|
माह के कवि |
|
डॉ.
देवी प्रसाद वर्मा
|
।। बनफूल ।।
घनघोर जंगल
जंगल के भीतर जंगल
जहाँ प्रवेश किरणों
का वर्जित है
धरती की छाती पर
अँधेरा चलता है
रोलर-सा
फिर भी
लो खिल आया
एक बनफूल उजाला-सा
चीर कर अँधेरे की
छाती को
गोया
बनफूल नहीं
मैं ही खिल गया हूँ
।
।। हौसला ।।
बीता
भर पंछी
और इत्ता बड़ा
आसमान
फिर भी
वह उड़ता है
उड़ता ही चला जाता
है
निस्सीम को नापने
उंगली-सी मछली
और
इतना बड़ा समन्दर
मीलों गहरा
पर मछली तैरती ही
रहती है
नाप लेने को सारा
विस्तार
और
अगम गहराई
आदमी
आज भी घुसा है
अपने घोंसले में
(वह)
न पंछी बन सका
न मछली ।
।। श्याम चिरय्या की गुँजाइश ।।
पुरइन के पत्तों से
सजे
तालाब में
आज भी खिलते हैं
फूल
कमल के
मेरे गाँव में
भौंरे
आज भी मँडराते हैं
कमल पर
और पत्तों पर
फुदकती है
श्याम चिरय्या
कत्थक की तरह
यह शहर
जहाँ बिछी हैं
सड़कें
कोलतार की
कीमती पोशाकों की
भीड़
जिसके भीतर
बहते हैं गंदे नाले
हर आदमी
किसी न किसी कीचड़
में धंसा है
अपने ही बनाये नर्क
में बसा है
यहाँ कभी भी
खिल नहीं सकता
कोई भी कमल
या पुरइन का पत्ता
जो कीचड़ में जनमते
हैं
फिर स्वच्छ और
निर्मल हैं
यहाँ
किसी भी श्याम
चिरय्या की गुंजाइश नहीं है ।
।। इसके बावजूद ।।
हर
युग में
कोई न कोई ईसा
चढ़ता है सूली पर
सुकरात ज़हर पीता है
और गाँधी खाता है गोली
अपने सीने पर
लेकिन
बच्चे आइन्सटाइन के
बनाते ही जाते हैं सूली
ज़हर और गोलियाँ
और बम
इसके बावजूद
जन्म लेते ही रहते हैं
ईसा, सुकरात और गाँधी
यह धरती
विनाश के बाद भी
मरती नहीं है ।
।। पतंग ।।
रात
कट गयी पतंग की तरह
और जाने किस दिशा में उड़ गयी
हवा के तेज झोकों ने
ओझल कर दिया
मुझसे
मेरे स्वप्न
जो
उसके साथ अलपिन से जुड़े थे
और अब निःस्वप्न होकर मैं
अपनी साँस का मंजा
लपेटे जा रहा हूँ
चकरी बन गया है जीवन ।
।। महुआ की सुंगध ।।
चाँदनी रात
आहत अधकटा जंगल
वीरान सुनसान
खड़ा है बूढ़ा महुआ
का पेड़
जो टप टप टप टपका
रहा है
महुआ
हवा बगराती है
उसकी मदमाती गंध
लो, नाच-नाच कर
किरणें सूरज की
उछालती हैं महुआ की
सुंगध
सब कुछ डूब गया
पाकर सूर्योदय से
महुआ की सुंगध ।
