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दो गीत
भ्रम
पाना हो यदि तुम्हें शिखर तो भूमि धरातल मत
देखो,
पाना हो यदि अगला कल तो बीता कल तुम मत देखो।
अद्भुत
सृष्टि हरीतिमा देखो,
वह शुष्क मरुस्थल मत देखो,
बनने की हो यदि राम चाह तो,
रावण का छल मत देखो।।
सघन-विरल का अंतर छोड़ो,
अपने दिवास्वप्न को
तोड़ो,
निंदकता को बहुत गा लिया,
अब कोई मृदु सरगम छेड़ो।
मोती
पाने के लालच में,
खाली सीप बहुत है जोड़े,
हर सीप में मोती मोती बन जाये
ऐसी स्वाति बूँद निचोड़े।।
संकोची कायरता नहीं अब साहस रूपी बल
देखो,
पाना हो यदि अगला कल तो बीता कल तुम मत देखो।।
मानव
का
जीवन तो यही है,
वही गलत है,
वही सही है।
पूर्ण-अर्ध
ये तो मन के भ्रम हैं,
युगों-युगों
से चाँद
वहीं है।।
माया के भ्रम को पहचानो,
उन्हें नयन से मत
देखो,
स्वर्ण में छिपा हुआ तुम सुंदर धवल रजत देखो।।
क्षरण
हास होता जा रहा आदमी हर प्रांगण में,
नित
बनाता जा रहा इतिहास नैतिकता के क्षरण में।
विद्या के आँगन भी इससे
अछूते हैं नहीं,
निःसंकोची से बन गये हैं दुष्कर्मों के वरण
में।
अर्थ के आधीन लगता है यह विद्या हो गयी है,
श्रम करके फल
पाने की इच्छा लगता है सो गयी है।
कमजोर प्रस्तर लग रहे हों,
जिस इमारत
के चरण में,
वक़्त थोड़ा ही बचा है,
उस इमारत के मरण में।
शीत
में कठोर हो जाते हैं पुतले मोम के
उनको पिघलना ही पड़ेगा ऊष्मा के आवरण
में।
मेघ बनकर उठ गया हो कितना ही ये नीर ऊपर
आना पड़ता है उसे
अंततः पृथ्वी की शरण में।
अनिल कुमार त्रिवेदी

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