गेट
पर खटिया पर पड़ा चौकीदार थका ऊंघ रहा था।
पास ने कमरे में
उसका परिवार घरेलू काम में व्यस्त था। पल को रुक देखा था
चारों ओर ऊँची दीवारें, ऊपर काँच के टुकड़े और कांटेदार
तारें लगीं । बीच में बनी स्कूल की इमारत-पौधों, गमलों से
घिरी । एक ओर बैडमिंटन का कोर्ट । दो शिफ्टों में चलने
वाला स्कूल दिन-भर स्वरों, पदचापों से भरा रहता होगा। इस
समय सन्नाटा छाया था। दूर वृक्ष पर चिड़ियां शोर मचा रही
थीं । आगे बढ़ी तो एक क्लास की अधखुली खिड़की से
डेस्क-कुर्सी, व्लैकबोर्ड झाकते-से लगे।
“आओ
दीदी....तुम लपककर बाहर निकलीं....माँ कल आयी थीं, मैं
प्रतीक्षा कर रही थी, मुझे मालूम था तुम आज ही आओगी ।”
खिली रात रानी
की महक चारों ओर फैल रही थी।
“ सब
कैसे हैं, अकेले ही आयी हो ।”
“सब ठीक
हैं, सोचा दो-चार दिन रह आऊं माँ का भी बड़ा उदासी भरा
पत्र आया था।”
“अच्छा
किया, यह माली की पोती है, शाम को यहीं बैठ पढ़ लेती है,
रात को यहीं सो जाती है।”
मुझे अभी भी
बाहर का सूनापन घेरे था।
“भय
नहीं लगता
?”
“बंबई
की हलचल की आदी हो न । तुम्हें तो अच्छा-खासा शहर भी ऐसा
लगता होगा जैसे हड़ताल हो गयी हो । जा रधिया, दादी को भेज
दे।”
“दीदी
साथ के क्वार्टर में बाबू रहते हैं, उनके
बड़े तूफानी दो
लड़के हैं
– छुट्टी
पर गये हैं, नहीं तो तुम क्या बात कर पातीं - चपरासी, माली,
चौकीदार सभी रहते हैं अंदर ।”
“चाय
बना दूँ” - मालिक
तभी आ गयी ।
“दूध
देख ले पहले - शाम को भी एक बार उबाल पानी में रख दिया था।”
“भयंकर
गर्मी है, यहाँ दूध का फट जाना
बड़ा स्वाभाविक है।”
मैंने कहा ।
“दीदी,
तुम्हें ग्राउंड में चलते डर लगा क्या....हल्की थीं तुम
खुलकर बात कर रही थीं ।”
“विशेष
नहीं, सुना तो है। फिर अकेले...मुझे अकेला देख घबराओ नहीं,
अब क्या हम छोटी हैं, जो अकेली नहीं रह सकती ।”
“शायद
सदियों से रोपे मध्यवर्गीय संस्कार हैं, जिनसे हम मुक्त
नहीं हो पाते ।”
“वे
संस्कार दीदी, जोंक से चिपके खून पी रहे थे। मैं अब तक
दूसरों के लिये निर्णयों के अनुसार चलती रही। यह कहाँ का
न्याय है तुम्हीं कहो - अपनी इच्छा कुछ भी नहीं । अब अपनी
तरह जीने का, अकेले रहने का निर्णय मेरा है, अब हमेशा मैं
अपने निर्णय स्वयं लूंगी।”
चाय दे मालिन
ने पूछा,
“गांकड़
सेक रही हूँ, आटा ले जाऊँ, तुम्हें भाती है न...”
“दीदी
को भी अच्छी लगती है, चार गांकड़ सेक ला, दाल चला लेंगे।”
“मैं
तुम्हें वापस लौटने का कह नहीं पायी थी, कहना बचकाना लगता।
तुमने स्पष्ट ही तो कह दिया दूसरों के निर्णयों के अनुसार
अब न चलूंगी।”
“उस रात
तुम्हारे पास से लौटी तो माँ उत्सुक लगीं कुछ जानने को..वे
शायद कुछ विशेष जानना चाहती थीं।”
मैंने कहा - “कितनी
गर्मी है...उफ...आँगन में बिछे मच्छरदानी लगे खटियों में
मुझे मालूम है मेरी खटिया माँ के साथ वाली होगी - “हाथ-मुँह
धो कपड़े बदल मैं मच्छरदानी में घुमने लगी - तभी माँ बोली-
कुढ़-कुढ़कर
शरीर का सत्यानाश कर लिया । बोली कुछ । वैसे खुश है,
हल्की है, तनाव दिखा भी नहीं । सो जा, तुझे ट्रेन में कहाँ
नींद आती है, रात-भर की जागी होगी।
- हाँ माँ ।
मच्छरदानी में घुस मैंने चारों ओर से मच्छरदानी को गद्दे
के नीचे दबा लिया फिर भी एक-दो मच्छर संगीत सुनाने लगे।
उमस में नींद
कहाँ - खुला आकाश - चंद्रहीन पर तारों भरा । पड़ी देखती
रही - बचपन यहीं बीता है, मालूम है आधी रात के बाद उमस कम
होगी तब नींद आ पायेंगी । तभी फिर तुम्हारी काया आँखों में
आ गयी । बहुत पीछे जाऊँ तुम्हारा बचपन, तुम्हारी
किशोरावस्था । तुम आम लड़कियों से अलग रहीं । पढ़ लिये
“शादी...बच्चे.....तुम
समाज द्वारा निर्धारित लड़कियों के इस भविष्य का विद्रोह
करती थीं।
नारी समाज में
एक स्वतंत्र व्यक्तित्व ले क्यों नहीं रह सकती । यदि वह
शादी न कर कुछ और जीवन में करना चाहे तो क्यों रोका जाता
है। अविवाहित को लेकर समाज संदेह क्यों करता है। बताओं
दीदी.....
स्वावलंबी जीने
को इच्छुक थीं तुम, खूब पढ़ाई की तुमने । कई विषयों में
एम.ए., लॉ., पी.एच.डी. कर तुम छोटी उम्र में नये खुले कॉलेज
की प्रिंसिपल बन गयीं । तुम्हारे सामने थी गुमराह हो रही
पीढ़ी ....अपनी भाषा संस्कृति, धर्म से टूटती हुई । तुम
लड़कियों को कल के अच्छे समाज के निर्माण की नींव कहतीं
यदि - ये किशोरियाँ अपना कर्तव्य - माँ - बहन, पुत्री, सास के
रूप में समझ लें । तुम कई परिवारों को मिलतीं, चिंतन-मनन
से कुछ नियम निर्धारित करतीं, तुम सफलता, असफलता का नहीं
सोचतीं।
तुम्हारा
अधिकांश समय समर्पित रहा कॉलेज के लिए । आज भी है। तुम अपने
को समाज सुधारक नहीं मानतीं न
उपदेश देने की आदी हो । तुम
उनमें की एक व्यक्ति
बन उनके साथ-साथ चलना चाहती हो । अपने
कुछ नियम रख, कठोरता से पालन न करवा वे स्वयं समझकर अपने
निर्णय लें ऐसी पृष्ठभूमि तैयार कर देती हो । अंधविश्वास,
कुरीतियाँ, दहेज न दे सकने के परिणाम से जुड़ी घटनाओं की
खबरें बोर्ड पर लगवा बाद-विवाद प्रति-योगिता रख। अच्छे
समाज के निर्माण में स्त्री के महत्त्व पर निबंध लिखवा
उनके विचार जान लेना चाहती हो। लड़कियाँ स्वयं दहेज के
विरुद्ध खड़ी हों, छूआछूत जैसे धब्बे को पोंछे तुम यही
चाहती रहीं।
तुमने चाहा
विवाह एक स्वच्छ निर्मल जीवन जीने का पवित्र समझैता हो ।
आपस में दुःख-सुख बांटने की ललक हो दोनों में, दहेज को
लेकर कोई लड़की जलायी न जावे । तुमने भरसक प्यार विश्वास
दिया विद्यार्थियों को । अपनी साथी अध्यापिकाओं को कभी नहीं
चाहा वे तुम्हें प्रधान मान कर दूरी रखें । हर समस्या
सह-अध्यापिकाओं के सामने रख सबके सहयोग से सुलझाती रहीं।
लेकिन सब खुराफात की जड़ है शैतान जो आदर्शों के विरुद्ध
खड़े होते हैं । पीढ़ी की लतर सही दिशा की तरफ नहीं
बढ़ती.... तुम्हारा प्रयत्न नारी उत्थान का मजाक बना दिया
जाता - आंशिक सफलता से तुम संतुष्ट नहीं हुई
– समाज
से, सरकार से सम्मान पा भी तुम्हें लगा कुछ नहीं हो पा रहा
।
घर में भी तुम
आज की पीढ़ी से टकरा रही हो - दो छोटे भाई और उनकी पत्नियाँ
। कॉलेज और घर-दोनों ही युद्धभूमि हैं तुम्हारे लिए। यह
भी मैं मानती हूँ तुम्हारा कुढ़ना,झूंझलाना किसी सीमा तक
ठीक है। इन भाईयों के लिए भी क्या न
किया - संगत बदली,
होस्टल बदले -
पर ये पढ़ाई के वक्त लड़कियों के चक्कर में रहे। अधूरी
शिक्षा ले जिंदगी से जूझने निकले तो नशे के आदी
हो गये । इनकी पत्नियों को भी टोका न जाये तो कोई काम ठीक
से नहीं होता। वे मालकिन तो बनना चाहती हैं, पर जिम्मेदारी
स्वयं लेना नहीं चाहतीं । तुम्हें खल जाता है उनका
माता-पिता का अपमान करना - तुम पहले घर में उजाला लाना
चाहतीं थीं ताकि कहने वाले ये न कह सकें - दिया तले अंधेरा।
बाहर समाज को सुधार रही है और घर में....पर तुम्हारे सभी
प्रयास निष्फल रहे, मनोविज्ञान के हर तरीके विफल
हुए ।
यहीं से
रिश्तों के बीच खाइयाँ बननी शुरू हुईं । समय टिकटिक
करता....पल-से-पल जुड़ता लंबा होता जा रहा है । इस दौरान
तुम्हारा बदलता स्वभाव शायद निराशा तुम्हें कठोर बनाती जा
रही थी । रूखा पन स्थायी होने लगा था - चेहरे पर क्रोध का
साया फैलता, सिकुड़ता रहता, लगता ओठ भिंच जाते थे, दांत
कटकटा जाते थे, कुछ वर्षों से तना चेहरा देखते मैं भूल ही
गयी इस चेहरे पर उन्मुक्त हँसी बिखरी रहती थी । शरीर अशक्त
हो रहा है उम्र से नहीं जिंदगी से जूझते, उम्र से जिंदगी
की लंबाई नहीं नापी जा सकती । फिर भी तुम्हारा साहस सराहनीय
है लड़ाई लड़ती जा रही हो....हर क्षण....
घर...कॉलेज....पड़ोस...देश....की युवा पीढ़ी से.....युवा
पीढ़ी तुम्हारे पुतले को कई बार जला चुकी है फिर भी
तुम्हारे अंदर अंधेरे कोने में जुगनू-सा एक नये समाज का
बेहतर समाज का स्वप्न है - अपने को तूलिका बना बाहर के
कैनवास पर चित्रित करने का प्रयास आज भी जारी है। यही
तुम्हारी लड़ाई है - चलती रहेगी। तुम हथियार नहीं डालोगी ।
तुमसे मैं कहना चाहती थी - आज हवा ही पीढ़ी को बहका रही है।
छोटा शहर हो, महानगर हो, नगर हो युवा पीढ़ी उच्छृंखल,
बेचैन हो रही है। बंधनों को तोड़ने की प्रक्रिया में,
संस्कृति, आदर्श धर्म की अवहेलना में अपने जीवन की
सार्थकता देख रही
है । तुम्हें आरी
चलने-जैसी आवाज़ नहीं
आती - सिर.......स....र....र.... आज की पीढ़ी समाज की
कुरीतियों को नहीं चीर रही .....टुकड़े-टुकड़े कर रही है संयुक्त
परिवार - रिश्ते - सहृदयता, सहानुभूति, निस्वार्थ सेवाभाव रखने
वाले बलिष्ट वृक्ष की - तुमने कहा था।
मैंने सुना था
जैसे बूढ़े जानवरों को कसाइयों को काटने की अनुमति सरकार
से प्राप्त है, बूढ़ों को
भी मर जाने देना चाहिए या मार दिया जाना चाहिए, काम लायक जो न रहे । वे निःसंकोच कह देते
हैं - वे प्रैक्टिकल हैं - भावना में नहीं बहते ।
तुम्हारी कुढ़न
तुम्हें घुन की तरह
खा रही है तो होता है आँख मूंद लो,
सुधार छोड़ मस्त रहो...एक बार मैंने कहा था...तुम दो दिन
के लिए आती हो अनदेखा कर सकती हो । मैं प्रयत्न करती
रहूंगी - घर भी बाहर भी - दो-टूक जवाब दे दिया था तुमने।
माँ आदी हो गयी
या विवश हैं, खामोश बैठी रहती हैं। समय बीतता गया-
फिर देखा था जुड़े रहने के प्रयास तुम्हारे विफल हो रहे
हैं रिश्ते
हताश तुम तोड़ने लगीं । साथ स्वयं भी पुर्जा-पुर्जा टूटती
गयीं । दुःख गहरे जख्म बनते गये - खाई से गहरे - फिर टूटता
शरीर अनेक व्याधियों का शिकार होने लगा । कभी बिस्तार पकड़
लिया तब
?
तुममें वैसे
अजीब-सा आत्मविश्वास है-आत्मबल है - तुम पीढ़ी का भविष्य
सुधारना चाहती हो पर अपना कल कभी नहीं सोचती, क्यों
?
“सोयी
नहीं क्या.....?”
“नींद
नहीं आ रही।”?
“कुछ
बोली क्या
?”
“नहीं
तो, आज तो लगा चहक वापस आ रही है -
कॉलेज में एक बड़ा ग्रुप लड़कियों का बन रहा है जो दहेज का विरोध करेगा- इसी तरह की
चर्चा कर रही थी नीता।”
“अच्छा,
तुम जरूर उसी का सोच रही हो ओगी - अब हिलीं, वृक्ष की
फुनगियाँ हवा चल जायेंगी - कुछ ठंडक हो जायेगी ।”
माँ ने फिर करवट बदल ली - मैं टूटी लड़ी को फिर जोड़ने लगी।
कुछ वर्षों से
जब भी तुम्हारे साथ रहकर लौटती थी अजीब-सा भय, गहरी
उदासी मुझे घेर लेती थी -तुम्हारे स्मरण मात्र से ।
तुम्हारे भविष्य को लेकर चिता उभर आती थी मस्तिष्क में ।
भविष्य को लेकर सोचना
मूर्खंता है न - हास्यास्पद भी - मैं अपने
भविष्य का क्यों नहीं सोचती - स्वस्थ पति-बच्चों के कारण
अपना भविष्य सुरक्षित समझती हूँ क्या
?
तुम्हारे ही भविष्य में काली परछाइयाँ क्यों देखने लगती
थी। किसी का भी भविष्य अंधकारमय हो सकता है। तुम्हारे बारे
में शायद इसलिए सोचने लगती थी - तुम एकाकी हो-माँ-बाप,
भाई-बहन के बीच रहती भी अकेली । क्या गृहस्थी में भी
अकेलापन नहीं घुस आता । कभी स्त्री, कभी पुरुष कभी
दोनों...परिवार से घिरे भी अकेले नहीं जीते क्या
? फिर
विवाह के झमेले की क्या जरूरत थी।
कई बार तुम्हारी स्मृति आते ही अनजाने ही कुछ व्यक्ति, कुछ
घटनाएं आँखों में उभर आती थीं - कुमारी गुप्ता - सरकारी
अस्पताल के जनरल वार्ड में कृशकाय-सी पड़ी थीं । पक्षाघात
के बाद उठने-बैठने में असमर्थ बड़ी-बड़ी आँखों में आँसू
ढुलक अये थे । तुम भी साथ थीं - हम दोनों ही कितनी विचलित हो
गयी थीं । कोई बना बेटा । अपने ही अपने नहीं बनते, पराये
की बात ही छोड़ो - बहनजी, कैसी लावारिस-सी पड़ी हैं । खटिये
पर पड़ा शरीर जख्मों से भर गया है - कोई देखने नहीं आता ।
मुझे पढ़ाया था इन्होंने-नर्स बोली थी, गला भर गया था उसका
।
कुछ दिन बाद
सरकारी अस्पतान के एक सर्द, खामोश कोने में मिस गुप्ता
अकेली कराहती मर गयी थी । हम गये थे, अस्पताल पर एक उदासी
छायी थी । नर्सों के चेहरे मौत-जिंदगी को रोजाना लड़ाई
देखने के बावजूद उदास थे। उस लावारिस के लिए अस्पताल क्यों
उदास था । उसके त्याग- भरे जीवन से सब परिचित थे । उसी शहर
की जन्मी पली शिक्षिका थी । पिता की असमय हुई मृत्यु ने
नौकरी करते रहने पर मजबूर किया - जाने कितनी विद्यार्थिनियाँ
यहाँ होंगी या उनके पालक होंगे ।
तुम्हें अच्छा
लगा था सबका कुमारी गुप्ता को सम्मान देना ।
मृत्यु के
समाचार से नकली मुखौटा
लगाये - रोता-चीखता परिवार इकट्ठा हो गया था । अंत्येष्टि
के तुरंत बाद प्रोह्वीडेंट फंड,
इंश्योरेंस, बैंक अकाउंट के लिए परिवार में झगड़ा हो गया था
। जिस परिस्थिति में वे पड़ी थें, पैसे का उपयोग न कर
पायीं । सुध तो थी पर लिखने-बोलने में असमर्थ थी इसका
फायदा सबने उठाया । कितना थोथा लगता है न यह विचार कि पैसा
हो तो नौकर रखकर सेवा करवा लेंगे- जब अनेकों घटनाएं,
नौकरों द्वारा खून की पढ़ते हैं । तब क्या पैसा व्यर्थ है -
फिर घूम-फिरकर वही धन की तुलना में कोई मनुष्य रिश्ता कोई
भी हो- या विदेशों की तरह वृद्ध आश्रम जगह-जगह बन जाये-
जहाँ वृद्धों से दुःख-सुख बाँटते-आयु समाप्त हो जाये। यह
भी कोई जरुरी तो नहीं कि तुम-वृद्धावस्था तक पहूँचो या मैं
पहुँचूं - चलते-फिरते भी तो जा सकते हैं - आज के तनावपूर्ण
जीवन के लिए अचूक रामबाण है हृदयगति रुकना । जाने वाले के
लिए कितना अच्छा है। पीछेवालों के लिए भी - महीनों से रोगी
ससुर की सेवा करती तंग पड़ोसी बहू बोली थी।
वह तनाव भरा
कालखंड विशाल मरुस्थल में तपती दोपहर-सा था। तुम्हें
कंटीली बबूल की छाँव-सा सुख मिलने लगा था। जब गेट खोल - गली
की धूल में भागते दो पैर, दो फैले हाथ, बूजी...बूजी
...कहते लिपट जाते । तुम ममता से भरी उठाकर कलेजे से लगा
लेती- बोलो बुआजी....
बू.....जी...... तुम फिर खुलकर हँस पड़ती थी -
तनाव से कुछ क्षण ही सही, तुम मुक्त लगती थीं।
तुमाले छात
छोयेंगे....दोनों भाइयों के तीनों बच्चे इकट्ठे हो जाते,
तुम साथ सुलाती....लोरी गातीं...जन्मदिन मनाती....उन्हें
किसी को डाँटने के देतीं। शायद सोचती होगी नवजात पीढ़ी को
अपने आदर्शानुसार ढाल सको । कई बार कहती भी तो थीं कॉलेज
छोड़ देती हूँ-छोटे बच्चों के लिए स्कूल खोल लेती हूँ ।
कितना निर्मल है बच्चों का मन-मस्तिष्क यह क्षणिक सुख
स्थायी कहाँ रहेगा।
मुझे आज भी याद
है - दो दशक पूर्व - दोनों छोटे भाई दीदी आयी....दीदी आयी कहते
इसी धूलभरी गली में लिपट जाते थे। तुम भाव-विह्वल उठा लेती
थीं। उनके प्रति स्नेह था, इनके प्रति ममता । धरती घूमती
रहती है, पीढ़ी के आगे दूसरी पीढ़ी चलती आती है। ये पल-दो
पल के क्षणिक सुख बुलबुले-से टूट जाते हैं। लड़खड़ते कदमों
का पास से गुजर जाना, घृणा आक्रोश से भरी अबहेलना
करनेवाली आँखों का टकरा जाना । तुम्हारे ममतामयी हृदय में
आक्रोश का भर जाना....फिर वही पीड़ा ....वही तनाव....
तुम्हारा माँ
से जूझ जाना - अब ये न सुधरेंगे, अलग कर दो इन्हें।
माँ का खामोशी
न तोड़ना....और भी बूझ जाना जिसके सभी पुत्र निकम्मे निकल
जायें ...उसके स्वर कहाँ से फूटें । खिड़की से लड़खड़ाते
शब्द ...सूखे पत्ते से निकले...हाँ कर दो अलग....हमें
हमारा हिस्सा दे दो....हिस्सा...घर-जमीन में क्या जोड़ा
है तुमने ....जो कुछ बाबूजी ने बनाया वही तो है....सत्तर
वर्ष की आयु में आज भी खटते हैं। तुम लोग हर शाम उनके नाम
कर्ज छोड़ आते हो । वे तुम्हारा कर्ज
चुकाते-चुकाते अब थक
गये हैं। अपने बच्चों की सोचो । पच्चीस-तीस के हो रहे हो
कुछ तो जिम्मेदारी समझो। ये जो कुछ बाबूजी ने कड़ी मेहनत
से बनाया है न, सभी शराब की दूकान पर पहुँचा दोगे....
“घर
क्या तुम चला रही हो, हम पाल सकते हैं अपने बच्चे।”
“घर
बूढ़ा व्यक्ति चला रहा है जिसे अब आराम की जरूरत है। तुम
पाल सकते हो तो ले जाओ-यहाँ से पाने की अपेक्षा क्यों करते
हो - तुम निकल जाओ नहीं तो मैं चली जाऊंगी। मैं अब सह नही
पाती बाबूजी का दिन-प्रतिदिन उतरता चेहरा - टूटता शरीर - निराश
आँखें।”
“इनको
कुछ नहीं दूँगा ... कहीं भी दान कर दूँगा”
–बाबूजू
बहुत गररी उदासी से घिरे बोले थे ।
मैं उस दिन चुप बैठी रही थी । कितने हताश लगे थे
–
बाबूजी...माँ....तुम
। कितना विवश आँसू भरी थीं माँ की । तब लगा था निःसंतान ऐसे भयंकर क्षणों का सामना कर ले तो
अवश्य ही अपने भाग्य को सराहे ।
छड़ी हाथ में लिये पुनीता
– आसपास
सुनीता - आकाश आ खड़ी हुई
– यह लो
बू...जी...मालो...पापा को...सुनीता दौड़कर पापा को हाथ
पकड़ खींच लायी...छोली...बोलो...छोली...आकाश मुँह बाये देख
रहा था।
किसी में कोई
परिवर्तन न देख छड़ीवाला हाथ बुआ के हाथ में थमा - दूसरे हाथ
को बुआ के हाथ पर रख - अपने पापा को दो छड़ी जमा दो
–बूजी
को तंग करते हो - बूजी गुच्छा थुक दो...ओ-फो - जल्दी
करो-सुनीता बोली, तभी तुमने दोनों को कलेजे से लगा लिया ।
इन मासूमों के लिए ही सुधर जाओ भैया...नन्हें-नन्हें
बुलबुलों को बड़ों की नकल करते देख सभी के मन हल्के हो गये
।
चलो हम अपने
कमरे में चलें...लो मुँह खोलो...
यूंही झूठमूठ
कुछ खाने को बुआ के मुँह में ठूंस दिया-तुम मुस्करा दीं।
काश समय थम
जाता - सबके चेहरों की हल्की मुस्कराहट हमेशा
बनी रहती,
वातावरण हल्का हो जाता ।
खीज जाती
है-माँ का अधूरा-सा बुदबुदाया वाक्य तुम्हें कचोट गया।
शादी नहीं की न -य ह भी जोड़ दो - तुम्हारे दिमाग में बस यही
आता है। मेरा खीजना, तनाव, पीड़ा, निराशा सब शादी न करने
का परिण&