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सूली पे धर्म चढ़ गया मज़हब हलाल है
यह भी हमारे लोकतंत्र का कमाल है
बाबर थे कौन और कौन
‘रामलला’
है
कलुआ हमारे गाँव का पूछे सवाल है
क्यों जायें मछेरों के डर से छोड़कर इसे
कहती हैं मछलियाँ-‘यही
घर अपना ताल है’
बाज़ों ने जबसे जश्न मनाने की ठान ली
कोटर में कबूतर तभी से तंगहाल है
हर बार मुहब्बत की द्रौपदी को हारकर
कहता है तू
‘आसिफ’
किसी शकुनी की चाल है
-आसिफ रोहतासवी
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राजनीति की गोट हो गये यारो अपने रामलला
सही समझ पर चोट हो गये यारो अपने रामलला
रीति-नीति शुभ ज्ञान कर्म के नायक थे उन्नायक थे
अब तो लुट खसौट हो गये यारो अपने रामलला
सबके सब धंधे में उतरे स्वामी, साधू, संत-महंत
दाम कमाऊ लोट हो गये यारो अपने रामलला
दया नहीं देवत्व नहीं है जिनकी कुटिल कुचालों में
उनके चलते ओट हो गये यारों अपने रामलला
अवसर देख पहन लिया फिर अवसर देख उतार दिया
यहाँ मौसमी कोट हो गये यारो अपने रामलला
पूजा निष्ठा, ध्यान धारणा इनका कोई अर्थ नहीं
लोकतंत्र में वोट हो गये यारो अपने रामलला
-विभांशु दिव्याल
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