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संत्रास के बीच से उभरती सबला |
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आनन्दप्रकाश दीक्षित
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‘धुली-धुली
शाम का उजाला’
श्रीमती प्रभा माथुर का पहला उपन्यास है, कविता और सामाजिक
समस्यामूलक निबंध-रचना के क्षेत्र में वे अब एक पहचाना हुआ नाम
हैं। उपन्यास-लेखिका के रूप में उनका यह पहला कदम स्वागतेय है।
लेखिका
की
मूल चिंता नारी के स्वाभिमान की रक्षा की है, आनुषंगिक रूप
से वह उसकी निस्पृहता, त्यागपूर्णता तथा आत्मनिर्भरता के आदर्श
से जुड़ी है और उसके सबल पक्ष को उजागर करती है। नायिका-प्रधान
इस उपन्यास की कथा का आरंभ निरंतर असह्म होती जा रही
‘रैगिंग’
की समस्या से होता है। कथा-नायक मनीष मेडिकल कालेज में
नई प्रविष्ट नीता के चेहरे के लूकोडरमा के दाग़ को लक्ष्य करके
उसका जिस तरह भद्दा मज़ाक बनाता और स्वाभिमानिनी नीता के हाथ
से थप्पड़ खाता है, उसकी परिणति किसी अवांछित विषम घटना में न
होकर, दोनों के संस्कारहीन होने के कारण, पारस्परिक सहानुभूति,
सहयोग और मानसिक प्रेम में होती हैं। वह प्रगाढ़ प्रेम और
सहयोग दोनों के परिणय-सूत्र में बदलता कि नीता की उदारता का
लाभ उठा कर कर्नल उसे ही माध्यम बना कर अपनी बेटी निशा का मनीष
से विवाह रच देते हैं । ईष्यालु तथा कुटिल-बुद्धि निशा की
हरकतों के कारण नीता को धनवन्तरि अस्पताल छोड़ कर प्रगत अध्ययन
के लिए विनोद के सहारे विदेश जाना पड़ता है। वहाँ उसका पड़ता
है। वहाँ उसका अकेलापन उसके तन-मन के लिए अभिशाप बन जाता है।
लूकोडरमा के इलाज की दवा खोजते-खोजते उसके दोनों फेफड़े बुरी
तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और शोध में सफल होकर भी उसकी
अकाल-मृत्यु उसे सबसे छीन ले जाती है । उपाधि और सम्मानों से
सम्मानित नीता धनवन्तरि अस्पताल लौटती तो है, जहाँ मनी, उसका
स्वागत करते हैं । पर वह प्राणवान नीता नहीं हैं. उसकी
शव-पेटिका है।
आत्म-बलिदान और संघर्ष की इस करुण-कथा के साथ लिपटी हुई
प्रसंगतः उपस्थित और कई घटनाएं या विषम स्थितियाँ है जो नीता
और मनीष के जीवन को नये मोड़ देती हैं या जिनसे इस मुख्य कथा
का विस्तार होता और चरित्रों को गहराई मिलती है। ऐसे अवसरों पर
लेखिका को अपने देश की समसामयिक परिस्थितियों का जायज़ा लेने
का और विदेश की सुखद स्थितियों से उनकी तुलना करने का अवकाश भी
मिला है, जिसे कही वे संवाद की भूमि पर कथा का अंतरंग बना
प्रस्तुत करती हैं और कहीं वह उनका व्यक्तिगत आक्रोश बन कर
व्यक्त हुआ है।
उपन्यास की कथा नारी-जीवन के संत्रास से और उसके बीच उभरती
सबला के गौरवशाली चरित्र से संबंधित है, परंतु वह नारी की
सामान्य समस्याओं का ताना-बाना नहीं है। आदर्श और संयम की डोर
में बंधा नायक-नायिका का जीवन आधुनिकों के स्वच्छंदतामूलक
प्रेम को स्वीकार करके नहीं चलता। कथा की रंजकता और जीवन या
चरित्र की यथार्थता के लिए जो मनोयोग मैं विश्वास न करके केवल
दैहिक संयोग और संभोग के चित्रण को कथा की अनिवार्यता मानते
हैं, उनके लिए इतना संयम अग्राह्म भले ही हो, पर ऐसी स्थितियाँ
और चरित्र नहीं ही होते, यह कहना भी सत्य नहीं होगा। हाँ, वे
आज दूर्लभ और अपवादस्वरुप अवश्य हैं। लेखिका प्रचलन से हटकर
अपने विश्वासों की धरती पर अपना एक अलग मार्ग बनाती है। पाठक
को देखना यह है कि जो कथा वह बुनती है वह सुविन्यस्त है या
नहीं । उसकी परिणति उसकी अपनी कल्पना की बनावट के अनुकूल होती
हैं या नहीं
?
श्रीमती माथुर का यह उपन्यास एक-रेखिक है। एक विशाल उपन्यास की
भाँति इसमें अन्यान्य पात्रों की चरित-गाथा मिश्रित नहीं है ।
चूँकि घटनाएँ काल- दीर्घता में घटित होती हैं और स्थल बदलते ही
नहीं रहे हैं, उनका विस्तार देश- विदेश तक है, इसलिए जीवन की,
एक विशेष सीमा तक, व्यापक परिधि का निर्वाह भी आपसे-आप हो गया
है। जहाँ तक भाषिक अभिव्यक्ति का प्रश्न है, यद्यपि लेखिका ने
सामान्यतः सुसंस्कृत गद्य
–भाषा
का प्रयोग किया है, पर संवादों या कथा-प्रवाह को बनाये रखने के
लिए उन्होंने सहज आपतित अँगरेज़ी शब्दों को स्वीकार कर लिया है
भाषा और खान-पान का यह प्रयोग शिक्षित महानगरीय पात्रों के
अनुकूल है।
डॉक्टरी पैशे से जुड़े हुए व्यय और व्यावसायिकता के कारण इस
पेशे में नित्य प्रति बढ़ती जाती सहानुभूति-हीनता,
संवेदन-शून्यता और सेवा-भाव का अभाव चिंता का विषय है। श्रीमती
माथुर हमारे समाज में बढ़ती मूल्यहीनता से असन्तुष्ट हैं। जहाँ
वे एक ओर इस मूल्यहीनता पर तीखा प्रहार करती हैं, वहीं दूसरी
ओर कदाचित् इस प्रहारधर्मिता को समाजहित का अधूरा उपाय मानते
हुए वे नीता जैसी निस्पृह, संवेदनशील, सहानुभूतिमय और बलिदानी
पात्र-सृष्टि भी करती हैं जो डॉक्टरी पेशे में रहकर भी अपने इन
गुणों और सेवाभाव से हर स्तर के मरीज़ों का दिल जीत लेती हैं ।
उनका रास्ता गांधीवाद की ओर मुड़ता है।
उपन्यास के विषय में सुधी पाठकों की प्रतिक्रिया लेखिका का पथ
प्रशस्त करेगी और भविष्य में उत्तमोत्तम रचनाओं के लिए उसे बल
देगी, इस आशा के साथ श्रीमती माथुर के इस प्रथम प्रयास का
स्वागत करते हुए हम उन्हें हार्दिक बधाई देते हैं।
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समीक्षक:
आनंद प्रकाश दीक्षित
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उपन्यास:
धुली-धुली शाम का उजाला
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लेखिका:
प्रभा माथुर
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प्रकाशक:
दीपा माथुर, 3
महिंद्रा सोसायटी, पुणें
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मूल्य:
125/-

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