रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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भाषांतर

असमिया

तुम नहीं हो

उद्भासित कर तिमिर भरा मम आकाश निशा का

थी उदित हुई जिस शेष रात्रि में तुम्हीं न हो वह तारिका

किरणें चूम तुम्हारी ही, जल खिली पंखुरियाँ हृदय कमल की

फिर न दिखी तुम हाय धरा पर उतरी जब किरणें सूरज की

उठा तरंग बहाग बिहू का मेरे छोटे से जीवन में

आई बहकर गीतों की लड़ियाँ पेंपों की धुन में

उन्मुक्त हँसी की आभा फैली फूलों के कोमल मुख में

मिली न तुम स्तब्ध हुआ पेंपा, बोल नही वंशी में

एक दिवस आई बहार, फिर कभी न लौटी फागुन की

पलाश वन में बज उठी फिर अग्निवीणा कामना की

उसी दिन पिंजड़े का मन-पंछी पंख खोल उन्मुक्त हुआ

हाय प्रिया पर तुम न मिलीं, आया फाल्गुन लौट आया

गुच्छ-गुच्छ तारों की अलियाँ जल जाती है प्राप्त में

ज्योत्सने अंधकार की शोभा ! तुमको प्रकाश हर ले जावेगा !

मूलः देवकांत बरुआ

अनुवादः डॉ. बल्देव

 

उड़िया

सद्भावना

मैंने अपनी भूख को

टुकड़े टुकड़ेकर

परोस दिया है

टुकड़े-टुकड़े शब्द

मेरे आत्मज हैं

मेरी भूख है

तुम वह सब

कुबुल करते हो

लगता है -

जैसे कि मैं आहिस्ते से

खून में बदल जाती हूँ

एक तंरग की भाँति

तुम्हारे शरीर में

दाखिल हो जाती हूँ

तुम्हारी आत्मा के करीब

भूख क्या भूख को

पहचान सकती है

क्या पता

मैं नहीं कहती

मैंने जो परोसा है

वह तुम्हें तुष्ट किया हो

जीवन तो एक लम्बा अकाल है

वहाँ होती है निहायत कम थोड़ी-सी कविता

जिसे मैं खोजती रहती हूँ

उन पुराने शब्दों के बासी पड़े हुए अर्थों में

और तुम उन अर्थों के साथ

संश्लिष्ट हो शब्दों के भीतर

मूलः सुचेता मिश्र

अनुवादः कार्तिकेश्वर बेहरा

 

बांग्ला

स्वर्ग से पलायन

इवनिंग इन पेरिस की गंध

रूमाल में फीकी हो गई -

हे महानगर, हे धुमिल महानगर

क्या तुम कभी सुनते हो कालीघाट पुल के ऊपर

लोलुप कामुक पगध्वनियाँ ?

क्या तुम सुनते हो समय की अग्रिमयात्रा की ध्वनि -

हे महानगर, हे धूमिल महानगर ?

जब आनंद विभोर भीड़ में तुम नाचती हो

अरी ओ, दस-रुपए-ख़रीदी कुछ घंटों की उर्वशी

आत्मा को आकर्षित करने वाली लाल धारा

अमर्त्य प्रकृति के वंशजों के हृदय में नाच उठती है

और क्षितिज पर उदित होता है उज्ज्वल चाँद

हे महानगर, हे धुमिल महानगर

"हे उर्वशी, मैं कोई पुरुखा नहीं हूँ"

मोटर कारों में, मदिरालयों में,

और रविवारों को डायमंड हार्बर में,

मेरे इने-गिने रुपए इने-गिने घंटे की प्रेयसी

उससे परे, उसके आगे, दहकती है रेत

बाघ की आँख जैसी ।

मूलः समर सेन

अनुवादः उमेश जोशी

 

 

छत्तीसगढ़ी

जाड़ा

कोहरे की गुदड़ी ओढ़े,

शीत में कुड़मुड़ाता गाँव

धूप के निकलते ही

फूल-सा मुस्काता गाँव

फूस की बनी झुग्गी

गोबर से लिपी-पुती

चिकने चबूतरे पर

पीठ रगड़ते मेमने

दो पैरों पर खड़े

सिर टकराते, लड़ते मिलते

गोती बाँधे

नन्हा नग्न शैशव

छोड़ तापना आग पुआल की

गोद में लेकर

मेमना, में-में करता

दौड़ रहा भगाने जाडें में

जाड़ा अपना ।

मूलः रसिक बिहारी अवधिया

अनुवादः डॉ. मृणालिका ओझा

 

गुजराती

मेरे साथ

अंत तक मेरे साथ कोई नहीं चलता

सड़क के अलावा...

 

अंत तक मेरे साथ कोई नहीं बतियाता

दर्पण के अलावा...

 

अंत तक मेरे साथ कोई नहीं गाता

मौनता के अलावा...

 

अंत तक मेरे साथ कोई नहीं रोता

मेरी आँखों के अलावा...

 

अंत तक मेरे साथ कोई नहीं सोता

मेरे अकेलेपन के अलावा...

मूलः सुरेश दलाल

अनुवादः सैयद मेहरून

 

जर्मन

सवाल

तुम्हारी ज़िंदगी की मोटाई क्या है ?

गहराई कितनी ?

उसकी क़ीमत कितनी ?

तुम्हें कबतक अदायगी करनी होगी ?

उसके दरवाज़े कितने हैं ?

कितनी बार तुमने उसे नये सिरे से शुरू किया ?

क्या तुम कभी उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाना पड़ा

अगर हाँ

तो क्या तुमने अपना चक्कर पूरा कर लिया ?

दायरे की सूरत में या कटे-फटे साहिल के साथ-साथ

तुमने उसे लम्हे में क्या सोचा ?

तुमने कैसे जाना 

कि तुम्हारा चक्कर पूरा हो चुका है ?

क्या तुमने बार-बार चक्कर काटे ?

क्या तीसरी बार का चक्कर

दूसरी बार के चक्कर जैसा ही था ?

क्या तुम इस फ़ासले को कार में तै करना चाहते हो ?

या चाहते हो कि कार कोई दूसरा चलाए ?

किस तरफ़ से ?

और कौन ?

मूलः एरिथ फ्रेड

अनुवादः हसन जमाल

 

अँगरेज़ी

रजत पथ

तुम्हारा समय और कार्य

चक्राकार निरंतरता में

प्रवाहित होता है

वैसे ही जैसे तुम

नये के सामने होने पर

ज्यादा प्यार करते हो उसे

आकार में विविधता

आबद्ध होती है

अंतराल के प्रकृतिगत नियम से

जो क्रियाशील रखता है

संपूर्ण विश्व को

बुद्धिमतापूर्ण दैनिक विचारों को

क्रियान्वित करने में

ऋतुओं की तरह

दुख के सेतु को पार करने में

स्वपहचान अपेक्षित है

और पुनः पुराना नया

और नया पुराना हो जाता है

तथा बहुत दूर तक

संघर्ष करने के निमित्त

यह सोचते हुए कि

तुम्हीं केवल अकेले नहीं रहे

उन कारणों को उद्घाटित

करते हुए जो अबतक

तुम्हारे जीवन को लपेटे हुए हैं

भावपूर्ण स्थितियों की

परिपक्वता को जानने के लिए

स्मृतियाँ अर्जन करती हैं

गंभीर रहस्योद्घाटन ।

 मूलः मतेइ मोनिका

अनुवादः आनंद कुमार शर्मा चंचल

 

तुर्की

चन्द्रमा के प्रति

यह माना कि तुम तमाम शहजादों से ज़्यादा सुन्दर हो !

लेकिन हमें क्या करना ?

तुम तमाम उम्र धरती और आकाश का चक्कर लगाते हो ।

लेकिन हमें क्या करना ?

तुम हमारे सर्द बिस्तरों को गर्म नहीं कर सकते

तुम हमारी केतलियों को गर्म नहीं कर सकते

मेरे प्यारे गोरे मुखड़े वाले चाँद

हमें तुमसे क्या फ़ायदा है ?

मूलः ज़फ़र यतक़ीं

अनुवादः धर्मवीर भारती

 

फ्रांसीसी

जीने का अधिकार, कर्तव्य

और कुछ नहीं होगा

न भुनभुनाता हुआ कीड़ा

न काँपती हुई पत्ती

न कोई गुर्राता हुआ पशु, बदन चाटता हुआ पशु

 

न कुछ गर्म न कुछ कुसुमित

न कुछ तुषाराच्छादित, न उज्जवल, न सुगंधित

न मधुमासी फूल से स्पंदित कोई छाया

न बर्फ़ का फर डाले कोई वृक्ष

न चुम्बन से रंजित कपोल

न कोई संतुलित पंख, हवा को चीरता पंख

न कोमल मांसल खंड, न संगीत भरी बाँह

न कुछ मूल्यहीन, न विजय योग्य, न विनाश योग्य

न बिखरने वाला, न संगठित होने वाला

अच्छे के लिए, बुरे के लिए

न रात, प्रेम या विश्राम की भुजाओं में सोई हुई

न एक आवाज़ आश्वासन की, न भावाकुल मुख

न कोई निरावृत उरोज, न फैली हुई हथेली

न अतृप्ति न संतोष

न कुछ ठोस न पारदर्शी

न भारी न हल्का

न नश्वर न शाश्वत

पर मनुष्य होगा

कोई भी मनुष्य

मैं या और कोई

यदि नहीं तो फिर कुछ नहीं होगा ।

मूलः पाल इल्यार

अनुवादः धर्मवीर भारती

 

 

 

भाषांतर

प्रगति ही जीवन है- जवाहरलाल नेहरू

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