रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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ग़ज़ल : बारिश के मौसम में मिट्टी से फूटती सुंगध/ हस्तीमल हस्ती / समीक्षक - ताजदार ताज

 
 

बारिश के मौसम में मिट्टी से फूटती सुंगध

ताजदार ताज

            

        हिन्दी साहित्य के राजपथ पर ग़ज़लकारों की भीड़ लगी है। सच पूछिए तो पाँच-दस को छोड़कर सभी ऐसे हैं, जिनके माथे पर साफ़ पढ़ा जा सकता है- नाम बड़े दर्शन छोटे मगर ये लोग दर्पण नहीं देखते ।

 

       वे दिन बीत गए, जब ग़ज़ल विधा हुस्न, इश्क, चमन, सय्याद, मिलन और जुदाई के अफ़सानों तक सीमित तथा मनबहलाव का साधन थी। आज की ग़ज़ल का आँचल इतना विस्तृत और विशाल हो गया है कि उसकी छाँव में सारी दुनिया के सुख-दुख सिमट आए हैं। जीवन की कोई सच्चाई, कोई समस्या ऐसी नहीं है जो ग़ज़ल की सीमा से बाहर हो।

 

       ग़ज़ल कहना बच्चों का खेल नहीं है। शायर बूढ़ा होता है तो उसकी ग़ज़ल जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती है । जो रचनाकार जीवन-सागर का मन्थन कर स्वयं विष-पान करने और दूसरों को अमृतदान करने की शक्ति रखता है, उसी की जटाओं से अवतरित होती है ग़ज़ल-गंगा।

 

       हस्ती भी ग़ज़ल के शायर हैं। हिन्दी के वर्तमान ग़ज़लकारों में उनकी एक ख़ास पहचान भी है। यह पहचान इसलिए नहीं है कि उन्हें कवि सम्मेलनों में बड़े आदर के साथ बुलाया जाता है या उनकी ग़ज़लें जगजीत सिंह और पंकज उधास जैसे श्रेष्ठ कलाकारों ने गायी हैं। उनकी पहचान केवल इसलिए भी नहीं है कि वे काव्या’ नाम की एक साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक हैं। वे एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर के रूप में इसलिए परिचित हैं कि उन्होंने आम डगर से हटकर कुछ और तरह से भी ग़ज़ल कहने का सफल प्रयास किया है।

 

उनकी रचनाओं में भाषा का रखरखाव, शब्दों का चयन, चिंतन की गहराई, अभिव्यक्ति कौशल, ग़ज़ल की सभ्यता, संस्कार और सिद्धांत, वह सभी कुछ मौजूद है जिसकी आशा एक अच्छे ग़ज़लकार से की जाती है।

 

हस्ती हवाई करतब नहीं दिखाते । वे धरती से जुड़े हैं, धरती की बात करते हैं। उनकी ग़ज़लों में वही भीनी सुगन्ध है जो बारिश के मौसम में मिट्टी से फूटती है।

 

घर के  आँगन से समाज के गलियारों तक राजनीति के छल से मिलन के मधुमास और वियोग के पतझड़ तक जो कुछ हस्ती की आँखें देखती हैं उसका वर्णन वे उपनी ग़ज़लों में बड़ी ईमानदारी से कर देते हैं। मगर कभी भी ग़ज़ल के बंधनों से मुक्त नहीं होते। यही विशेषता उन्हें समकालीन कवियों से अलग करती है। सफ़र जारी है। मुझे विश्वास है कि ग़ज़लकार के रूप में हस्ती का भविष्य उज्जवल है।

 


n       समीक्षक: ताजदार ताज

n       ग़ज़ल: कुछ और तरह से भी

n       लेखिका: हस्तीमल 'हस्ती'

n       प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली

n       मूल्य: 150/-


 

 

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संतोष से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है- पंतजलि

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