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केंचुओं में भी छोटा बड़ा केंचुआ।
कितने ऊँचे पे जा के चढ़ा केंचुआ।
गन्दे नाले का पानी क्यों रुकने लगा
लो देखो मुहाने अड़ा केंचुआ।
शक्तिशाली के आगे तो बेबस है वो
आम जन के लिए नकचढ़ा केंचुआ।
यों तो सब के लिए मांस का लोथड़ा
केंचुए की नज़र में गड़ा केंचुआ।
-विजय वाते
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कैसी भी हो बात जमूरा बोलेगा।
सबके दिल का हाल जमूरा खोलेगा।
कष्ट न होगा बरसों की आदत ठहरी
भूखा होगा पेट जमूरा सो लेगा।
सारी पूँजी आँखों का पानी, उसका
सुख की होगी बात जमूरा रो लेगा।
वो समझेगा सब संकेत मदारी के
मजमे में हर बात जमूरा बोलेगा।
अपनी जीवित लाश उठाने वाला वो
कितना भी हो बोझ जमूरा ढो लेगा।
इस बस्ती में सब पर भारी होकर भी
हल्का सबसे खुद को जमूरा तोलेगा।
-डॉ. अजय चौधरी
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कैसा जुनून भर गई उनके सरों में रात।
वो सुबह तक उड़ते रहे लेकर परों में रात।
दिन में भी कोई शख्स जहाँ ठहरता नहीं
कैसे गुज़ारते रहे हम उन घरों में रात।
हमको कचोटते रहे अपने ही फैसले
हमको उठाके ले गई फिर कटघरों में रात।
नारों के शोर के सिवा क्या मिल सका हमें
होनी थी कत्ल हो गई जलसाघरों में रात।
ये और बात है हमें आई नहीं हँसी
गो बट गई खै़रात सी कुछ मसखरों में रात।
कोई भी उसके दर्द का चारा न कर सका
बैठी रही लाचार-सी कुछ मसखरों में रात।
-विजय कुमार सिंघल
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खुदा जाने कहाँ पर खो गई हैं चाँदनी रातें।
अब तो एक सपना हो गई हैं चाँदनी रातें।
शहर में आजकल अपने अँधेरा ही अँधेरा है
परिन्दों-सी सहम कर सो गई हैं चाँदनी रातें।
सितारे हो गए हैं होटलों के साथ वावस्ता
सुना है खूब महँगी हो गई हैं चाँदनी रातें।
वो लड़की रौशनी का नाम सुनकर काँप जाती है
ये किस दहशत के काँटे बो गई हैं चाँदनी रातें।
भटकते फिर रहे हैं जिन्दगी के बीहड़ों में हम
नहीं लौटी पलट कर जो गई हैं चाँदनी रातें।
-विनोद तिवारी
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गहरे समन्दरों में विल आखिर उतर गए।
खुशफहमियों का ज़हर पिया और मर गए।
हम अहदेनव के लोग भी अल्लाह की पनाह
कासा उठाए हाथ में अपने ही घर गए।
कुछ लाग उड़ रहे थे हवाओं के दोश पर
क्या जाने किस ख्याल से हम भी उधर गए।
कल रात पी पिला के बड़ी मस्तियाँ हुईं
आखिर को थक थका के फिर अपने ही घर गए।
क्या क्या न बन रहे थे यहाँ हज़रते
‘नदीम’
सूरज को छूने निकले थे साए से डर गए।
-नदीम सिद्दीकी