रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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कहानी

लंबी लड़ाई- कमलेश बक्षी

मौन प्यार- अंजना सवि

 
 

मौन प्यार

अंजना सवि

 

            वह कैसा क्षण था कि हम बहक गए और आज कल्याणी को उल्टियाँ होने गलीं । उसे एक ही बात का डर था कि कहीं वह....।  उसका माथा चकरा गया । इतनी बड़ी घटना उसके साथ घट गई। वह सोचती हुई पुनः आकर लेट गई।अब इसमें विनय कितना दोषी है, आज ही विनय से बात करनी होगी। वह मुझसे शादी करे, किन्तु क्यों करे ? अरे ! प्यार करता है वो मुझसे, यह बात ठीक की दोनों ने कसमें-वादें किये थे कि जीवन एक साथ गुजारेंगे, किन्तु अपने परिवारों की सहमति के साथ । फिर अभी तो घरवालों से बात भी नहीं हुई है। क्या पता उसके या मेरे घरवाले माने भी या नहीं ?

 

            बहुत देर तक वह इसी उधेड़बुन में लगी रही कि कैसे इस समस्या से निपटे ? हालांकि परिस्थितियाँ अनुकूल होतीं, तो यह क्षण वह अपनी मधुर स्मृति में हमेशा कैद कर लेती, किन्तु आज यह बात उसे चिंतित कर रही है, लग रहा है किसी बड़े जाल में फँस गई है। सोच-सोच कर उसके दिमाग की नसें चटकने लगीं। अब पलंग पर लेट पाना मुश्किल था, वह टहलने लगी। अक्सर वह अपनी समस्या से तीन-चार दिन जूझती है, तब ही वह नतीजे पर पहुँचती है, इसके पहले न तो वह अपनी समस्या किसी को बता पाती है और न ही सलाह लेने की स्थिति में रहती है।

 

            कल्याणी यहाँ लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर के पद पर कार्यरत है, वहीं विनय भी सिंचाई विभाग में एस.डी.ओ. है। दोनों की दोस्ती काम के सिलसिले में हुई और वे धीरे-धीरे एक दूसरे के अंतरंग हो गये । विनय हमेशा ही विश्वास दिलाता रहा है कि वह शादी उसी से करेगा, कल्याणी भी लगभग विनय की तरह ही सोचकर चल रही थी कि एक दिन दोनों अपनी सीमाएँ पार कर गए, हालांकि कल्याणी को अफसोस हुआ, किन्तु उसने अपने को भी उतना ही दोषी माना और बात सामान्य हो गई, विनय उसके बाद और भी नजदीक आ गया था, वह हरदम कल्याणी का ध्यान रखता मानों काँच का खिलौना हो जो जरा से धक्के से टूटकर चूर-चूर हो जाएगा ।

 

            कल्याणी भी अपने प्यार पर रश्क करती। सोचती कितनी किस्मत वाली है, जो विनय जैसा अच्छा इंसान उसे पसंद करता है। उस व्यक्ति को इतना बड़ा झटका कैसे दे कि उसकी गलती का नतीजा क्या निकला है ? चार दिन तक वह सोच-सोच बेहाल हो गई, फिर वह निर्णय पर पहुँची तब ऑफिस गई। वहाँ उसने अपने ट्रांसफर की अर्जी दी और घर आ गई। एक बार में उसका ट्रांसफर हो गया । उसने दूर के ऐसे स्थान को चुना था कि वहाँ कोई जाना नहीं चाहता और यदि, किसी का ट्रांसफर हो जाए वह जी तोड़ कोशिश कर रूकवाने में लग जाता है। ऐसे में किसी का ऐसी जगह पर ट्रांसफर तुरंत होता बड़ी बात नहीं थी। विनय ने काफी विरोध किया, किन्तु कल्याणी ने असमर्थता जता कर जाना जरूरी बता दिया ।

 

            विनय ने कल्याणी में आए बदलाव को देखा, किन्तु ट्रांसफर व उससे दूर जाने की वजह जानकर ही वह उसे संभावता रहा।

 

            निश्चित दिन आँखों में ढेरों आँसू व आंचल में अनगिनत वादें लेकर कल्याणी विदा हो ली। विनय की तो मानो दुनिया ही बीरानी हो गई थी। जैसे-तैसे दोनों रहना सीख गए। पत्रों के आदान-प्रदान के बाद कल्याणी ने अपना ट्रांसफर पुनः दूसरी जगह करा लिया। यहाँ का पता वह विनय को नहीं देना चाह रही थी। आठ माह हो गए थे और कल्याणी में बदलाव स्पष्ट नज़र आने गले। विनय ने कल्याणी के ऑफिस से पता लगा लिया कि किस स्थान पर कल्याणी का ट्रांसफर हुआ है।

 

            एक दिन सुबह सबेरे बेल बजी तो पलंग से उठकर अलसाई-सी कल्याणी ने दरवाजा खोला तो सामने विनय था, वह भौंचक्की रह गई। उसे देखकर विनय भी अचकचा गया । उसके कभी सोचा भी नहीं था कि इस हालत में कल्याणी से सामना होगा।

            अंदर आने को नहीं कहोगी

            कल्याणी न रास्ता छोड़ दिया।

 

            बहुत देर तक विनय यूँ ही गुमसुम बैठा रहा। कल्याणी भी दरवाजे पर ही खड़ी रह गई । पहुत देर बाद विनय उठा, कल्याणी के नजदीक जाकर दोनों कंधे थामकर सोफे पर बैठाया और खुद कल्याणी के कदमों में बैठकर गोद में सर रख दिया, कल्याणी की रूलाई फूट पड़ी। विनय ने उसे चुप नहीं कराया और न ही कोई सांत्वना दी, वो तो खुद कभी यह विश्वास नहीं कर सकता था कि कल्याणी का यह गुण उससे छुपा था जिसे वह पहचान नहीं पाया, मुझे तकलीफ न पहुँचे, इसके लिये कल्याणी स्वयं जूझती रही, इतना धैर्य तो शायद उसमें भी नहीं है। कुछ देर बाद कल्याणी बोली,

            आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे विनय ?’

            क्या बोलूँ मैं तो सुन रहा हूँ।

            क्या सुन रहे हो ?’

            तुम्हारे मौन प्यार की भाषा।

            विनय, मैं भी कुछ महसूस कर रही हूँ।

            क्या?’

            तुम्हारे विश्वास की गहरी पैठ को, बिना कुछ पूछे-जाने मुझ पर विश्वास कर लेने की समझदारी को।

 

            आने वाले इस नन्हे से मेरी बात हो गई । उसने मुझे पापा कहा है कहते हुए विनय न कल्याणी को बाँहों में भर लिया । यह दो प्रेमियों के बीच का वह अंतरंग क्षण होता है - जब दोनों के मन में कभी उमड़े-घुमड़े सारे सवाल लाजवाब हो जाते हैं और एक-दूसरे से कैफियत लेने का तो तब सवाल ही नहीं उठता।

 

 

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