो मोती वो समन्दर ले गया।

 

हम नशीं बन कर रहा जो मुद्दतों घर में मेरे

जब गया वो कुल हसीं लम्हों के मन्ज़र ले गया।

 

मोतबर समझा जिसे ना मोतबार निकला वही

बनके आया था निगहबाँ लूटकर घर ले गया।

 

बच रही थी जो बुजुर्गों की विरासत अपने पास

छीन कर उसको सियासत का सिकंदर ले गया।

 

जो बना फिरता था जंगल का मुहाफिज ए निसार

काट कर जंगल के वो सारे शजर घर ले गया।

निसार शिमलवी

 

 000 

जब अंधेरों का उजालों से बड़ा कद हो गया।

ढूँढ़ना अपना ही साया एक मकसद हो गया।

 

खूँ रगों में दौड़ने वाला सड़क पर बह गया

आदमी ही आदमी के बीच सरहद हो गया।

 

वारदातों और हंगामों भरी इस भीड़ में

आँख से कम्बख्त आँसू भी नदारद हो गया।

 

जब कदम उसके सियासी-चाल में उठने लगे

रास्ता मंजिल का खुद ब खुद बरामद हो गया।

 

हो रहे हैं रोशनी में आजकल सारे गुनाह

था अँधेरा एक पौधा आज बरगद हो गया।

-कुष्ण सुकुमार

 

 000 

जहर साँपों का बेअसर हुआ।

आदमी जब से अजगर हुआ।

 

मुर्दा वजूद घूम रहे हैं लावारिस

यारों कभी इनका भी घर हुआ।

 

सच्चाइयों का बोझ मैंने ढोया

कलम इसीलिये मेरा सर हुआ।

 

इन्सानो को कैसी हो गयी एलर्जी

दमे से ग्रस्त सारा शहर हुआ।

 

महंगाई का यूँ फैला कैंसर

हर शख्स पे इनका असर हुआ।

 

यह कैसी हवा चली है दोस्तों

चमन बूढ़ा औ जर्जर हुआ।

-बी.एल. अग्रवाल स्नेही

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com