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आस्तीनों में अगर साँप न पाले होते ।
अपनी किस्मत में उजाले ही उजाले होते ।
क़ैस के आप अगर चाहने वाले होते
आप के पाँव में मेंहदी नहीं छाले होते ।
हम सियासत को तिजारत नहीं समझे वरना
अपने हाथों में भी सोने के निबाले होते ।
जिंदगी कुछ तो सलीके़ गुज़रती अपनी
वक्त पर हमको जो कुछ लोग सँभाले होते ।
तू सही होता तो साक़ी तेरे मयखाने को
चंद बहके हुए मयकश न सँभाले होते ।
जज़्ब कर लेता मैं आँखों से न बहने देता
तेरे जज़्बात अगर मेरे हवाले होते ।
हमको तक़दीर सँभलने का जो मौक़ा देती
हम ज़माने में ज़माने से निराले होते ।
उसको जो चाहने वाले हैं सभी एक नहीं
वरना
‘कौसर’
न ये मस्जिद न शिवाले होते ।
-अब्दुस्सलाम
‘कौसर’
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आप ऊँचे हैं सुनेंगे आप को छत पर के लोग
बात अपनी तो ज़मीनी जमा है घर भर के लोग ।
नापिये मत जिन्दगी को ध्यान में रख बम्बई
भूलिए मत इसी हिन्दोस्तां मे हैं बस्तर के लोग ।
वेशभूषा कार बंगलों से न आँकें हैसियत
आइए पैदल दिखायें आपको स्तर के लोग।
देह भी निर्मित है शायद इनकी दोमट भूमि से
झेलते गर्मी और दर्दी बिना बिस्तर के लोग।
खिलखिलाहट को नज़र इनकी न
अपनों की लगे
हैं घुटन, कुण्ठा, तनावों से परे छप्पर के लोग।
आप इनसे बोलना तो सीखिए इनकी तरह
फाँदकर माँदें चलेंगे शेर से लश्कर के लोग।
आज़मा कर देखिए ये मर मिटेंगे बात पर
हाथ बाँधे जो खड़े हैं सामने हँसकर के लोग।
-धर्मेन्द्र कटियार
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आश्वासन ने बाँट दिये हैं इतने सारे डर यारों ।
मासूमों के हाथों में भी दिखते हैं खंज़र यारों ।
पत्थर जमा किये लोगों ने घर की छत के कोनों पर
अच्छे नज़र नहीं आते फिर मौसम के तेवर यारों ।
आये हैं कुछ लोग शहर में सद्भावों के
फूल लिये
रात कटे तो कटे सुबह ही टूटेंगे कुछ घर यारों ।
जब जब वह आया नदिया के पानी ने रंगत बदली
अब तो हमें मसीहा से भी लगता है कुछ डर यारों ।
बना लिया है महानगर में जिस दिन से एसी बंगला
तरस गये हैं मीठे सपनों को खाली बिस्तर यारों ।
चलो सरित जी ऐसी कोई जगह तलाशें धरती पर
जहाँ नहीं गिरजा मस्जिद गुरुद्वारा मैदर यारों ।
-सुशील कुमार सक्सेना
‘सरित’
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आज के हालात का हल ढूँढिए ।
कल के इमकानात का हल ढूँढिए ।
सिर्फ हथियारों से होगा कुछ नहीं
बात से ही बात का हल ढूँढिए ।
हर हथेली पर उगाइए सूर्य अब
ऐसे काली रात का हल ढूँढिए ।
आदमी होकर नहीं है आदमी
आदमी की जात का हल ढूँढिए ।
उसको विष पीते हुए हैं युग कई
अब तो उस सुकरात का हल ढूँढिए ।
वक्त दिखलाता है ये मंज़र सभी
वक्त की औकात का हल ढूँढिए ।
-गुलशन मदान
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आज संज्ञाएँ हैं आतुर फिर विशेषण के लिए ।
हैं विशेषण को मिले अधिकार शोषण के लिए ।
दिक्कतों के नाम गिरवी उम्र ही लिख दी गयी
देह पर अधिकार लकवे का कुपोषण के लिए ।
यातनाएँ जो भी सम्भव थीं वो निर्गत हैं मुझे
शेष जो दी जाएँगी ठहरी परीक्षण के लिए ।
आपकी हठवादिता की सोच सचमुच मानिए
है बहुत पर्याप्त कविता में प्रदूषण के लिए ।
खेद पर प्रतिबंध वर्जित हैं मेरी अभिव्यक्तियाँ
किस तरह तत्पर मिलूँ सारे निरूपण के लिए ।
भीड़ का मंदिर सड़क है और मेरा घर भी है
अब नहीं मिलता यहाँ कोई समर्पण के लिए ।
-परमानंद
‘आनद’