रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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संस्मरण

 
बीस साल लम्बा सपना

अमृता प्रीतम

          एक और सपना था, जिसने मेरी उठती जवानी को अपने धागों में लिपटा लिया । हर तीसरी या चौंथी रात देखती थी - कोई दो मंजिला मकान है वह बिल्कुल अकेला आसपास कोई बस्ती नहीं चारों ओर जंगल है, और जहाँ वो मकान है, उसके एक तरफ़ नदी बहती है। नदी की ओर उस मकान की दूसरी मंज़िल की एक खिड़की खुलती है, यहाँ कोई खड़ा खिड़की से बाहर जंगल के पेड़ों को व नदी को देख रहा है । मुझे सिर्फ़ उसकी पीठ दिखाई देती थी, और सिर्फ़ इतना कि गर्म चादर उसके कंधों पर लिपटी होती थी, या कभी वह खिड़की के पास में लगी मेज़ पर रखी किसी कैनवास को पेंट कर रहा होता था । उस हालत में भी मुझे सिर्फ़ उसका दायाँ कंधा दिखाई देता था, दायीं बाँह और चेहरे का थोड़ा सा हिस्सा, जिससे कोई पहचान नहीं होती थी कि वह कौन है, न कभी यह पता चलता था कि वह हर तीसरी-चौथी रात मुझे क्यों दिखाई देता था ...और इस सपने का कोई भी रहस्य मेरी पकड़ में नहीं आता था।

 

        साहिर के नाम जो आख़िरी ख़त लिखा था, वह किताबी सूरत में प्रकाशित होना था । जिसके लिए किसी चित्रकार की ज़रूरत थी, सोचती थी कि उसके कुछ हिस्से चित्रित हों । दिल्ली में उन दिनों सेठी चित्रकार का नाम सुनाई देता था । अदबी हलक़े में एक देवेन्द्र था जो मुझे संजीदा लगा था। उसके साथ बात की, वह सेठी को जानता था, पर उसे सेठी ने कहा-बम्बई से आजकल एक चित्रकार आया हुआ है, शमा के दफ़्तर के चित्रकारों के पास नहीं और एक दिन देवेन्द्र उस चित्रकार को ले आया आख़री ख़त को चित्रित करने के लिए....

 

        आख़री ख़त किताब छपी, पंजाबी में भी, हिन्दी में भी, लेकिन ये दोनों ज़बानें खामोश की खामोश रह गई कि वो साहिर तक नहीं पहुँच सकती थीं, जिसके लिए वो आख़री ख़त लिखा था....

 

        शमा उर्दू का महीनेवार पत्रिका थी और उन दिनों शमा वालों ने एक और पत्रिका शुरू की आईना . आईना में आख़री खत प्रकाशित करवाया कि शायद उसकी नज़र से गुज़र जाए.....इसके बाद एक खामोसी थी-और कुछ नहीं ।

 

        ये बात बरसों के बाद पता चली, साहिर की ज़बानी, मैंने जब आईना में आख़री ख़त पढ़ा, दिल में आय़ा अभी अब्बास के घर जाऊँ ,कृश्न चंदर के घर जाऊँ, और दोस्तों के घर भी, और कहूँ  कि यह खत मेरे नाम लिखा हुआ है, लेकिन मैं चुप रह गया । लगा कि जब यह कहूँगा तो वह दोस्त कहेंगे-हाँ-हाँ,तेरे नाम लिखा हुआ है, चलो बेटा, तुम्हें पागलख़ाने छोड़ आते हैं।

 

        यह साहिर की एक ख़ामोशी थी, जिसे मेरी ज़िंदगी के बरसों के बरस कभी समझ नहीं पाए; और शायद वो भी अपनी ख़ामोशी को नहीं समझ पाता था । पर यह बात उन दिनों की है, जब मैं उस खामोशी में से गुजर रही थी। और खामोशी की बर्फ़ कहीं से भी टूटती पिघलती नहीं थी।

 

        एक दिन अचानक इमरोज़ (उन दिनों उसका नाम इंद्रजीत चित्रकार था) अपने दफ़्तर से दोपहर के खाली समय में मेरे पास आया । बहुत खुश । उसे बंबई के फिल्म डायरेक्टर गुरुदत्त का ख़त आया था, जिसने बुला भेजा था, उसे अपनी फ़िल्मों में काम करने के लिए । तनख़्वाह की पेशकश भी अच्छी थी, रिहाइश का बंदोबस्त भी और आर्टिस्ट खुश था.....मैं खुश थी कि उसने अपनी कला की इस कद्रदानी की बात सबसे पहले मुझे सुनाना चाही थी।

 

        खुदा जानता है मैं चेतन तौर फर कुछ भी उसके साथ जोड़ कर नहीं देखती थी, पर उस समय लगा, जैसे मेरे से कुछ छूट रहा हो । एक बार इसी बम्बई में मेरे से साहिर ले लिया था, और अब वही बम्बई दूसरी बार....इस दूसरी बार लफ़्ज का रहस्य मैं नहीं जानती थी, सिर्फ तकदीर जानती थी....आँखों का पानी संभल नहीं रहा था, इसलिए पास की मेज़ से कोई रिसाला उठाकर मैंने आँखों के सामने रख लिया ।

 

        उन दिनों जब कभी उसके साथ मुलाकात होती थी, हमेशा किसी किताब की बात होती थी कि मैं क्या पढ़ रही हूँ, या उसने आजकल क्या पढ़ा है। कमरे में एक ख़ामोशी ठहर गई थी, शायद इसलिए उसने पूछा - आजकल कोई नई किताब पढ़ी है ?

 

        उस वक़्त मुझे एक किताब याद आई, अंग्रेज़ी का एक नॉवल । किताब का नाम याद में नहीं आया, लिखने वाले का नाम भी याद में नहीं आया, पर एक गहरा एहसास हुआ कि उस नॉवल की कहानी आज मेरे साथ गुज़र रही थी.....और मैंने वह कहानी उसे सुनाई, हां एक नॉवल पढ़ा है। एक बहुत बड़े शायर की कहानी है, जिसे खुदा की तरफ़ से दिल मिला था, पर सूरत नहीं मिली थी । उसे एक बहुत हसीन लड़की से मुहब्ब्त हो जाती है, एक दीवनगी की हद तक, पर वह कभी अपनी मुहब्बत को ज़बान पर नहीं ला सका......

 

        उसी का एक दोस्त बहुत अमीर और बहुत खूबसूरत था, जो उसी लड़की से मुहब्बत करने लगा, लेकिन उसके पास कुछ भी कह पाने के लिए अलअफ़ाज नहीं थे। उस वक़्त वो शायर दोस्त अपने सारे एहसास को लफ़्जों में ढाल कर वे लफ़्ज उसे दे देता, और वह उस सुंदरी के पास जाकर जो कुछ कहता है, आवाज़ उसकी होती है, लेकिन लफ़्ज उसके दोस्त के.....

 

        वह सुंदरी फ़िदा हो जाती है उसके अंदाज़ पर । साथ ही वह इतना खूबसूरत और अमीर था कि कुछ दिनों की मुलाकात के बाद वह उससे ब्याह कर लेती है.....

 

        फिर इत्तफ़ाक होता है कि जंग शुरू हो जाती है और दोनों दोस्तों को महाज़ पर जाना पड़ता है। वहाँ से उस सुंदरी का खाविंद जो ख़त लिखता है, बड़े शायराना खत, वो सभी उसके दोस्त के लिखवाए हुए होते हैं।

 

        उसी जंग में उस सुंदरी का ख़ाविंद मारा जाता है और उसका दोस्त बहुत जख़्मी हालत में उस शहर के अस्पताल में भेज दिया जाता है। उस हसीना को जब पता चलता है, वो अस्पातल में आती है। उस दोस्त से अपने मर चुके ख़ाविंद की बातें सुनने के लिए और एक शाम वो सारे खत भी लाती है उसे दिखाने के लिए कि देखो, वह कितना नफ़ीस आदमी था। अस्पताल में दोस्त के बिस्तर के पास बैठी वह सारे ख़त उसे देती है, कहती है, अब तुम पढ़ो ज़रा ऊँची आवाज़ में, मैं आँखें बंद करके सुनूंगी, तो लगेगा, जैसे उसी की आवाज़ सुन रही हूँ.... खत पढ़ते-पढ़ते गहरी शाम हो जाती है, कमरे में बत्ती जलाने का किसी को ध्यान नहीं आता, और अचानक वह चौंक जाती है कि वह दोस्त इतने अंधेरे में ये ख़त कैसे पढ़ रहा है ?

 

        ख़त का अक्षर-अक्षर पढ़ने वाले की छाती में लिखा हुआ था। उसे बाहर की रोशनी की भी ज़रूरत नहीं थी और उस समय वह हसीना उस रहस्य को पा लेती है, जो उसने अभी तक नहीं पाया था......

वह दोस्त अच्छी हालत में नहीं था दूसरे रोज़ जब उसकी मौत की खबर मिलती है तो वो सुंदरी भाग कर अस्पताल में आती है, उसके होंठ चूमती है और कहती है, आई लब्ड वन मैन, वट लोस्ट हिम ट्वाइस ।

 

        यह कहानी थी जो उस वक्त मैंने चित्रकार को सुनाई, मन में यकीन था कि इस कहानी से वह मेरे किसी एहसास का पता नहीं पा सकेगा ।

 

        वह बम्बई चला गया । मेरे ख्याल में हमेशा के लिए पर तीन दिन गुज़रे थे। जब बम्बई से उसका फ़ोन आया- मैं कल वापस आ जाऊँगा । यहाँ नौकरी का सारा सिलसिला ठीक है, गुरुदत्त मुझे अच्छा लगा है, पर मुझे लगता है, मैं यहां रह नहीं सकूँगा।

मैंने पूछा-क्यों ? तो उसने सिर्फ़ इतना कहा-पता नहीं.....

 

        आने वाली ज़िंदगी का कुछ अनुमान-सा भी, न मुझे था, न उसे, पर लगता है - तक़दीर सबकुछ जानती थी......

 

        उस वक़्त तक मैंने अपने बीस साल लम्बे सपने को कभी उसके साथ जोड़ कर नहीं देखा था, लेकिन यह एक हक़ीक़त है कि उससे मिलने के बाद फिर कभी मुझे वह सपना नहीं आया ।

 

 

 

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