दोहे
भले-भले से बोल
हैं, भली-भली मुस्कान ।
बड़े सलीकेदार
हैं, सिद्ध यहाँ शैतान ।।
ज्ञानी मूरख
हैं हुए, बलशाली लाचार ।
सिद्ध धनी
निर्धन हुए, अहंकार को धार ।।
कैसे दुबली हो
रही, इत गरीब की गैल ।
सिद्ध रोज
धनवान का, अँगना जाता फैल ।।
सिद्ध सबै दुख
भोगना, खास रहे या आम ।
ताज तजा तज
पादुका, वन-वन विचरा राम ।।
जो देखा उत्कोच
तो, उसने बदला सोच ।
सिद्ध जरा
हें-हें किया, परे किया संकोच ।।
देखा हमने
फूलता, मानस-फुग्गा-फूल ।
पलक झपकते
सिद्ध फिर, चाट रहे थे धूल ।।
ठाकुर दास
‘सिद्ध’
दो गीत
हम मानव हैं तिनके
ये संसार
महासागर है, हम मानव हैं तिनके
इधर-उधर से
बहकर आए, कौन यहाँ पर किनके ।
नदिया बनकर
बहते जाओ, सागर में पहुँचोगे
उठते जितने
ज्वार यहाँ पर, समझो हैं पल-छिन के ।
व्यर्थ गँवाया
सारा जीवन, झूठ कपट कर सबने
उसका मानव जन्म
सफल है, हृदय दया हो जिनके ।
नश्वर गोरा तन
तू पाया, माल खिला मस्त बना
इस तन का मत
करो भरोसा, कब मक्खियाँ भिनके ।
हर माँ का देखो
दूध श्वेत, खून सबका लाल है ।
आपस के झगड़े
हैं सारे, फूट रुप डाकिन के ।
महके घर का आँगन
कर्मो की खेती
है सारी, हम सब माली-मालन
बच्चों की
फुलवारी से ही, महके घर का आँगन ।
सर्वेश्वर की
लीला न्यारी
समझ न पाते हैं
संसारी ।
कहीं फूल पर
फूल खिलाए
इक कली कहीं
नज़र न आए ।
सुख-दुख
पतझड़-हरियाली दे, करे पतित को पावन ।
खिलने से पहले
मुरझाए
माँ का सीना
फट-फट जाए ।
लाल बिना बेहाल
हाल है
रहम न खाता
क्रुर काल है ।
सूना-सूना लगता
है यह, जीवन अपना साजन ।
सदा रहे ना
काली छाया
सूखे को भी हरा
बनाया ।
कर्म खेल अपना
दिखलाता
सुख-दुख जग में
आता-जाता ।
प्यासी धरती को
सरसाता, बन सावन मनभावन ।
इक दिन गूँजेगी
किलकारी
करें भरोसा सब
नर-नारी ।
ईश-कृपा जब
होगी प्यारी
तभी खिले जीवन
फुलवारी ।
‘पारदर्शी’
लहराएगा फिर, तेरा उजड़ा कानन ।
संतकवि
पारदर्शी
दो नवगीत
लहरों
से छूट रहे कूल
देवदारु हो गए बबूल मितवा
लहरों से छूट रहे कूल
मितवा ।
भीतर से बाहर तक
लील रहे दुख,
रंगों ने छीन लिए
रूपों के सूख ।
आँखों में चुभते हैं फूल
मितवा
गंध हुई फूलों की भूल
मितवा ।
केसर की क्यारी ने
खुरच दिया मन,
हरी-हरी शाखों के
पिलियाए तृण ।
कटे हुए वृक्ष और मूल
मितवा
मलयज की बाहों में धूल
मितवा ।
जाएँ कहाँ दूर भी,
कौन है वहाँ
?
एक भीड़, एक भीड़
सब तरह यहाँ ।
गीत-राम रहे न अनुकूल
मितवा
शब्दों तक रह गए उसूल
मितवा ।
सब
उड़ाने आँख भर हैं
यादें के फिर पंख खोले,
उड़ चला मन का विहग आकाश
में ।
दूर जाते में कहीं से
देखना यों दूर मुड़ कर ।
सुखद होता है बिछुड़ कर,
प्राण का मिलना उजड़ कर ।
कौन जाने किस क्षितिज पर
हो मिलन, फिर से अलग आकाश
में ।
करकते-से सपन टूटे,
मोतियों-से अश्रु लूटे ।
लौट पाते हैं नहीं क्षण,
मिल न पाते पंथ छूटे ।
सोचता पर, रुक न पाता,
चलता हुआ मन तो सजग आकाश
में ।
सब उड़ाने आँख भर हैं,
नीड़ सारे शाख भर हैं ।
साँस के कच्चे घरौंदे -
आयु के पर लाख घर हैं ।
पक्षियों के साथ फिर भी
रूप उड़ता पवन के मग आकाश
में ।
डॉ. तारादत्त
'निर्विरोध'
हाइकु
कर्म का फल
निकलकर रहेगा
आज या कल ।
खुली खिड़की
रोशनी भी देती
है
और हवा भी ।
प्यार का
रिश्ता
निभाने न आयेगा
कोई फ़रिश्ता ।
रतन-धन
व्यर्थ है,
कीमती है
निश्छल मन ।
एक ही कर्म
लड़ना अँधेरे
से
दीप का धर्म ।
बेशक टूटा
लेकिन दर्पण से
सच न छूटा ।
जीत या हार
तय किकया करती
वक्त की धार ।
बाधाएँ आतीं
वीरों के सिर
पर
हाथ फिरातीं ।
वेदना-पद
गा रहा निःशब्द
मैं
मैं विशारद ।
बनो शंकर
दुनिया की
खातिर
पी लो जहर ।
राजेन्द्र वर्मा
