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माह के छंदकारःनिर्मल
शुक्ल |
अब तक रही कुँवारी धूप
जाने किन सुधियों में
गुमसुम
बैठी रही बेचारी धूप ।
रेती, नदियाँ,
बाग, बावड़ी,
बँटकर बारी-बारी धूप ।
रंग महल की दीवारों के
रसवन्ती मृदु मनुहारों के
जाने कितने
संदर्भों में
अब तक रही उधारी धूप ।
हिम से तपती चट्टानों के
पतझर में क्षत-उद्यानों के
जाने कितने
दर्द चुराकर
छुपती रही अटारी धूप ।
अमलतास के आभूषण की
सूर्यमुखी के आकर्षण की
जाने किन
प्रश्नावलियों में
अटक गयी कचनारी धूप ।
प्रकृति चित्र में रंग छोड़कर
धरती से आकाश जोड़कर
जाने किसकी
अभिलाषा में
अब तक रही कुँवारी धूप ।
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केसर के खेत
ऊसर के पाकर संकेत
सूख गये केसर के खेत ।
चिटक गये मेंहदी के पात गात
सेमर के
नवचेतन सहसा अवचेत ।
छिन्न-भिन्न आस बंध
दरक गयी छाती
पल भर में बिखर गयी
सदियों की थाती
केश धुले बहुरंगी चूनर के
बगिया के
श्वेत पुष्प अवयव अवचेत ।
कैसा है क्षार गरल
यह भी न जाना
काल सदृश सूंघ गया
विषधर अनजाना
भग्न हुयी पथिकों की कडिये
आकृतियों की
शेष हुयी वाणी समवेत ।
तलुओं में भूतल
न अम्बर सिरहाने
कैसे दिन रैन कटे
हाय
!
राम जाने
हाथ लगी ऋतुओं के अल्पायु
पवनों के
एकमात्र मरूथल की रेत ।
कैसा सम्भाव्य यहाँ
सारा जग मौन
झुलस रहे अंगों को
सहलाए कौन
बाँध सके निर्जन के जीवन की
मावस की
अव्यवस्थित सुधियां अनिकेत ।
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ज़िंदगी
एक जटिल किंतु सत्य संस्कार ज़िंदगी
विस्तृत आलोक कभी अंधकार ज़िंदगी ।
वर्दी पर टंगे हुये गौरव की छाप
क्षण भंगुर जीवन को मिला हुआ श्राप
भोर की रंगोली का अरुणिम आलाप
अंतस पर करुणा की पड़ती पदचाप
भिक्षा का पात्र कभी पुरस्कार ज़िंदगी ।
रचना के दर्शन का मान असम्मान
एक वरद हस्त स्वयं सर्व शक्तिमान
साधना के चरणों का पूर्ण संविधान
एक आत्मचिंतन या वेद मंत्र ज्ञान
परिभाषित जीवन का सूत्रधार ज़िंदगी ।
बेटी के जीवन की शाश्वत सौगंध
बाबुल के नयनों के असुवन के बंध
फूलों का नेह सिक्त सिंचित मकरंद
पावस के मेघ मधुर चंदन की गंध
मानस पर उभरा सा चित्रहार ज़िंदगी ।
सागर की उच्श्रंखल लहरों का गीत
धरती के घावों पर मरहम सी प्रीत
ऊषा के कलरव का मादक संगीत
आसपास सुधियों का बेसुध अतीत
रक्त तप्त लौह पिंड या तुषार ज़िंदगी ।
माथे की रेखा के गहराते बल
देवालय में अर्पित पुष्पों के दल
लौट सके न जाकर जो बीते कल
विधिना से निर्देशित एक-एक पल
नखशिख श्रृंगार कभी चीत्कार ज़िंदगी ।
दुर्दिन में मिले हुए मित्र के विचार
रंगों में घुला मिला मौन चित्रहार
अभिलाषा मीत गीत मेंहदी मनुहार
मणियों का राजवंश वैभव अधिकार
कभी निराकार कभी साकार ज़िंदगी ।
उंगली के पोरों पर कटे हुए दिन
गरुआते यौवन में उलझे पलछिन
चुनरी के धब्बे ये बीथियों मलिन
मरुथल के तप्त दिवस पानी के बिन
अर्थी या डोली काँधे कहार
ज़िंदगी ।
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मौन साथे रात
हो गई ओझल
बिचारी
मौन साधे रात ।
संस्कारों में
उलझकर
गर्त की
मोटी परिधि में
हिमगिरों अथवा
जलधि में
खोजती अभिप्राय
अपने
हाथ बाँधे रात ।
फिर उसी एकांत
पथ पर
चाँदनी से
मेघ से
सौदामिनी से
मांगती क्षत
जीवनी के
पृष्ठ आधे रात ।
मूक निश्पृह
रीतियों में
आदि से
अंतिम प्रहर तक
काल के गह्वर
विवर तक
खींचती श्लथ
देह का निज
बोझ काँधे रात ।
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मौलसिरी के मन
वे पल जाने क्या कह जाते
अस्फुट स्वर
अनुभूति शब्द में
अवलंबित होकर रह जाते ।
सुधियों के
दिन रैन बटोरे
अपलक रहते
नयन कटोरे
गहन अमावस
भरे अंक में
व्यथित आयाचित घन बह जाते ।
भाल सजाने कुंकुम, चंदन
सन्ध्या का संयत अभिनन्दन
दिवस समेटे मन आँगन के
तरल चित्र हर दुःख सह जाते ।
कभी प्रतीकों के प्रयोग से
कभी असीमित मनोयोग से
उन पलाश में
मौलसिरी के
मुकुलित मन बहुधा दह जाते ।
बृहत कल्पना के छोरों में
उलझे रहे क्षितिज कोरों में
अनगिन अपवादों के
पौरुष
निमिष मात्र में ही ढह जाते ।
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संपर्क - संपादक, उत्तरायण, सेक्टर एम-168,
आशियाना कॉलोनी, लखनऊ, उत्तरप्रदेश, 226012
