रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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राजेश श्रीवास्तव निदा फाज़ली आसिफ रोहतासवी विभांशु दिव्याल

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उजड़ गया सब कुछ शहर अभी बाकी है

दहशत का लेकिन असर अभी बाकी है

 

फिर बेमौत मारा जाएगा ये आदमी

उसूलों की इसमें शरर अभी बाकी है

 

बहुत घूम चुके हैं ये दुनिया तो लेकिन

भीतर का लम्बा सफर अभी बाकी है

 

मन तो कबसे ही चुका है टुकड़ा टुकड़ा

इस तन का मगर खण्डहर अभी बाकी है

 

कैद इसे कर लो या छुपाकर रख दो कहीं

अन्दर का आदमी अगर अभी बाकी है

-राजेश श्रीवास्तव

 

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गरज बरस प्यासी धरती पे फिर पानी दे मौला

चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़धानी दे मौला

 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

 

फिर रौशने कर जहर का प्याला चमका नयी सलीबें

झूठों की दुनिया में सच को लाभ-हानि दे मौला

 

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो

जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला ।

-निदा फाज़ली

 

 

 

 

 

 

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सूली पे धर्म चढ़ गया मज़हब हलाल है

यह भी हमारे लोकतंत्र का कमाल है

 

बाबर थे कौन और कौन रामलला है

कलुआ हमारे गाँव का पूछे सवाल है

 

क्यों जायें मछेरों के डर से छोड़कर इसे

कहती हैं मछलियाँ-यही घर अपना ताल है

 

बाज़ों ने जबसे जश्न मनाने की ठान ली

कोटर में कबूतर तभी से तंगहाल है

 

हर बार मुहब्बत की द्रौपदी को हारकर

कहता है तू आसिफ किसी शकुनी की चाल है

-आसिफ रोहतासवी

 

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राजनीति की गोट  हो गये यारो अपने रामलला

सही समझ पर चोट हो गये यारो अपने रामलला

 

रीति-नीति शुभ ज्ञान कर्म के नायक थे उन्नायक थे

अब तो लुट खसौट हो गये यारो अपने रामलला

 

सबके सब धंधे में उतरे स्वामी, साधू, संत-महंत

दाम कमाऊ लोट हो गये यारो अपने रामलला

 

दया नहीं देवत्व नहीं है जिनकी कुटिल कुचालों में

उनके चलते ओट हो गये यारों अपने रामलला

 

अवसर देख पहन लिया फिर अवसर देख उतार दिया

यहाँ मौसमी कोट हो गये यारो अपने रामलला

 

पूजा निष्ठा, ध्यान धारणा इनका कोई अर्थ नहीं

लोकतंत्र में वोट हो गये यारो अपने रामलला

-विभांशु दिव्याल

 

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