रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

एक शब्द

 

पकड़

डॉ.गंगाप्रसाद बरसैया 

 

            मूल शब्द है पकड़ । इसी से अनेक मूहावरे और कहावतें बनी हैं । सबकी पकड़ अलग होती है -किसी की कमजोर और किसी मजबूत । किसी भागने वाले का हाथ मजबूती से पकड़ा जाता है ताकि छूटने न पाये । कभी-कभी जरूरतमंद और असहाय व्यक्ति का हाथ पकड़ कर उसे सहारा दिया जाता है। अच्छे व्यक्ति एक बार जिसका हाथ पकड़ लेते हैं, उसे छोड़ते नहीं । हाथ पकड़कर छोड़ना अच्छा नहीं माना जाता । यह किसी के साथ धोखा है। भागने वाले का हाथ पकड़ना और असहाय का हाथ पकड़ना एकदम अलग बातें हैं । कभी-कभी दीन-हीन व्यक्ति समर्थ के पाँव पकड़ता है, रक्षा की याचना करता है। कई अपराधी पुलिस या अधिकारी के पाँव पकड़ कर गिड़गिड़ाते हैं । भक्त लोग तो केवल भगवान के पाव पकड़ने में विश्वास करते हैं । कान भी पकड़ा जाता है। इसके भी दो रूप हैं - अपना कान पकड़ना और दूसरों के कान पकड़ना । कोई भूल होने पर पश्चाताप और दुबारा न करने के संकल्प के लिए हम स्वयं अपना कान पकड़ते हैं परन्तु जब कोई दूसरा बच्चा या विद्यार्थी कोई गलती या अशिष्टता करता है तो घर के बुजुर्ग या शिक्षक उसके कान पकड़कर दंडित करते हैं ताकि वह दुबारा वैसी गलती न करे ।

 

         जब कोई किसी से रुपया या सामान लेकर नहीं लौटाता तो देने वाला कहता है कि मैं गर्दन पकड़कर ले लूंगा - कहाँ तक छिपेगा । पेट में दर्द होने पर लोग पेट पकड़ते हैं और अधिक बीमार होने पर जब चल फिर नहीं पाते तो खाट पकड़ लेते हैं । खाट पकड़ना बड़ा दुखद होता । लोग कहते हैं- भगवान किसी को खाट न पकड़ायें । जब कोई जानवर दुर्बलता या बीमारी के कारण जमीन से उठ नहीं पाता तब कहा जाता है उसने तो धरती पकड़ ली अब बचने की कोई आशा नहीं। पुलिस चोरी पकड़ती है डाकू और डकैती पकड़ती है। पकड़ने के लिए तमाम चीजें हैं । कभी-कभी तो पुलिस इतनी सजग होती है कि अपराधियों को अपराध की योजना बनाते समय ही पकड़ लेती है और कभी वर्षों बीतने पर भी अपराधी पकड़ में नहीं आते ।

 

           कुछ लोग बात पकड़ते हैं और कुछ जबान पकड़ते हैं । कहते हैं तुमने अमुक समय ऐसा कहा था। यह पकड़ चूहा-बिल्ली की पकड़ या पुलिस की पकड़ से अलग है। कुछ लोग उंगली पकड़कर कलाई पकड़ने की चेष्टा करते हैं तब लोग पकड़-पकड़ कर उनकी अच्छी मरम्मत भी करते हैं । यों सबकी कलाई पकड़ना अपराध नहीं है। किसी के यहाँ धीरे-धीरे अनिष्ठता बढ़ाना पर भी इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है । इसी मुहावरे का दूसरा सहोदर है उनकी पकड़ भीतर तक है। कुछ उस्ताद लोग तो उड़ती चिड़िया पकड़ लेते हैं। आकाश मार्ग से उड़ते हनुमान को राक्षस ने परछाई से पकड़ लिया ता। झाड़-फूंक वाले चोटी पकड़ कर भूत भगा देते हैं । बदमाशों के लिए भी बड़े लोग कहते हैं अब उसकी चोटी पकड़ में आ गई । कहीं जा नहीं सकता। यह चोटी कोई सूत्र या सम्पर्क होता है, सिर का वाकई चोटी नहीं । चोटी सब लोग नहीं पकड़ सकते । कोई उपाय सूझने पर भी लोग प्रायः कहते हैं मंत्र पकड़ में आ गया अब काम हो जायेगा । अखाड़े में पहलवानों की भी पकड़ होती है। इस प्रकार की सटीक पकड़ के लिए भी ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है।

 

 

एक शब्द

मेरा विश्वास है कि चिंता जीवन का शत्रु है- शेक्सपियर

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com