गीतकारः
लावणया शाह
।
सचिन शर्मा
बीती रात का सपना
बीती रात का सपना,
छिपा ही रह जाये,
तो
वो,
सपना,
सपना नहीं रहता है!
पायलिया के घूँघरू,
ना बाजें तो,
फिर,पायल
पायल कहाँ रहती है?
बिन पंखों की उडान आखिरी हद तक,
साँस रोक
कर देखे वो दिवा- स्वप्न भी,
पल भर में लगाये पाँख,
पँखेरु से उड,
ना जाने
कब,
ओझल
हो जाते हैँ !
मन का क्या है
?
सारा आकाश कम है
भावों
का उठना,
हर लहर लहर पर,
शशि की तम पर पडती,
आभा है !
रुपहली रातों में खिलतीं कलियाँ
जो,
भाव विभोर,
स्निग्धता लिये उर में,
कोमल किसलय के आलिंगन को,
रोक सहज
निज प्रणयन उन्मन से
वीत राग उषा का लिये सजातीं
,
पल पल में,
खिलतीं उपवन
में !
मैं,
मन के नयनों से उन्हेँ देखती,
राग
अहीरों के सुनती,
मधुवन में,
वन ज्योत्सना,
मनोकामिनी बनी,
गहराते सँवेदन,
उर,
प्रतिक्षण में !
सुर राग ताल लय के बँधन जो,
फैल रहे
हैं,
चार याम,ज्योति
कण से,
फिर उठा सुराही पात्र,
पिलाये हाला,
कोई आकर,
सूने जीवन पथ में !
यह अमृत धार बहे,
रसधार,
यूँ
ही,
कहती मैं, यह
जग जादू घर है !
रात दिवा के द्युति-मण्डल की,
यह
अक्षुण्ण अमित सीमा रेखा है
0 लावण्य
शाह
5751,
Kugler Mill Rd # C,
Cincinnati, OH 45236,
U.S.A.
जब से तुम मनमीत बने हो,
जब से तुम मनमीत बने हो,
कोकिला का कंपित स्वर ही
बजने लगा है अंतर्मन में,
निर्झर की झर झर वाणी ने
स्वर बसा दिये इस निर्जन में,
कोमल हृदय के कण कण में
तुम मेरे संगीत बने हो।
जब से तुम ..................
पल पल प्रतिपल,
दिक् दिक् प्रतिदिक्,
नयन निर्मिमेष तुम्हे निहारते,
झंकृत तारों के स्वर भी,
तेरा नाम ही सदा पुकारते,
अंग अंग की भाषा तुम हो
तुम मन की ही प्रीत बने हो ।
जब से तुम मनमीत बने हो,....
सचिन
शर्मा
ए-94,
स्वास्थ्य विहार,
विकास
मार्ग,
प्रीत
विहार के पास,
नई
दिल्ली-
92
