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ये रहीम दर-दर फिरैं
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डॉ. विश्वनाथ
प्रसाद |
रहीम
मुगल साम्राज्य के शक्तिशाली स्तम्भ थे, इसलिए अपकर्ष के बाद
भी इधर-उधर अटकने में उन्हें बहुत पीड़ा हुई होगी । फिर भी
निरुपायता के इस भटकाव में मिली हुई सहायता को उनके कवि-मन ने
मधुकरी समझा । उनका एक मन शासक का था जो प्रताड़ना से तिलमिला
उठा था और दूसरा मन कवि का था जो सारे संघर्षों में भी एक ऐसा
स्वाद की तलाश कर रहा था जो विसंगतियों को भी मधूर बना देता है ।
आज मैं भी भटक रहा हूँ । एक दर से दूसरे दर पर और दूसरे दर
से तीसरे दर पर । स्वाद तो हर जगह है, लेकिन तृप्ति कहीं नहीं
है। मैं रहीम जैसा न शासक हूँ, न कवि ।
बहुत ही सामान्य कुल और
सामान्य परिवार का सामान्य-सा आदमी हूँ । कालिदास का तो मेघ भी
भुवन-विदित वंश में उत्पन्न हुआ था। वह काम, रूप और इन्द्र का
कृपा-पात्र था। कालिदास जितने ही उदास थे उनका मेघ उतनी ही
गारिमा से मंडित था
। कालिदास ने विंघ्य की श्रृंखलाओं से लेकर
हिमगिरि की उत्तुंगता को तो अपने पैरों से रौंद दिया था
।
उज्जयिनी से लेकर अलकापुरी तक के सौंदर्य का छक कर पान किया
था । उनका मन सौंदर्य के लालित्य और औदात्य दोनों से परिपूर्ण
था । किन्तु मैं तो एक नाचीज हूँ - रास्ते की खाक का एक नाचीज़
जर्रा । हर आदमी खड़ा करने और आगे बढ़ने की ललक से भरा हुआ
हूँ, लेकिन जसके भी पाँव से चिपकता हूँ वह या तो ठोकर मार देता
है या झाड़ कर दूर फेंक देता है। बड़े बेरहम हैं मेरे यार ।
जायसी नागमती को
‘छार’
बनाकर रास्ते पर गिराना चाहते थे। भला बताइए, अगर प्रिय पाँवों
से झाड़ देगा, तब क्या होगा
? होता भी
यही है, हर चिकना-चुपड़ा धूलि को झाड़ देता है।
एक सामान्य-सा आदमी घुटनों तक पाँवों को और
केहुनी तक बाँहों
को धूलि में लथ-पथ किये रहता है। वह धूलि को जल्दी झाड़ता नहीं
। वही उसका श्रृंगार है, इसलिए एक बहुत ही सामान्य आदमी के
पाँवों की धूलि बनना अच्छा है।
मैं यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ भटक रहा हूँ - शरीर और मन
दोनों से । कभी-कभी शरीर साथ नहीं देता है, मगर मन ऐसा है कि
उसे कोड़े पर कोड़े मार कर दौड़ाता है। यह शरीर दौड़ रहा है,
किसी-किसी दिन तो सुबह जो चार जामा कसा जाता है वह आधी रात के
बाद ही उतरता है। बुरी तरह से थक कर चारपाई पर गितना हूँ तो मन
में आता है कि आखिर इस दौड़-धूप की सार्थकता क्या है
? कहीं किसी
की जी-हुजूरी, कहीं किसी का स्वागत, कहीं किसी का अभिनन्दन,
कहीं किसी रुपयों के लिए भी दौड़ता हूँ । वैसे धन ने मुझे कभी
बाँधा नहीं है। मुझे पद और अधिकार ने भी प्रभावित नहीं किया
है। लेकिन यश को क्या
कहूँ
? उसने तो
आरंभ से ही बहुत ललचाया है। लाली पॉप की तरह इसे दिखाकर लोगों
ने मुझे बहुत दौड़ाया है। अब इस बचकानेपन को भी नियंत्रित कर
रहा हूँ । लेकिन परिवार के दायित्वों के साथ धन की भी आवश्यकता
उदग्र होती जा रही है । अपने लिए और अपनी पत्नी के लिए नहीं
चाहिए । मैं तंगेहाली में भी मग्न रह लूँगा । पत्नी एक पैबंद
पर दूसरा पैबंद लगा कर घर पहन लेगी। कहीं बाहर तो निकलना नहीं
है । देखेगा कौन
? मकान चूता
है ते चूने दो । टपर-टपर चूती हुई छाजन के नीचे गुट- मुटा कर
बैठने का मजा कुछ और ही है । लेकिन इन बच्चों का क्या करूँ
? इन्हें तो
द्रोणाचार्य भी गरीबी में नहीं रख सके थे, फिर मेरी क्या बिसात
है
? बच्चे
बहुत बड़ी चीज नहीं माँगते । चंद्रमा तो किसी और के बच्चे
माँगते रहे होगे । मेरे बच्चे तो बिस्कुट, जलेबी और लाल-पीले
कपड़ों में ही खुश हो लेते हैं। इससे ज्यादा अभी चाहिए भी नहीं
। पहले हिन्दुस्तान के हर आम आदमी के बच्चे को कम से कम
इतना
तो मिल ले । अभी तक समाजवाद का अर्थ सिर्फ इतना ही समझ में आया
है कि हर आदमी को उसकी योग्यता के अनुसार काम और उसकी आवश्यकता
के अनुसार पैसा मिल सके ।
बहुत से ऐसे भी बच्चे हैं जो माँ के
दूध के अलावा और किसी दूध का स्वाद ही नहीं जानते और जाड़े के
अलावा दूसरी ऋतुओं में कपड़ों से भेंट ही नहीं होती । फिर मेरे
बच्चों को इस मसय जितना मिल रहा है उससे ज्यादा की आवश्यकता भी
नहीं है। मैं इतनी कटौती के लिए कमर कसे हुए हूँ, लेकिन उनकी
वय के साथ आवश्यकताएँ भी बढ़ रही हैं। कहाँ से लाऊँ
? उनकी उदास
आँखों में कहाँ से लाकर उल्लास की चमक डाल दूँ
? मेरी इस
निरुपायता को बच्चे नहीं जानते और उन्हें जानना भी नहीं चाहिए ।
मैं जनक हूँ, इसलिए उनकी उचित आवश्यकताओं को मुझे पूरा करना
है। इसीलिए यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ भटक रहा हूँ । वैसे
इसे भटकाव नहीं कहना चाहिए । भटकाव तो निरुपायता और
निरुद्देश्यता में होता है
। मैं विविश नहीं, स्ववश हूँ ।
लक्ष्यच्युत नहीं, लक्ष्य का संधान कर रहा हूँ ।
अपनी आवश्यकता-भर के लिए चंक्रमण किया जाय तो मधुकरी होती है।
सुमन से मधु का संचय बौद्धों का यही अपरिग्रह है
। आवश्यकता भर
के लिए ले लो, संग्रह मत करो । गौतम
बुद्ध ने कहा था कि जैसे
भ्रमर फूल के वर्ण और गंध का अनुसंधान करता हुआ अपनी आवश्यकता
के अनुसार रस लेकर उड़ जाता है, वैसे साधु भी ग्राम में विचरण
कर :
यता भमरो पुप्फ
वण्ण गंधं अहेडयं।
रसं आदाय पलेति एवं
गामें मुनीचरे ।।
मैं भी आवश्यकता-भर के लिए पात्र लेकर चंक्रमण कर रहा हूँ ।
किसी ने सम्मान से पात्र में कुछ डाल दिया, किसी ने उपेक्षा
से मुँह फेर लिया और कुछ तो ऐसा भी मिल जाते हैं कि जो मिला है
उसे भी छीन कर मेरी तुमड़ी फोड़ देना चाहते हैं । मैं तुलसी
जैसा यानी याचक नहीं हूँ । उनकें राम बहुत समर्थ थे और मेरा
सामान्य जन चुटकी भर दे दे, यही बहुत है। इसलिए दर-ब-दर जाना
ही है।
आज
माँगते-माँगते बहुत दूर निकल आया हूँ । मन ने कुछ मना किया था,
क्योंकि वह पराये देश में आने से झिझक रहा था। लेकिन जब शरीर
चल पड़ा तो मन भी मान गया । अब जहाँ आ गया हूँ उसके नाम को
लेकर क्या कीजिएगा। जगह अच्छी लग रही है। हालाँकि अतिथि भवन के
जिस कमरे में टिकाया गया हूँ, वहाँ के स्पंज के गद्दे से पीठ
बेहद दुखने लगती है। मैं तख्त पर लेटने का आदी हूँ । गुलगुले
स्पंज पर नींद नहीं आती । रात्रि में अँधेरा करके जमीन पर ही
लेट जाता हूँ । सुबह बहुत तड़के उठता हूँ कि कोई देख कर यह न
कहे कि एकदम गंवार है। यह भी मुझे यंत्रणा ही लगती है। एक दिन
ऐसे ही बीत गया । लेकिन आज सुबह तड़के ही बुलबुल की चहक से
नींद खुल गयी । सामने खिड़की के
उस पार शीशे से सट कर बैजयंती के कई डंठल लहलहा रहे थे ।
दो-तीन दिन में वह गुच्छ की गुच्छ फूली हुई थी। अगल-बगल
बेगन-बेलिया की एक लाल और एक पीले रंग की लता है। बुलबुल कभी
बेगन-बेलिया की इस शाखा पर जाती थी और कभी
उस शाखा पर । एक क्षण के लिए महकती हुई वह वैजयंती पर भी बैठ
जाती थी। उसके फुर्र से उड़ जाने पर तन्वंगी बैजयंती थरथराने
लगती थी। जब वह फुदक कर बैठ जाती थी तो बेजयंती का दहकता हुआ
विकच यौवन बुलबुल की उत्तेजना को जैसे सँभाल नहीं पाता था।
सूरज निकलने में देर थी, उजाला हो चला था । अभी यह दृश्य
खिड़की के दो पर्दों के बीच से देख रहा था। मैंने उठकर पर्दों
को समेट दिया । लेकिन बुलबुल मेरी आहट पाकर उड़ गयी । मेरे
सामने सिर्फ थर- थराती हुई बैजयंती और हवा के झोंके में झूमते
हुए बेगन-बेलिया के गुच्छे रह गए। दहकते हुए लाल-लाल, पीले-पीले
गुच्छ के गुच्छ सुमन थे । मैं बेचैनी से बाहर आकर टहलने लगा ।
लालपीले कनेर और अढ़उल के कुंजों के बीच-बीच में कराने से
लगायी हुई रजनी-गंधा शरद के प्रथम चरण में ही खूब गदराई थी
। कनेर झकाझक फूले थे । अढ़उल को किरणों की ऊष्मा की प्रतीक्षा
थी, लेकिन रजनीगंधा ने तो जैसे अब तक पूरे वातावरण को अपने
गंध-पाश में
बाँध रखा था ।
कभी मैं इसी तरह के गंध-पाश में
बँध गया था । चारों तरफ उसी रजनीगंधा की तीखी गंध मुझे बैचेन
करती रहती थी । नीचे से ऊपर
तक वह भी गदराई थी। लोग मुझे पागल समझते थे, लेकिन मैं जानता
था कि यह मेरी प्राणधारा है। गंध का वह अविराम प्रवाह मेरी
जिजीविषा बन गया था । लेकिन जिंदगी के जबरदस्त बर्फिले थपेड़ों
में रजनीगंधा की गंध ही नहीं, उसका बोध भी समाप्त हो गया ।
लेकिन इस पराये देश में फिर गदराई हुई रजनीगंधा अपने गंध-पाश
में बाँधना चाहती है। मैं इतना नीरस भी नहीं हूँ कि इसे
अस्वीकार कर दूँ ।
बधूँगा जरूर लेकिन नये तरीके से । सुबह
बुलबुल की तरह चहकते हुए कुछ बच्चे भी इसी तरफ दौड़े आ रहे
हैं। शायद वे खेलने के लिए निकले हैं। वे तितली पकड़ना
चाहेंगे, मैं उनके लिए पकड़ लूँ तो दोस्ती हो सकती है। वे
गेंद खेलना
चाहते हैं तो उनकी खोई हुई गेंद को खोज दूँ । और
तमाम तरीके हैं, जिनसे मैं उनमें तुरंत घुल-मिल जाऊँगा । फिर
रजनी-गंधा की नशीली गंध में ऐसा माधुर्य घुल जायेगा जैसे
रजनीगंधा के अगल-बगल
लाल-पीले कनेर, अढ़उल के फूलों के
कारण आ गया है।
इन लड़कों को भी तो मेरे लड़कों की तरह कुछ
चाहिए । इनके माँ-बाप भी तो शायद मेरी तरह इनके लिए दर-ब-दर की
खाक छान रहे होंगे । इन बच्चों से तादात्म्य कर लेने पर मन
आईने की तरह साफ हो जाता है
। कहीं कोई भी कुंठा और कोई भी पश्चात्ताप नहीं । दर-ब-दर के
पड़ाव को मधुचर्या मानकर मतलब भर का रस ग्रहण कर लेने पर जीवन
अत्यन्त सुखद बन जाता है, अनपहचाने भी पहचाने और पराये भी अपने
लगने लगते हैं। हम सिर्फ अपने में ही अपने को न तलाशें । दूसरों में अपने को पाने की
कोशिश करें । सच्चे जनतंत्र और सच्चे समाजवाद का यह ककहरा है।
जब व्यक्ति ऐसी चेष्टा करने लगता है तो लेकतंत्र या समाजवाद
उसकी जीवन-पद्धति बन जाता है। वह अपने दुखड़ों और अपने पचड़ों
को भूलकर दूसरों के जीवन में रस लेने लगता है। अपने समान सारे
प्राणियों को देखना आगे का एक और कदम है। फिलहाल वहाँ तक जाने
की बहुत जरूरत भी नहीं है। पहले एक मानव दूसरे मानव के प्रति
समानुभूति उत्पन्न करे । मैं दर-ब-दर भटकता हुआ यही करने की
कोशिश कर रहा हूँ । मैं दावा नहीं करता कि इसमें सफल ही हो
जाऊँगा, लेकिन अगर विफल भी हुआ तो कुछ रास्ता तो तय ही कर
लूँगा । इस प्रक्रिया में भटकाव भी मधुचर्या ही लगेगा । यह एक
विचार था जो अब बोध बन गया है। जिस दिन यह बोध सम्पूर्ण जीवन
बन जायेगा शायद उस दिन रहीम के कवि-मन को मैं ठीक-ठीक समझने
लगूँगा । उसी दिन मन भी तृप्त हो जायेगा ।

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