रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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  अब्दुस्सलाम कौसर धर्मेन्द्र कटियार सुशील कुमार सक्सेना सरित गुलशन मदान परमानंद आनद

 ●  विभांशु दिव्याल लक्ष्मीनारायण पयोधि किशन तिवारी ●  महेश अश्क डॉ. उर्मिलेश

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आस्तीनों में  अगर साँप न पाले होते ।

अपनी किस्मत में उजाले ही उजाले होते ।

 

क़ैस के आप अगर चाहने वाले होते

आप के पाँव में मेंहदी नहीं छाले होते ।

 

हम सियासत को तिजारत नहीं समझे वरना

अपने हाथों में भी सोने के निबाले होते ।

 

जिंदगी कुछ तो सलीके़ गुज़रती अपनी

वक्त पर हमको जो कुछ लोग सँभाले होते ।

 

तू सही होता तो साक़ी तेरे मयखाने को

चंद बहके हुए मयकश न सँभाले होते ।

 

जज़्ब कर लेता मैं आँखों से न बहने देता

तेरे जज़्बात अगर मेरे हवाले होते ।

 

हमको तक़दीर सँभलने का जो मौक़ा देती

हम ज़माने में ज़माने से निराले होते ।

 

उसको जो चाहने वाले हैं सभी एक नहीं

वरना कौसर न ये मस्जिद न शिवाले होते ।

-अब्दुस्सलाम कौसर

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आप ऊँचे हैं सुनेंगे आप को छत पर के लोग

बात अपनी तो ज़मीनी जमा है घर भर के लोग ।

 

नापिये मत जिन्दगी को ध्यान में रख बम्बई

भूलिए मत इसी हिन्दोस्तां मे हैं बस्तर के लोग ।

 

वेशभूषा कार बंगलों से न आँकें हैसियत

आइए पैदल दिखायें आपको स्तर के लोग।

 

देह भी निर्मित है शायद इनकी दोमट भूमि से

झेलते गर्मी और दर्दी बिना बिस्तर के लोग।

 

खिलखिलाहट को नज़र इनकी न अपनों की लगे

हैं घुटन, कुण्ठा, तनावों से परे छप्पर के लोग।

 

आप इनसे बोलना तो सीखिए इनकी तरह

फाँदकर माँदें चलेंगे शेर से लश्कर के लोग।

 

आज़मा कर देखिए ये मर मिटेंगे बात पर

हाथ बाँधे जो खड़े हैं सामने हँसकर के लोग।

-धर्मेन्द्र कटियार

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आश्वासन ने बाँट दिये हैं इतने सारे डर यारों ।

मासूमों के हाथों में भी दिखते हैं खंज़र यारों ।

 

पत्थर जमा किये लोगों ने घर की छत के कोनों पर

अच्छे नज़र नहीं आते फिर मौसम के तेवर यारों ।

 

आये हैं कुछ लोग शहर में सद्भावों के फूल लिये

रात कटे तो कटे सुबह ही टूटेंगे कुछ घर यारों ।

 

जब जब वह आया नदिया के पानी ने रंगत बदली

अब तो हमें मसीहा से भी लगता है कुछ डर यारों ।

 

बना लिया है महानगर में जिस दिन से  एसी बंगला

तरस गये हैं मीठे सपनों को खाली बिस्तर यारों ।

 

चलो सरित जी ऐसी कोई जगह तलाशें धरती पर

जहाँ नहीं गिरजा मस्जिद गुरुद्वारा मैदर यारों ।

-सुशील कुमार सक्सेना सरित

  

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आज के हालात का हल ढूँढिए ।

कल के इमकानात का हल ढूँढिए ।

 

सिर्फ हथियारों से होगा कुछ नहीं

बात से ही बात का हल ढूँढिए ।

 

हर हथेली पर उगाइए सूर्य अब

ऐसे काली रात का हल ढूँढिए ।

 

आदमी होकर नहीं है आदमी

आदमी की जात का हल ढूँढिए ।

 

उसको विष पीते हुए हैं युग कई

अब तो उस सुकरात का हल ढूँढिए ।

 

वक्त दिखलाता है ये मंज़र सभी

वक्त की औकात का हल ढूँढिए ।

-गुलशन मदान

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आज संज्ञाएँ हैं आतुर फिर विशेषण के लिए ।

हैं विशेषण को मिले अधिकार शोषण के लिए ।

 

दिक्कतों के नाम गिरवी उम्र ही लिख दी गयी

देह पर अधिकार लकवे का कुपोषण के लिए ।

 

यातनाएँ जो भी सम्भव थीं वो निर्गत हैं मुझे

शेष जो दी जाएँगी ठहरी परीक्षण के लिए ।

 

आपकी हठवादिता की सोच सचमुच मानिए

है बहुत पर्याप्त कविता में प्रदूषण के लिए ।

 

खेद पर प्रतिबंध वर्जित हैं मेरी अभिव्यक्तियाँ

किस तरह तत्पर मिलूँ सारे निरूपण के लिए ।

 

भीड़ का मंदिर सड़क है और मेरा घर भी है

अब नहीं मिलता यहाँ कोई समर्पण के लिए ।

              -परमानंद आनद

 

 

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इस कदर बेहूदगी है आपके दरबार में ।

काटते थे जेब कल वे आज हैं सरकार में ।

 

बेचकर जो मुल्क को अय्याशियाँ करते रहे

कह रहे हैं वे उन्हें घाटा बहुत व्यापार में ।

 

जिस्म का धन्धा चलाकर कोठियों तक आ गये

अब खबर है जी रहे हैं वे किसी के प्यार में ।

 

हिन्दुओं का मुल्क है यह वह मुसलमानों का मुल्क

जो महज़ इंसान हैं जायें कहाँ संसार में।

 

इस कदर आदर्शवादी सोच है उस शख्स का

क्या पता वह कल मिलेगा कौन से किरदार में।

 -विभांशु दिव्याल

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इस कदर विश्वास के कुतरे हवा ने पर।

अब तो अपने आप से लगने लगा है डर।

 

सिर्फ रातों के अँधेरे ही नहीं मुजरिम

अब उजाले भी लिए फिरते यहाँ खंज़र।

 

इस शहर में ढूँढ़ मत सम्वेदना को तू

पत्थरों के हैं मकां, बसते फक़त पत्थर।

 

जब कभी चढ़ने लगूँ आकाश की छत पर

खींच लेते हैं नसैनी, बेरहम रहबर।

 

आपकी गहराइयों में डूबता है कौन

पाँव धोने हैं किनारे पर खड़े आकर।

              -लक्ष्मीनारायण पयोधि

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इस जहाँ से जंग की तब रात काली जायेगी।

भूख से घबरा के क्या बारुद खा ली जायेगी।

 

अम्न की ख़ातिर हर इक से हमने की है दोस्ती

जंग की ख़ातिर न अब ये हमसे पाली जायेगी।

 

अब नया इतिहास लिक्खेंगे हम अपने खून से

हमसे आदत सर झुकाने की न डाली जायेगी।

 

बंद दरवाज़ों में छिप जाएँगे दौलत के उसूल

सबको पीछे छोड़ जब आगे कुदाली जायेगी।

 

एक इंसा के लिये क्या चीज़ है जुल्मो-सितम

इनकी ताकत तो लहू से आजमा ली जायेगी।

 

खेलते-हँसते ये बच्चे हैं ज़माने का भविष्य

इनसे गिरते विश्व की हालात सँभाली जायेगी।

 

हैं खड़ी सच्चाईयाँ लादे हुए अपने सलीब

जाने किस-किस की किशन अर्थी निकाली जायेगी।

                           -किशन तिवारी

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उसने देखीं फिर अपनी फटी साड़ियाँ।

जैसे बनिये को लिक्खी गयी पर्चियाँ।

 

तुमने कैसे कलम से उगाये महल

हम तो पैदा न कर पाये दो रोटियाँ।

 

उसको पहली औ हम एक ही लगते हैं

जैसे कुछ लोगों को लड़कियाँ-झाड़ियाँ।

 

फूल शाखों पर सब कागज़ी हो गये

और बच्चे पकड़ते रहे तितलियाँ ।

 

उसके चेहरे पर चूल्हे की खालिख सा दिन

हाथ से पाँव तक सब धुआँ ही धुआँ ।

-महेश अश्क

 

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उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग।

मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग।

 

गो कि मेरी पास-बुक से भी बड़े थे उनके ख्वाब

फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग।

 

मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है

वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग।

 

पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था कई

फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग।

 

सोच में उसके भरी हैं मेरी लापरवाहियाँ

यों वो सोने जा रही हैं मेरे बिस्तर से अलग।

 

उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना

हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।

 

दोस्तों, हर प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा

सोचना कुछ देर घर को अपने दफ्तर से अलग।

-डॉ. उर्मिलेश

 

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