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गाँधी जी छत्तीसगढ़
में |
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सुधीर सक्सेना |
गांधी जी
रायपुर और धमतरी में (1920)
महात्मा गाँधी
की इन्दौर यात्रा एक तरह से सांस्कृतिक उपक्रम थी । इस
यात्रा से बापू के सांस्कृतिक सरोकारों का पता चलता है ।
सन् 1920 में दूरगामी महत्व की दृष्टि से कई घटनाएँ घटीं ।
यह वह समय है, जब देश गाँधी युग की दहलीज़ पर था । इस वर्ष
कलकत्ते में सितम्बर में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ और
फिर दिसम्बर में
नागपुर में नियमित अधिवेशन ।
वर्षान्त में
नागपुर में हुआ अधिवेशन कांग्रेस से इतिहास में मील का
पत्थर साबित हुआ और भारत की राजनीति में गाँधी युग के
प्रारम्भ का
द्योतक । गाँधी जी के राजनीतिक विचार लोगों को तेजी से
आकर्षित कर रहे थे । अपनी यात्राओं, भाषणों लेखों और
फैसलों से उन्होंने सम्पूर्ण भारत की चेतना को झकझोर
दिया था । निष्चेष्ट आबाल वृद्ध उठ खड़े हुए थे । कांग्रेस
के दो ऐतिहासिक अधिवेशनों
के मध्यवर्ती अन्तराल में छत्तीसगढ़ अंचल को बापू के
देखने, सुनने और गुनने का श्रेय प्राप्त हुआ ।
छत्तीसगढ़-वासियों ने पलक पाँवड़े बिछाकर निष्ठा और
उमंग के साथ बापू की आगवानी की । बापू की मध्यप्रदेश की
गणनाक्रम में द्वितीय, किंतु सामाजार्थिक और राजनीतिक
दृष्टि से प्रथम यात्रा के निमित्त बने कर्मयोगी
पंडित सुन्दरलाल शर्मा ।
पं. सुन्दरलाल
शर्मा(छत्तीसगढ़ के गाँधी)
छत्तीसगढ़ी गाँधी के रूप में चर्चित पं. सुन्दरलाल शर्मा
का जन्म सन् 1883 में राजिम में हुआ था । उनके पिता
जियालाल कांकेर रियासत में वकील थे । राजिम की पाठशाला में
प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा के बाद उन्होंने संस्कृत,
हिन्दी, उर्दू, बंगला, मराठी और उड़िया का गहन स्वाध्याय
किया । बंग साहित्य में उनकी गहरी अभरूचि थी और वे
धाराप्रवाह बंगला बोलते थे। वे बचपन से ही हठी और विद्रोही
थे। बचपन में घर में उनके अनशन का प्रतिफल यह हुआ कि मांस
राँधना और खाना बन्द हो गया। पं. सुन्दरलाल को छत्तीसगढ़ी
पद्य का प्रवर्तक माना जाता है। बहुचर्चित एवं अत्यन्त
लोकप्रिय काव्य-कृति
“छत्तीसगढ़ी
दानलीला”
के अलावा उन्होंने 19 काव्य, नाटक, कथा एवं उपन्यास
कृतियों की रचना की । उनके नाटक रंगमंच पर खेले गये और
बहुत लोकप्रिय हुए। रायबहादुर डॉ. हीरालाल और माधवराव
सप्रे, जगन्नाथ प्रसाद भानु, ग.नं. गद्रे, स्वामी सत्यदेव
परिव्राजक आदि से पण्डित सुन्दरलाल आदि के घनिष्ठ मैत्री
सम्बन्ध थे। सन् 1905 में बंग भंग ने उनके भीतर सुषुप्त
राजनीतिक चेतना को जागृत कर दिया । सन् 1906 में वे
कांग्रेस के सूरत अधिविशन में शरीक क्या हुए, चिंगारी भड़क
उठी । तदन्तर उन्होने कलकत्ता, बम्बई, जयपुर, काकीनाड़ा
आदि अधिवेशनों में भाग लिया । उन्होंने अपने भाषणों से
समूचे अंचल में आजादी की अलख जगायी । उनके कांग्रेस के
प्रति अनुराग का आभास इससे मिलता है कि उन्होंने नारायण
राव मेघावाले के साथ काकीनाड़ा तक की 700 कि.मी. की यात्रा
पैदल की थी।
पं. सुन्दरलाल
शर्मा कई बार जेल गये । सन् 1917 में उन्होंने नगरी सिहावा
के आदिवासियों के साथ जंगल कानून तोड़ा । सन् 1924 में वे
झण्डा सत्याग्रह में भाग लिवाने के लिए इन आदिवासियों को
नागपुर ले गये । कारावास में उन्हें प्रताड़ित किया गया ।
इन्हीं दिनों उन्होंने अछूतोद्धार व समता का बीड़ा उठाया
और हरिजनों-सतनामियों को जनेऊ बाँटे । राजिम के राजीव लोचन
मंदिर में निम्न जातियों के प्रवेश की लड़ाई का उन्होंने
नेतत्व किया तथा लोगों को अनाथालय, सतनामी कन्याशाला,
हरिजन होस्टल आदि की स्थापना करने को प्रेरित किया। झिरिया
और खड़गपुर जाकर उन्होंने प्रवासी छत्तीसगढ़ी मजदूरों का
संघ सन् 1917 में ही स्थापित कर दिया था।
पं. सुन्दरलाल शर्मा सही मायनों में छत्तीसगढ़ के सिंह
सेनापति थे। जुलाई, सन् 1920 में उन्होंने दुर्ग जिले में
कण्डेल नामक ग्राम में नारायण राव मेघावाले, नत्थूजी जगताप
और छोटेलाल श्रीवास्तव के साथ नगर सत्याग्रह का नेतृत्व
किया। देश में यह पहला सत्याग्रह और असहयोग से तीन
यात्राएँ की । वे लाहौर, काशी, पटना और कलकत्ते जाकर
गाँधीजी से मिले। अन्ततः उनके आमंत्रण पर गाँधीजी रायपुर
आये। अपने भाषण में गाँधीजी ने रहा -
“मैंने
सुना था कि छत्तीसगढ़ पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। पर यहाँ आने
पर पता चला कि यह गलत है। यहाँ तो मुझसे भी अधिक विचारवान
और दूरदर्शी लोग रहते हैं। उदाहरण के लिए पं. सुन्दरलाल
शर्मा को ही लीजिए, जो मेरे साथ बैठे हैं । उन्होंने मुझसे
बहुत बहले ही हरिजान उद्धार कार्य शुरु कर दिया है। इस
नाते वे मेरे गुरु हैं।”
छत्तीसगढ़ के
इस गाँधी का देहान्त सन् 1940 में हुआ।
कण्डेल नहर
सत्याग्रह :असहयोग का दृष्टान्त
प्राचीन दक्षिण कोशल और वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रारम्भ से
राजनीतिक हलचलों का केन्द्र रहा । देश में गाँधीयुग का
सूत्रपात बाद की बात है। छत्तीसगढ़ में असहयोग और
सत्याग्रह पर आधारित आंदोलन और भी पहले हो चुके थे। सन्
1920 में ही राजनांदगाँव में मिल मजदूरों के आन्दोलन का
बिगुल फूँका गया था। यह आन्दोलन सत्याग्रह सिद्धान्तों पर
चला। तदन्तर नहर सत्याग्रह की पृष्ठभूमि में बापू रायपुर
ओर धमतरी आये। धमतरी में महानदी के तट पर रूद्री एवं
माडंमसिल्ली बाँध बनाये गये हैं। अंगरेज़ी हुकूमत के समय
रूद्री से एक नहर निकाली गयी थी जो आज भी विद्यमान है। इस
नहर से आसपास के गाँवों में सिंचाई की जाती थी। कण्डेल एक
छोटा सा गाँव है, जो इसी नहर क्षेत्र में आता है। अंगरेज़ी
शासन इस नहर द्वारा सिंचाई करने पर
“नहर
कर
”
लेता था । जो गाँव इससे सिंचाई चाहते थे, उन्हें दस वर्ष
का अनुबन्ध करना पड़ता था और इतने वर्षों के लिए जो कर
देना पड़ता था वह इतना अधिक होता था कि वह गाँव चाहे तो
उससे एक विशाल तालाब बनवाकर अपनी सिंचाई की जरूरत पूरी कर
सकता था। अतः शासकीय अनुबन्धों की संख्या नगण्य हो रही थी।
कण्डेल गाँव के मालगुजार थे बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, जो
उत्कट देशभक्त थे। अंग्रेज चाहते थे कि बाबू छोटेलाल का
मनोबल कमजोर करके उन्हें देशभक्ति से विरत करें और
ग्रामवासियों को अनुबन्ध करने पर मजबूर करें। अतः एक
षडयंत्र की रूप-रेखा तैयार की गई कि नहर का पानी कण्डेल
ग्राम में बहा दिया जाये और वह भी इसी प्रकार सभी खेतों
में सिंचाई हो जाये। इससे गाँव की जनता पर नहर से पानी
चोरी का अभियोग लगाकर अनुबन्ध हेतु उन्हें मजबूर किया जा
सकेगा तथा छोटेलाल बाबू पर आरोप लगाकर अंग्रेज-भक्ति हेतु
दबाव डाला जा सकेगा।
इसी षड़यंत्र
के अन्तर्गत 1920 के अगस्त माह में पानी बहा दिया गया
किन्तु ईश्वर भी सच्चाई के साथ था। अतः जिस दिन पानी बहाया
गया उसी रात्रि में पूरे कण्डेल क्षेत्र में मूसलाधार
बारिश हुई एवं खेत प्राकृतिक रूप से जलाप्लावित हो गये एवं
किसान पर ऐसी स्थिति में पानी चोरी करने का प्रश्न ही नहीं
उठ सकता था । किन्तु अंग्रेजी शासन को तो देशभक्तों को
देशप्रम से विरत करने की अपनी योजना पूरी करनी थी, अतः उन
किसानों पर पानी चोरी का आरोप लगा दिया और ग्रामवासियों ने
सत्याग्रह किया। शासन ने ग्रामवासियों की सच्चाई पर ध्यान
न देते हुए चार हजार तीन सौ तीन रुपये जुर्माना लगा दिया
एवं इसकी वसूली हेतु कुर्की वारंट जारी किये गये। बाबू
छोटेलाल श्रीवास्तव ने गाँव के साथ इस झूठे आरोपों का
विरोध करते हुए खण्डन किया।
अंग्रेजों के इन कार्यों से पूरी धमतरी तहसील में असन्तोष
एवं रोष का वातावरण बन गया एवं सत्याग्रह द्वारा शासन का
विरोध किया गया । पहली दिसम्बर 1920 को धमतरी तहसील के
प्रमुख नेताओं एवं देशभक्त ग्रामवासियों की एक सभा कण्डेल
में हुई। इस सभा को सम्बोधित करते हुए पं.सुन्दरलाल शर्मा,
नारायणराव मेघावाले और बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव ने जनता को
अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से अवगत कराते हुए विरोध करने
का आह्वान किया। इस सभा में यह भी तय किया गया कि कण्डेल
ग्राम में नहर के पानी की चोरी का झूठा आरोप लगाकर जो
जुर्माना जबरदस्ती वसूल किया जा रहा है, गाँव में जो
अत्याचार किये जा रहे हैं, इन सबका विरोध अखिल भारतीय
कांग्रेस द्वारा चलाये जा रहे सत्याग्रह के अन्तर्गत किया
जाये और इस आधार पर जबरदस्ती वसूल की जाने वाली नहर-कर की
झूठी
धनराशि कोई भी ग्रामीण शासन को न दे । अतः इस फैसले के बाद
किसी ने वह राशि नहीं दी।
जब अंग्रेजों ने देखा कि उनकी योजना कारगर नहीं हो रही है
और कोई भी राशि नहीं दे रहा है तो उन्हें भयभीत करने के
लिए उन्होंने अपना दमन-चक्र दूसरी दिशा में मोड़ा और गाँव
वालों के सभी पशुओं, जिसमें कृषि में उपयोगी पशु भी शामिल
थे, को कुर्क कर दिया और योजना बनाई कि इन पशुओं को नीलाम
कर दिया जाये तथा इससे जो धन प्राप्त होगा उसे नहर-कर के
रूप में वसूला जाये। इस नई योजना के अनुसार कुर्क किये गये
पशुओं अंग्रेजी शासन ने धमतरी नगर के इतवारी बाज़ार में,
जो आज भी सप्ताह में हर रविवार के दिन लगता है, वहाँ ले
जाकर नीलाम हेतु इकट्ठा किया। पूरी तहसील अंग्रेजों के इस
गलत कार्य से रोष में थी। लोगों में इस समय तक देशभक्ति और
राष्ट्रीय चेतना उदित हो चुकी थी । इसका सबल प्रमाण मिला
इस बाज़ार में। क्योंकि नीलामी में बोली बोलने एक व्यक्ति
नहीं आया । पूरा धमतरी नगर देशप्रेम की जागृति की अनूठी
मिसाल बन गया था। अंग्रेजों को इससे बुरी तरह निराशा तो
हुई किंतु अभी तक उनकी हिम्मत नहीं टूटी थी, उन्होंने अब
सोचा कि इन पशुओं की नीलामी तहसील के आसपास के गाँवों में
की जाये । अतः ये पशु नीलामी हेतु विभिन्न गाँवों में
पहुँचाये गये । इसी बीच धमतरी से सताये गये गाँववासी भी
इन्हीं गाँवों में पहुँचे और अंग्रेजों के अत्याचारों की
जानकारी उन गाँवों में दी और प्रार्थना की कि नीलामी में
बोली न लगाएं । परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों के तरकश का यह
तीर भी खाली गया और पूरी तहसील के किसी भी गाँव में कोई भी
ग्रामीण बोली लगाने आगे नहीं आया । धन्य है धमतरी के
देशभक्त एवं उनकी एकता । अब अंग्रेजों के बौखलाने की बारी
थी । हर प्रकार से हताश होने पर उन्होंने दमन चक्र कठोर कर
दिया तथा कण्डेल के मालगुजार बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव और
उनके चचेरे भाई बालाजी बाबू तथा प्रमुख किसानों को बन्दी
बना लिया और बाकी ग्रामीणों को विभिन्न तरीकों से कष्ट
देकर उनका मनोबल तोड़कर अपनी नीति के अनुकूल बनाने की
योजना शुरू की। किन्तु ग्रामीणों ने भी देशप्रेम की खातिर
सारे कष्ट सहे और अंग्रेजों के हर जुल्म का मुकाबला
बहादुरी से करते रहे । अतः तहसील के प्रमुख नेताओं में पं.
सुन्दरलाल शर्मा दिस्म्बर 1920 में इस सत्याग्रह की
वस्तुस्थिति की पूर्ण जानकारी देकर आन्दोलन की बागडोर
गाँधी जी को सौंपने हेतु कलकत्ता रवाना हुए।
रायपुर में
महात्मा
अन्ततः 20 दिसम्बर को पं. सुन्दरलाल शर्मा के साथ महात्मा
गाँधी अपनी प्रथम छत्तीसगढ़ यात्रा पर रायपुर आये । उनके
साथ ख्यात अली बंधु मौलाना शौक़त अली भी थे। इस समय तक
गाँधीजी को बड़ी लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी थी और रायपुर
की जनता ने बड़े उत्साह से उनका स्वागत किया । उनके
दर्शनार्थ भारी जन समूह एकत्र हुआ और रायपुर में आज जो
गाँधी चौक है, उस स्थान पर एक विशाल सार्वजनिक सभा में
उनका भाषाण हुआ। गाँधीजी द्वारा सम्बोधित इस सार्वजनिक सभा
के बाद ही इस स्थान का नाम गाँधी चौक पड़ गया और तभी से यह
न केवल रायपुर, वरन् समूचे छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक
गतिविधियों का केन्द्र बन गया। गाँधी जी के नेतृत्व में
चलने वाले दो दशक से भी अधिक के राष्ट्रीय संग्राम का
संचालन इसी स्थान से हुआ। अनेक भाषणों, गिरफ्तारियों का यह
केन्द्र रहा । इस समय गाँधी जी ने अपने भाषण में असहयोग के
महत्व पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक
भारतवासी स्वतन्त्रता के लिये सर्वत्र न्यौछावर करने को
तैयार रहे तो स्वराज्य का लक्ष्य बहुत दूर नहीं रह सकता ।
धमतरी और कुरूद
में
रायपुर से गाँधी जी खुली मोटर कार द्वारा धमतरी और कुरूद
गये। रास्तें में पडने वाले सभी गाँवों में विशाल जनसमूह
ने उनका स्वागत किया और महात्मा गाँधी की जय और भारत माता
की जय के नारे वातावरण में गूँज उठे। चौक, छतों, और छज्जों
पर भारी भीड़ जमा थी।
धमतरी पहुँचने
पर मकई चौक पर गाँधी जी का बड़े उत्साह से स्वागत हुआ।
कण्डेल सत्याग्रह अब तक समाप्त हो चुका था और धमतरी की
जनता विजयी सत्याग्रही के समान सत्याग्रह-आन्दोलन के
जन्मदाता का स्वागत कर रही थी। उनके भाषण का प्रबंध जामू
हुसैन के बाड़े में किया गया था। सभा स्थल के प्रवेश द्वार
पर भीड़ इतनी अधिक थी कि गाँधीजी का उसमें प्रवेश करना ही
कठिन था। सभा स्थल तक ले जाने के लिये तब गुरूर के श्री
उमर सेठ नामक एक कच्छी व्यापारी ने उन्हें कंधे पर बिठाया
और उन्हें मंच तक ले गया। जो मंच गाँधी जी के बैठने के लिए
बनाया गया था वह अति सुन्दर तोरण पताकाओं तथा नेताओं के
चित्रों से सुसज्जित था। सर्वप्रथम श्री बाजीराव कृदत्त ने
नगर तथा ग्रामवासियों की ओर से गाँधीजी को 501 रुपये की
थैली भेंट । लगभग 15 हजार लोगों की उपस्थिति में गाँधीजी
और मौलाना शौकत अली के भाषण हुए । गाँधी जी ने अपने भाषण
में असहयोग और सत्याग्रह की बात लोगों को समझाई । श्री
शौकत अली ने अपने भाषण में सदा की तरह मजाकिया अन्दाज में
कहा-
“मैं
तो हाथी हूँ और गाँधीजी बकरी जैसे हैं।”
लोग खूब हँसे । तब आगे मौलाना साहब ने कहा-
“अगर
मैं मर जाऊँ तो किसी के भी काम न आऊंगा। लेकिन गाँधी जी
आज भी सबके लिए उपयोगी हैं और मरने के बाद भी उपयोगी बने
रहेंगे।”
तब लोगों को हाथी और बकरी का सन्दर्भ समझ में आया ।
कार्यक्रम में गाँधीजी ने जनता को लगभग एक घंटे तक अपने
सम्बोधन भाषण से सम्मोहित किये रखा। उन्होंने अपने भाषण
में जनता की सराहना की एवं तहसील एवं आसपास के गाँवों के
लोगों को उनके सत्याग्रह कण्डेल ग्राम सत्याग्रह की सफलता
पर बधाई देते हुए भविष्य के आन्दोलनों हेतु प्रेरणा दी।
लगभग एक बजे तक यह कार्यक्रम चला। इसके बाद दोपहर का
फलाहार गाँधी जी ने नगर के नत्थू्जी जगताप के यहाँ किया।
इस मौके पर गाँधीजी के पास श्री बाजीराव कृदत्त, दाऊ डोमार
सिंह नंदवंशी, सेठ हंसराज तेजपाल, किशनगीर गोसाई, रघुनाथ
राव जाधव, सेठ सोहनालाल मुंशीलाल वीरजी भाई राजपुरिया,
मोहम्मद अब्दुल करीम, छोटेलाल दाऊ, अब्दुल हकीम वकील, सेठ
उस्सान अब्बा, भानजी भाई ठेकेदार एवं बदरूद्दीन मालगुजार
आदि सक्रिय कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।
गाँधीजी के भाषण का जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा । उसके बाद
अनेक लोगों ने वकालत छोड़ दी और अनेक लोगों ने आजीवन खादी
पहनने का निश्चय किया। धमतरी से गाँधीजी कण्डेल ग्राम भी
गये । इस अवसर पर वे कुरूद गाँव भी गये और वहाँ भी उनका
उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया। धमतरी में गाँधीजी के ठहरने
की व्यवस्था श्री नारायणराव मेघावाले के निवास स्थान पर की
गई थी यहाँ उन्होंने रात्रि विश्राम किया। प्रातःकाल वे
पुनः रायपुर के लिए रवाना हो गये। धमतरी से उनकी कार चलाने
का सौभाग्य मिला युवा हजारी लाल जैन को।
रायपुर में
महिलाओं की सभा
धमतरी से लौटने के बाद गाँधीजी ने रायपुर में ब्राह्मण
पारा की आनन्द समाज लाइब्रेरी के प्रांगण में महिलाओं की
सभा को भी संम्बोधित किया । इस मभा में महिलाओं ने बड़ी
संख्या में भाग लिया। बापू ने यहाँ महिलाओं से तिलक
स्वराज्य कोश के लिये अपील की, जिसका बहुत प्रभाव पड़ा और
उपस्थित महिलाओं के पास जो कुछ था उसे बापू के चरणों में
अर्पित करने की होड़ लग गई और अनुमानतः दो हजार रुपये
मुल्य के सोने-चाँदी के गहने और रुपये एकत्रित हो गये ।
उसी समय से इस क्षेत्र में महिलाओं में भी विशेष जागृति
परिलक्षित हुई तथा स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने सक्रिय
भाग लिया । चूँकि गाँधीजी को 2 दिस्मबर से नागपुर में
आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेना था, अतः वे सीधे
नागपुर के लिए रवाना हो गये । गाँधी जी की इस यात्रा में
उनके व्यक्तित्व को यहाँ की जनता ने जिस प्रकार अनुभव किया
वह अनुभव एक झलक के रूप में स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी
प्रभुलाल काबरा के शब्दों में दिखाई देती है। इसे डॉ. अशोक
शुक्ल ने अपने शोध ग्रंथ में लिखा है । काबरा के शब्द हैं
–
“मैंने
गाँधीजी को रायपुर के प्लेटफार्म पर देखा । उसी डाक गाड़ी
से दादा साहब खापर्डे, डॉ. मुंजे आदि कलकत्ता जा रहे थे ।
प्लेटफार्म पर ये सब नेता प्रथम श्रेणी या द्वितीय श्रेणी
के डिब्बे से उतरे किन्तु उनमें एक अकेले गाँधीजी ही नहीं
दिख रहे थे और जन-समूह की आँखें गाँधीजी को ढूंढ रही थी ।
किसी ने बताया कि वे तृतीय श्रेणी के डिब्बे में बैठे हैं
। जनता उसी तरफ दौड़ी और लोगों ने देखा
कि लुंगी और
पट्टी वाला कुरता पहने गाँधीजी दोनों हाथ जोड़े हुए तृतीय
श्रेणी के डिब्बे के दरवाजे पर खड़े हैं। तब तक गाड़ी चलने
लगी थी। जनता के मुँह पर एक ही बात थी, देखो गाँधी तृतीय
श्रेणी में जा रहे हैं। उनकी सादगी को अनुभव कर जनता
भाव-विभोर हो उठी और लोगों को यह विश्वास हो गया कि गरीब
एवं दलित भारतीय जनता का सही नेतृत्व गाँधीजी ही कर सकते
हैं।”
