रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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उपन्यास : संत्रास के बीच से उभरती सबला/ प्रभा माथुर / समीक्षक - आनंदप्रकाश दीक्षित

ग़ज़ल : एक बहुआयामी प्रकीर्ण प्रतिभा/ शंकर सक्सेना / समीक्षक - चंद्रसेन विराट

ग़ज़ल : बारिश के मौसम में मिट्टी से फूटती सुंगध/ हस्तीमल हस्ती / समीक्षक - ताजदार ताज

 
 
एक बहुआयामी प्रकीर्ण प्रतिभा

चन्द्रसेन विराट

            लाराजपुर (झाबुआ) में सत्तर के दशक के कुछ आखिरी वर्षों में कविवर शंकर सक्सेना को समीप से जान पाया था । यह बहुआयामी प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति केवल एक प्रख्यात् कवि ही नहीं है; वह एक कुशल चित्रकार, संगीतकार भी है, एक कुशल गीतकार होने के नाते उन्होंने गीत तो लिखे ही हैं, गीतों के साथ नये तेवर की ग़ज़लें भी उन्होंने पूरी कुशलता के साथ लिखी हैं । कुछ नया कहने की ललक ने उनकी ग़ज़लों को पठनीय विशेषता भी प्रदान की है, पारम्परिक ग़ज़लों के छन्द-विधान, रूपाकार का निर्वाह करते हुए वर्तमान की नब्ज पर हाथ रखकर समय का सही तापमान दर्शाने की जिद भरी कामयाब कोशिश रही है उनकी ग़ज़लों में, इसके लिए वे नयी कहन, नया तेवर और नया भाषायी विन्यास अपनाने में नहीं हिचकते, जैसे अपनी रेखाओं और रंगों के साथ वे चित्रकारी में प्रयोग करते रहे हैं, उसी तरह अपनी ग़ज़लों में भी उन्होंने कई तरह के प्रयोग किये हैं :

 

        खुशी और ग़म में अक्सर ही छलक पड़ते थे आँखों से,

        नहीं आते, अगर आते भी हैं आँसू, तो मुश्किल से ।

या-          

         जिन पत्थरों को हमने सिखाया था बोलना,

        जब बोलने लगे तो हमीं पर बरस पड़े ।

        बोए थो बीज और, शज़र और तरह के,

        फूल और तरह के हैं, समर और तरह के ।

 

        मानवीय दर्द के वे प्रवक्ता रहे हैं और इसे बड़ी प्रामाणिकता के सात उन्होंने अपनी ग़ज़लों में गाया है, प्रकृति के दृश्य-चित्र उकेरने में वे माहिर रहे हैं, प्रकृति के उपादान उन्हें बहुत प्रिय रहे हैं, इन्हें उन्होंने अपने गीतों में तो बांधा ही है,  उनकी ग़ज़लों मे भी कहीं-कहीं उनका स्पर्श मिलता है :

 

        क्यूँ नफ़रतों की आग में जलता है रात दिन ?

        दिल में कभी चिरागे-मुहब्बत जला के देख ।

 

        प्यास नहीं बुझती शबनम से और समन्दर नाकाफी है,

        अपनी ही आँसू पी-पीकर जी लेते हैं जैसे-तैसे ।

 

        तुम से अमीरे शहर की बातों में आ गये,

        उसकी नज़र लगी है तुम्हारे मकान पर ।

        अहले-हवस ने मार दिया, उसको जान से,

        क्या-क्या सितम किये गये, उस बेजुबान पर ।

 

        वो यकीकन, साहिबे परवाज था,

        खून आलूदा उसी के पर मिले ।

 

        मौसम तो खुश-गवार था, शंकर बदल गया,

        बस्ती में आ गये हैं बसर, और तरह के ।

 

        यह कुशल गीतकार, ग़ज़लों में भी, अपने शब्द-चयन. बिम्ब-विधान एव प्रतीकों के प्रति बहुत सावधान रहा है, हमेशा कुछ न कुछ नया कहने, करने की उनकी सृजन क्षमता उनकी ग़ज़लों में भी देखी जा सकती है, कभीकभी कोई बात शे'र की शक्ल में इतनी कुशलता से व्यञ्जित कर जाते हैं कि उनका काव्य-कौशल एवं सृजनात्मकता से ईर्ष्या होने लगती है । अपने सृजन के प्रकाशन के प्रति उदासीन रहा यह प्रतिभ गीतकार, ग़ज़लकार एवं दोहाकार, सच पूछा जाए तो कागज पर छपने के बजाय सुधी पाठकों के मानस पर छपता आया है और यह सौभाग्य बहुत कम कवियों को मिल पाता है ।

 

        अब वह अपना नया ग़ज़ल संग्रह अजनबी शहर में लेकर काव्य-सभा में उपस्थित हो रहा है, बहुत प्रसन्न मन से इस बहुआयामी प्रतिभा-सम्पत्र ग़ज़लकार को पाठकगण स्वागत करेंगे, इसमें कोई दो मत नहीं ।

 


n       समीक्षक: चंद्रसेन विराट

n       ग़ज़ल: अजनबी शहर में

n       लेखिका: शंकर सक्सेना

n       प्रकाशक: सत् प्रकाशन, नीलकमल कॉम्पलेक्स, भोपाल

n       मूल्य: 100/-


 

 

 

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