'' मैं आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा /
कि स्त्री दिखाई ही न दे /
इसलिए मैं उन लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता /
कि वे किस तरह सोचते हैं जो ईश्वर के साथ रहते हैं /
वैसे मेरी आत्मा आकाश में बहुत ऊँचे तक उड़ी है /
पर डोर हमेशा किसी स्त्री के हाथ में रही /
और सब जानते हैं कि औरत ज्यादह ढील नहीं देती ''
स्त्री के महानता को तो संसार भर के कलाकारों ने तव्जीह देते हुए उसे खुदा के आसपास की चीज़ माना है। पर धरती के ढोस पटल पर देखें तो जो हकीकत सामने आती है वह इस रूप में है कि विकासशील देशों में 60 और 80 प्रतिशत तक के भोजन का उत्पादन महिलाये ही करती हैं।और महिलायें ही विश्व खाद्य उत्पादन के आधे भोजन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं, खाद्य उत्पादकों और प्रदाताओं, और घर की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान, के रूप में उनकी भूमिका अति महतवपूर्ण है। इस स्वीकारोक्ती के बावजूद महिला अपने ही घर में भोजन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है।
दिसम्बर 2011 में लोक सभा में उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री के।वी। थामस ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक लोकसभा में पेश किया । जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बिना किसी बहस के पास कर दिया।
गौरतलब है की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक, जिसके कई उद्देशयों में से एक है देश की 60 प्रतिशित से अधिक जनसंख्या को रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध करवाना। इस विधयेक को रोजगार गारंटी योजना के बाद यूपीए के सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के रूप में पेश किया जा रहा है।
इस खाद्य सुरक्षा विधेयक के दूसरे तत्वाधान में कम उम्र की सभी गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए 6,000 रुपये और 14 साल के बच्चों के लिए गर्म, मध्यान्ह भोजन का वादा किया है। माना यह भी जा रहा है कि अन्न का उत्पादन और इसकी बर्बादी को रोकने की गारंटी इस बिल में समाहित है पर खेद की बात है की हमारे देश में कानून और नीतियां शानदार ढंग से बनाई जाती है और उसी शानदार ढंग से पेश भी की जाती रही है। पर उसके अच्छे परिणामों की आस में आम जनता इंतज़ार ही करती रह जाती है।
देसी स्थिति
भारत सहित सभी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक कार्य बल के रूप में महिलाएं ही सामने आती हैं। कृषि, जो भारत में एकल उत्पादन का सबसे बड़ा प्रयास है, और जिसमे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 18% योगदान है, वही कृषि का रोजगार तेजी से महिला केंद्रित गतिविधि बनता जा रहा है। भारत देश के कृषि क्षेत्र में आर्थिक रूप से 4/5th सक्रिय महिलाये कार्यरत हैं। भारत में 48% महिलाएं स्वरोजगार किसान हैं। और डेयरी उद्योग में 75 मिलियन महिलाये 15 मिलियन पुरुषों की तुलना में काम कर रही हैं जबकि 1.5 लाख पुरुषों की तुलना में 20 लाख महिलाये काम कर रही हैं। इसके बावजूद महिलाओं को ध्यान में रख कर बनाने वाली योजनाओं का सदा से आभाव रहा हैं।अंतरराष्ट्रीय पैमाने
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) द्वारा आयोजित अनुसंधान यह पुष्टि करते हैं की भोजन के उत्पादन में केंद्रीय भूमिका महिलाओं की है। प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करना, उनसे अपनी आय अर्जित करना, और घरेलू खाद्य और पोषण सुरक्षा की देख रेख में महिलाओं के भूमिका अग्रणी है।
1975 में मक्सिको में अंतर्राष्ट्रीय पहल और प्रयासों से महिलाओं का विश्व सम्मलेन आयोजित किया गया महिलाओं के विकास में योगदान और ग्रामीण और अन्य इलाकों में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी को बड़ी मान्यता के रूप के स्थापित किया गया।
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में आयोजित शोधों में यह पाया गया कि घरेलू खाद्य सुरक्षा और पोषण में सुधार महिलाओं की आय और व्यय पर घरेलू फैसलों में माहिलाओं की भूमिका से जुडी हुई हैं।इसी तरह से पाकिस्तान में एक संगोष्ठी आयोजित की गई जिस का शीर्षक था। टूगेदर अगेंस्ट हंगर; जिसमे भूमि अधिकार के माध्यम से महिलाओं को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने पर जोर दिया गया था। इस संगोष्ठी में महिलाओं ने बढ़-चढ कर भाग लिया।
पुरुषों के साथ सहभागिता
खाद्य की परियोजनाओं के कुशल रूप में लागू करने के लिए दोनों पुरुषों और महिलाओं की आपसी सहभागिता भी अति महतवपूर्ण है। पिछले 15 वर्षों से अनुभव बताते हैं कि संवेदनशील परियोजनाओं में महिलाओं की जरूरतों को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है की पुरुष और स्त्री दोनों को ध्यान में रख कर योजनाये बनाई जाये इससे दोनों पक्षों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। उनकी उत्पादकता और आय बढ़ाने के द्वारा महिलाओं को लाभ उन पुरुषों के बगल में। विश्व बैंक की 271 परियोजनाओं की समीक्षा के द्वारा यह पता चला है कि जब किसी परियोजना में दोनों, यानि स्त्री और पुरुषों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता है तो उस परियोजना में महिलाओं की स्थिरता के 16 प्रतिशत बढ़ जाती है। इसी कारण परियोजना योजनाकारों और नीति निर्माताओं के लिए दोनों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। महिलाओं की मदद के केंद्रीय सवाल को हल करने में पुरुषों और महिलाओं दोनों के आपसी सामंजस्य से अधिक प्रभावी परियोजनाओं को तैयार किया जा सकता है। कृषि, खाद्य और पोषण कार्यक्रमों के निर्धारण में गति तभी आ सकती है जब में पैसों का स्थानान्तरण सीधा महिलाओं के हाथ में होगा।


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