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।। जड़ें ।।
जड़ें चमक रही हैं
ढेले खुश
घास को पता है
चीटियों के प्रजनन का समय
क़रीब आ रहा है

दिन-भर की तपिश के बाद
ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम
आटा
एक बूढ़े आदमी के कंधे पर
बैठकर
लौट रहा है घर
मटमैलापन अब भी
जूझ रहा है
कि पृथ्वी के विनाश की
ख़बरों के ख़िलाफ़
अपने होने की सारी ताक़त
के साथ
सटा रहे पृथ्वी से ।
केदारनाथ सिंह
।। झरा दूध अभी ।।
कोठा है प्राचीन काठ के संदूक में जीवित
मानो पेड़ की देह में हरी रस भरी साँस लेता
उससे टिकाकर पीठ पर बैठी एक लड़की
पुरानी साड़ी की तहों में डूबती कि
अबंधी साड़ी में ख़ुद को दादी की जगह निहारती
कनस्तर में रखे गर्म आटे की सुंगध
कच्चे गेहूँ की बालियों को चूमता किसान

एक कसे हुए जिस्म में हँसता अधेड़
कि पढ़ा जाता उसने तूतनखानम के कद्दावर अर्दली का क़िस्सा
एक डेढ़ेक साल का बच्चा मचलता पेड़ से लटकते झूले पर
कि तगाड़ी उठाती माँ के स्तनों से झरा दूध अभी
थोड़े नजीक में एक और तैयार होता लड़का
ताँगे में घोड़े की रास थामे पुकारता अब्बू को
कितनी तहों के नीचे अंधेरों में डूबी रोशनी
रोज़ की टूट-फूट में बचा कितना कुछ
ध्वंस के मुहाने पर कमाल कितना
एक परिंदा फूल-सी हँसी लिए डोल रहा
लीलाधर मंडलोई
।। शासक होने की इच्छा ।।
वहाँ एक पेड़ था
उस पर कुछ परिंदे रहते थे
पेड़ उनकी आदत बन चुका था
फिर एक दिन जब परिंदे
आसमान नापकर लौटे
तो पेड़ वहाँ नहीं था

फिर एक दिन परिंदों को एक
दरवाजा दिखा
परिंदे उस दरवाजे से
आने-जाने लगे
फिर एक दिन परिंदों को एक
मेज दिखी
परिंदे उस मेज पर बैठकर
सुस्ताने लगे
फिर परिंदों को एक दिन एक
कुर्सी दिखी
परिंदे कुर्सी पर बैठे
तो उन्हें तरह-तरह के
दिवास्वप्न दिखने लगे
और एक दिन उनमें
शासक बनने की
इच्छा जगने लगी !
राजेश जोशी
।। जोकर ।।
सबसे पहले किसे
जलील करते हैं जोकर
?
ख़ुद को
उसके बाद किसे
जलील करते हैं ?
समाजियों और नर्तकों को ।

और उसके बाद
?
उसके बाद
बहुत आक्रामक हो जाती है
जोकर मुद्रा
वे हँसते हुए उतार लेते
हैं
देवताओं के कपड़े
जो जानते हैं अश्लीलता की
ताकत
और समाज में
उसे सिद्ध करने की कला
सिर्फ जोकर नहीं होते ।
निलय उपाध्याय
।।
अकुलाहट
।।
मैं
जानता
था
मेरी
अकुलाहट
किसी
दिन
ज़रूर
रंग लायेगी
शब्दों में गुंथ
कर
पन्नों पर उतर आयेगी
हर
क्षण
हर
पल
ह्रदय के द्वार पर
जो
आहट सी
होती
थी
मेरे
आसपास की वेदना को
चेतना में पिरोती थी
मेरी
रचना तो
इसी
समाज़
की धाती है
यह
मेरे नहीं
समाज़
के गीत गाती है
इसमें त्रस्त
अनुभूतियों का
सारांश है
यह
सहनशीला धरती नहीं
आक्रोश की ज्वाला
से
तपता
आकाश है !
डा0
अनिल चड्डा
।। मैं ज़िंदगी हूँ ।।
मैं लाश नहीं हूँ
जो तैरता रहूँ ऊपर ही ऊपर ही पानी पर
मैं ज़िंदगी हूँ
अतल गहराईयों में जाऊँगा

सीप से मोती निकाल लाऊँगा
मैं तिनका नहीं हूँ
जो उलझ जाऊँ किसी चोर की दाढ़ी में
मैं गरीब की बीड़ी का लुक हूँ
हवाओं में उडूँगा
शोषकों की बस्ती में
आग लगाऊँगा
सुधीर
समग्र
।। शायद प्यार के कारण ।।
क्यों करता है मन
हरदम किसी की आशा
क्यों चाहता है दिल
हरदम किसी को पास
क्यों एकाएक
कोई चेहरा
अच्छा लगता है
क्यों एकाएक
कोई दिल
सच्चा लगने लगता है
क्यों उतर जाता है कोई
दिल की गहराइयों में
क्यों कूकती है कोयल
मन की अमराईयों में
क्यों लगता है कि किसी पर
अपना सारा मन उडेल दूँ
किसी पर
सारा जहान बिखेर दूँ
गोपाल
अग्रवाल

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