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जाति न पूछो साध की

प्रकाशन :शनिवार, 1 मई 2010
सुभाष राय

जाति न पूछो साध की। यह इसी देश की परंपरा रही है। हमारे पूर्वजों ने बार-बार कहा है कि जाति का कोई मतलब नहीं है, यह बेमानी है। भगवान ने कोई जाति नहीं बनाई। उसने सिर्फ़ आदमी बनाया। उसे बाँटा नहीं। उसे अलग-अलग दीवारों में कैद नहीं किया। आदमी-आदमी में कोई भेद नहीं किया। वह समदर्शी यूँ ही थोड़े कहा गया है। पर आदमी ने उसकी मंशा नहीं समझी। उसने तमाम लकीरें खींच डालीं। जातियों की, सम्प्रदायों की, ऊँच-नीच की,ग़रीब-अमीर की। सबने अपनी-अपनी हदें बना लीं, इतनी मुकम्मल और सख़्त कि कोई दूसरा उनके घेरे में दाख़िल न हो सके, घेरे के पास तक न फटक सके।

इससे भारतीय समाज में अनेक तरह की समस्याएँ पैदा हुईं। जो नीच समझे गए, उनका तिरस्कार किया गया, उनका शोषण किया गया, उन्हें उनके वाजिब हक़ से महरूम किया गया। प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। इतिहास में ऐसे तमाम वाकये दर्ज हैं, जब जातिगत संघर्ष हुए, जो पराभूत हुआ, उस पर ज़बरदस्त अत्याचार किये गए। सांप्रदायिक संघर्ष का तो इस देश में लम्बा ख़ूनी इतिहास रहा है। जब भारत सामंतों और राजाओं द्वारा शासित था, तब भी राज-काज को जाति और संप्रदाय की मानसिकता से ही संचालित होते देखा गया।

हमारी वैदिक व्यवस्था के अनुदार हो जाने के बाद समाज में कर्म के आधार पर बनते वर्गों में जो निचले पायदान पर खड़े थे, उन पर ज़ुल्म की इंतिहा हो गयी। उन्हें पूजा नहीं करने दी जाती थी, उन्हें मंदिरों में घुसने की इज़ाज़त नहीं थी, उन्हें धार्मिक पुस्तकें छूने की अनुमति नहीं थी। इस जर्जर सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ संतों ने ज़िहाद छेड़ा। जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई या जाति हमारी जगतगुरु जैसी आवाजें तभी उठीं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक भक्ति आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा। संत नामदेव से लेकर रविदास, कबीर, दादू दयाल, पीपा, सेन, शेख फ़रीद, रज्जब, ग़रीबदास जैसे तमाम संत कवियों ने जाति, वर्ग और संप्रदाय को लेकर समाज में फैले भेदभाव पर तीखा हमला बोला। अपने-अपने समय में इन सबने टूटते-बिखरते समाज को एक नए सूत्र से बांधने का काम किया।

आप ध्यान से देखें तो इस आन्दोलन को स्वर और गति देने वाले अधिकांश कवि निम्न वर्ग से आये थे। उन्होंने ख़ुद अपनी आँखों से तथाकथित उच्च, कुलीन वर्ग का अत्याचार देखा था, वे निचली जातियों के लोगों पर होने बाले ज़ुल्म से दो-चार हुए थे। वे इस सामाजिक विसंगति से चिंतित थे, इस अनुदारता से विचलित थे। वे समाज में सबको बराबर की हैसियत दिए जाने के पक्षधर थे। वे मनुष्यता की प्रतिष्ठा चाहते थे। इस परिवर्तन की कामना से संचालित होकर वे अपनी पूरी ताक़त से निकल पड़े। जिस भगवान का नाम लेकर उत्पीडन और ज़ुल्म का क़ारोबार चल रहा था, उसी भगवान के हवाले से उन्होंने उसका प्रबल विरोध भी किया। जिन धार्मिक किताबों की आड़ में कुलीन वर्ग अपनी सत्ता क़ायम रखने की कोशिश में जुटा था, उन किताबों को भक्त कवियों ने ठुकरा दिया। तुम कहते हो कागज लेखी, मैं कहता हूँ आँखिन देखी या वेद –कतेब नहीं कछु जाने।

दरअसल उच्च जातियों की प्रभुता के जो मूलाधार थे, उन सबको संतों ने सिरे से ख़ारिज़ कर दिया। यहाँ तक कि उन्होंने भगवान को भी बाहर की दुनिया से भीतर घसीट लिया। उन्होंने कहा कि भगवान हर आदमी के ह्रदय में है और अगर तुम आदमी को सम्मान नहीं देते तो भगवान को भी सम्मान नहीं देते। यह इसलिए जरूरी हो गया था कि मंदिर, मस्ज़िद ईश्वर के नाम पर धार्मिक पाखंड के केंद्र बने हुए थे और उन पर भी उन्हीं लोगों का कब्ज़ा था, जो समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटकर रखना चाहते थे ताकि उनका शोषण जारी रहे। असल में भक्तों ने उसी धारा को और आगे बढाया, जिसके बीज नाथों और सिद्धों ने डाले थे। सहज जीवन की स्वीकृति में सामाजिक विषमताओं के उन्मूलन का स्वर देखा जा सकता है। यह बात बौद्धों में भी थी। जाति की अनावश्यकता के प्रतिपादन के कारण ही बौद्ध धर्म की ओर भी उपेक्षितों का भारी आकर्षण दिखाई पड़ा था।

धीरे-धीरे सामंती व्यवस्था के विनाश और राजतंत्रात्मक प्रभुसत्ताओं के पराभव के कारण जाति और संप्रदाय की कठोर दीवारों में कुछ सुराख़ हुए। अँगरेज़ों के ख़िलाफ़ स्वाधीनता आंदोलन ने इस संकीर्णता को और कमज़ोर किया। लोग देश की मुक्ति की कामना से आगे आये तो कभी किसी वे उनकी जाति, उनका धर्म, उनका संप्रदाय नहीं पूछा। देशभक्तों की कोई जाति नहीं होती, कोई संप्रदाय नहीं होता। इसी ऐक्य भाव ने हमें ताक़त दी, इसी ने हमें ऐसी सत्ता से टकराने का साहस दिया, जिसके राज में सूरज डूबता ही नहीं था। और इसी ज़ज़्बे और हौसले के कारण हम विजयी भी हुए, ब्रितानी पराभूत हुए, भारत आज़ाद हुआ।

लेकिन हम आज़ाद होकर भी आज़ाद नहीं हो सके। राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली पर इतने वर्षों बाद भी हमारा भारत सामाजिक और आर्थिक आज़ादी के लिए तड़प रहा है। यहाँ मनुष्य फिर ख़तरे में है। हम एक कमज़ोर देश के रूप में सबके सामने हैं, एक लंगड़ाते गणतंत्र के रूप में प्रस्तुत हैं। न अपनी भाषा पर गर्व करने लायक बन सके, न धर्म निरपेक्ष बन सके, न जाति निरपेक्ष। हम भूल गये भारतेंदु का आप्त वाक्य, निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल। आज भी हिंदी को जो जगह मिलनी चाहिए थी, नहीं मिल सकी। जाति, संप्रदाय की दीवारें और मज़बूत, और कठोर हुईं हैं। देश के राजनेताओं ने इन बँटवारों को बनाये रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जब भी ग़रीब की बात हुई तो जातियों की बात हुई, जब भी समता, समानता की बात हुई तब हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई की बात हुई। निरपेक्षता का मतलब सांप्रदायिक पक्षधरता से अलग नहीं रह सका। इसीलिए इस देश ने आज़ादी के बाद जाति, संप्रदाय के नाम पर कई बड़े दंगे देखे, भयावह क़त्लेआम का सामना किया।

अब भी किसी को होश नहीं है। राजनीति से तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि बग़ैर जाति, संप्रदाय के उसका रथ आगे बढ़ता ही नहीं। वे अभी तक जाति, संप्रदाय के नाम पर लोगों को लड़ाते आये हैं, अब इन्हीं आधारों पर जनगणना करके अपनी विध्वंसक ताक़त का ज़ायज़ा भी लेना चाहते हैं। सभी अनुभव करते हैं कि अब कुछ होना चाहिए। समाज के भीतर का गुस्सा, उसकी पीड़ा, उसकी निरुपायता जब संगठित होकर खड़ी होगी, तभी भारतीयता की प्रतिष्ठा का रास्ता साफ़ होगा, तभी हर भारतीय केवल मनुष्य की तरह स्थापित होगा। और तभी हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मन, शुद्र होकर भी लोग इन खोलों के बाहर होंगे।

यह सच है कि परिवर्तन की इस दिशा में अलग-अलग बिना एक-दूसरे को जाने हुए देश के कोने-कोने में लोग सक्रिय हैं। उन सबकी आवाज़ समवेत होकर उभरे, इसके लिए एक विराट सम्मोहक ऐक्य सूत्र की ज़रूरत है। वह मैं भी हो सकता हूँ, आप भी और कोई और भी।


  सुभाष राय
ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड,
आगरा (यूपी)
मो.- 9927500541
raisubhash953@gmail.com
 
         
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