रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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  बालकथाः फगनू का तोता- सिंधु देवी रथ

माह के बालकवि-  विष्णु कविरत्न

 
माह के बालकवि

 विष्णु कविरत्न

 

 

नल को खाली खुला न छोड़ो

 

 देश को इससे हानि होती-

नल को खाली खुला न छोड़ो ।

पानी भी बेकार हो जाता,

यह पानी किसी काम न आता ।

पैसा भी बेकार हो जाता,

नल को खाली खुला न छोड़ो ।

 

मेरी प्यारी मोटर कार

 

मेरी प्यारी मोटर कार,

रुकती नहीं कभी बेकार ।

 

डैडी को दफ़्तर ले जाती

यह मम्मी को सैर कराती ।

मुझको भी यह करती प्यार ।

 

छुट्टी के दिन मैं भी जाता

मिन्टू-चिन्टू को ले जाता।

हँसते-गाते जैसे त्यौहार ।

मैं पाठशाला जाऊंगा

 

मै पाठशाला जाऊँगा,

बस्ता मैं ले जाऊँगा ।

ठीक समय पर जाऊँगा,

लेट कभी नहीं जाऊँगा ।

गुरु को पाठ बताऊँगा,

उनको शीश झुकाऊँगा ।

पाठ से जी न चुराऊँगा,

बड़ों से आदर पाऊँगा ।।

 

बबलू पढ़ना सीख रहा है

 

बबलू पढ़ना सीख रहा है,

गुड्डू लिखना सीख रहा है ।

पुस्तक से वह अक्षर पढ़ता,

यह कापी पर अक्षर लिखता ।

अँगूली पर वह गिनता है,

मैं बोलूं वह सुनता है ।

डम्पू दस तक गिनती गिनता,

मिन्टू सौ तक गिनती लिखता ।

बबलू पढ़ना सीख रहा है

गुड्डू लिखना सीख रहा है ।

 

चिड़िया चूं-चूं करती

 

पेड़ पर चिड़िया चूं-चूं करती,

नन्हें-मुन्नों का मन हरती।

जहाँ देखती दाना-तिनका,

फुदक-फुदक कर आगे बढ़ती ।

तिनकों से अपना घर बुनती,

कहीं पड़ा हो चुग्गा चुगती ।

 

 

बालकविता

दुख को भुलाने से दुख मर जाता है-प्रेमचंद

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