पंजाबी
मेरा नाम गीता है।
मैं टेलिफ़ोन एक्सचेंज़ में ऑपरेटर हूँ।
कन्या उच्च महाविद्यालय से मैंने हायर सेकेंडरी पास की. उन्हीं दिनों टेलिफ़ोन ऑपरेटर की रिक्तियाँ निकलीं। मैंने भी आवेदन कर दिया। प्रशिक्षण के लिए मुझे चुन लिया गया।
प्रशिक्षण के पश्चात् मेरी तैनाती भी स्थानीय टेलिफ़ोन एक्सचेंज़ में हो गई। एक्सचेंज़ घर से काफ़ी दूर था। रिक्शा में जाना पड़ता था। मेरी मम्मी मेरी बहुत चिंता किया करती थीं। अकेली जवान बेटी मर्द की रिक्शा पर! कुछ दिनों तक तो वे मुझे पहुँचाने जाती रहीं, परंतु यह सिलसिला ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकता था। वे ख़ुद भी तो नौकरी करती थीं।
‘बेटा, किसी वृद्ध रिक्शा वाले के रिक्शा पर ही सवार होना। वह अगर पूरबीया हो तो और भी अच्छा है। सीधे घर ही आना। कहीं रुकना नहीं। घर आकर, भीतर घुसते ही दरवाज़ा भीतर से बंद कर लेना। अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए भी तो बिना नाम-पता पूछे दरवाज़ा नहीं खोलना। पहले दरवाज़े की झिर्री में से देख लेना कि बाहर कौन खड़ा है। अगर किसी से बात भी करनी हो तो कम से कम बोलना है। सिर्फ़ हाँ जी, नहीं जी, ही कहना है। हर सवाल का जवाब ‘मुझे तो पता नहीं जी’ कह कर ही देना है। नज़रें झुकाए रखनी हैं। हँस कर बात नहीं करनी। आज कल के लोग हँसी का ग़लत अर्थ लेते हैं।’
मम्मी लगभग रोज़ ही मुझे ऐसी हिदायतें दिया करतीं थीं, परंतु मैं तो टेलिफ़ोन ऑपरेटर हूँ, बोलना और सुनना मेरा पेशा है। मैं रोज़ अनेक अजनबियों की आवाज़ों का जवाब देती हूँ। हैलो कहती हूँ। दो व्यक्तियों को आपस में मिलवाती हूँ। मैं एक सेतू हूँ। दूर स्थित दो किनारों के एक पुल पर आपसी प्यार मुहब्बत करने वालों को मेरे अस्तित्व का अहसास ही नहीं होता। काश ! मेरा भी कोई अपना किनारा हो।
आम तौर पर अमन की डयूटी मेरे साथ ही होती है। वह मेरे साथ ही ऊँची कुर्सी पर बैठता है। जवान है, सुंदर है। तारों के घेरे में मेरे दिल की तार शायद उस तक नहीं पहुँचती। आवाज़ों के जंगल में शायद उसकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँचती। मुझसे अगर उसे कोई बात करनी हो तो वह भी फ़ोन के माध्यम से ही करता है। बहुत परेशान है, माँ बीमार है। और, कोई है नहीं। वक़्त का पता नहीं चलता कैसे सरकता जाता है, परंतु हम चलते ही नहीं......मैं उसे फ़ोन करने में कभी पहल नहीं करती। डर सा लगता रहता है। सोचती हूँ कभी उससे कहूँ कि इयरफ़ोन उतार कर भी कोई बात सुनो। माउथ पीस हटा कर भी कभी कोई बात किया करो।
जब कोई प्यारा सा स्वर मुझे फ़ोन मिलाने के लिए कहता है और उधर फ़ोन न मिले या फ़ोन ख़राब हो या एँगेज़ हो तो मुझे बहुत दु:ख होता है। पता नहीं बेचारे का कितना अरजेंट मैसेज़ था।
हाँ, मेरा भी बहुत अरजेंट मैसेज़ है परंतु यह मैसेज़ किसे दूँ ? पिता बीमार हैं। दीदी खड़े-खड़े बूढ़ी हो गई है। उसे ख़ुद से ज़्यादा हमारी फ़िक़्र है।
रोज़ ही आकर सीधे अपने कमरे में चली जाती हूँ। बिस्तर पर गिर पड़ती हूँ, किसी से कोई भी बात करने को जी नहीं चाहता। वैसे बात करने के लिए होता ही कौन है ? कभी-कभी लेटे लेटे ही ख़ुद से बातें करती हूँ तो लगता है कि यह तो मेरी आवाज़ ही नहीं। मानो कोई और ही बोल रहा हो। अपनी सारी आवाज़ तो मैं टेलिफ़ोन एक्सचेंज़ में ही छोड़ आती हूँ। पिता को मेरे घर आने का पता तो चल जाता है परंतु मेरे कमरे में प्रवेश करने के फ़ौरन बाद ही वे मुझे आवाज़ नहीं देते। पंद्रह-बीस मिनट बाद आवाज़ देते हैं, उन्हें सदा अहसास होता है कि काम से लौट कर मुझे साँस लेने के लिए भी कुछ समय चाहिए। पिता जी के सदा ऐसे ही शब्द सुनने पड़ते हैं। अब तो इन शब्दों की आदी हो गई हूँ मैं। पता ही नहीं चलता। सिर्फ़ उस बात का पता चलता है जो पिताजी ने बग़ैर किसी माँग के की हो - ‘पुत्तर अपना ख़याल रखा करो। ज़ल्दी मत मचाया करो। थोड़ा सब्र किया करो। ये अख़बार तो पकड़ाना ज़रा। सुबह से अख़बार देखी ही नहीं।’ परंतु, आज तो पिताजी बोले ही नहीं। देखूँ तो सही।
मेरा नाम बिमला है। मैं एक प्राईवेट स्कूल में अध्यापिका हूँ। बी. ए. पास हूँ। अच्छे अंक पाए हैं। बी. एड. में दाखिला तो मिल गया था परंतु मैंने बी. एड. नहीं की। दीदी पर मैं और बोझ नहीं बनना चाहती थी। काम करके दीदी का हाथ बँटाना चाहती थी। अँगरेज़ी माध्यम का स्कूल है। ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिक स्कूल। तीन कमरे हैं, पाँच कक्षाएँ हैं। छोटे-छोटे बच्चे, भारी-भारी बस्ते। हर विषय को अँगरेज़ी माध्यम से पढ़ाना आवश्यक है। मैं अँगरेज़ी पढ़ाती हूँ। ज़ोर-ज़ोर से बोल-बोल कर रटवाती हूँ। सप्ताह के सात दिनों के नाम, शरीर के सात अंगों के नाम, सात फलों के नाम, सात सब्जियों के नाम। बच्चे न समझें तो मैं पंजाबी में, अँगरेज़ी पढ़ाती हूँ। स्कूल के नियमों का उल्लंघन करती हूँ, परंतु बच्चे ख़ुश हैं। बच्चे समझते हैं, बच्चे सात फलों का स्वाद पूछते हैं परंतु फल दूर हैं, स्वाद खट्टा है।
सुबह से लेकर शाम तक काम ही काम है परंतु तनख़्वाह कुछ भी नहीं। बी. एड. पास टीचर को ढाई सौ रुपए मिलते हैं। बी.ए. पास को दो सौ रुपए और बी.ए. से नीचे वालों को डेढ़ सौ रुपए। हम छह टीचर हैं, चार महिलाएँ या यूं कहें कि लड़कियाँ हैं और दो पुरुष या लड़के। सभी जैसे एक दूसरे से रूठे हुए हों। शायद ख़ुद से भी नाराज़ हैं, हूँ-हाँ से यादा कोई बात नहीं करता। कोई हँसता नहीं। सभी मानो निराश हैं, विवादग्रस्त हैं। हर कोई यहाँ से भागने की कोशिश में है परंतु उड़ने के लिए यहाँ कोई आसमाँ हीं नहीं, मजबूर हैं सभी।
पवन एम.ए.बी.एड. पास है। कभी-कभी निराशा के दो शब्द बाँट लेता है। मैं कोई हुँगारा नहीं देती। डरती हूँ कहीं हमारे दो शब्दों से स्कूल का अनुशासन ही न भंग हो जाए। सोचती हूँ, पवन को घर पर बुलाऊँ। हिम्मत नहीं होती। मम्मी का साया तो अब सर पर रहा नहीं। बड़ी सख़्त मिज़ाज़ थीं मेरी मम्मी। बात-बात पर रोकना, टोकना, मनाही, अकेले बाहर नहीं जाना, यह नहीं करना, वह नहीं करना। उस वक़्त मम्मी बहुत ख़राब लगती थी। कई बार बहुत गुस्सा आता था परंतु अब....अब मम्मी की बहुत याद आती है।
स्कूल से थकी-हारी लौटती हूँ। आते ही अपने कमरे में आ जाती हूँ। मेरा कमरा अलग नहीं एक ही कमरे में पेटी और संदूक रखकर उसके दो हिस्से बनाए गए हैं। इस कमरे का एक हिस्सा मेरे पास है और दूसरा कमला के पास। कमरे में घुसते ही कुछ मिनटों बाद पिताजी की आवाज़ आती है। घर आते ही मुझे पिताजी की आवाज़ का इंतज़ार रहता है मानो यह आवाज़ घर आने पर मेरा स्वागत करती हो, ‘पुत्तर! तू बहुत थक गई होगी। अगर मैं काम करने योग्य होता तो तुझे और पढ़ाता तू किसी अच्छे स्कूल में परमानेंट टीचर होती। तुझे पूरे ग्रेड मिलते।’
बड़ी अजीब बात है। मुझे आए हुए आधा घंटा हो गया है। पिताजी की आवाज़ आई ही नहीं। पिताजी का हुक्म है कि जब तक वे न बुलाएँ तब तक कोई उनके कमरे में न जाए। बिना बुलाए कोई उन्हें बेआराम नहीं करेगा परंतु आज अब तक पिताजी ने कुछ कहा नहीं। जाकर देखूं तो सही।
मेरा नाम कमला है मैं सरकारी प्रसूति अस्पताल में सेवादार हूँ। जब तक मुझे अपना नाम समझ आया, मेरा नाम खो चुका था। मुझे सभी डायन कह कर पुकारते थे। मैं चार बहनों में सबसे छोटी हूँ। मेरे पैदा होते ही मेरी माँ गुज़र गई।
जब मुझे यह बात समझ आई कि मेरी माँ मेरे आते ही क्यों चली गई तो मुझे इस अपनी पैदाईश पर पश्चाताप हुआ। दाई ने कहा बेटी हुई है।
‘फिर बेटी!’ ये मेरी माँ के अंतिम शब्द थे और मेरी माँ गुम हो गई। सदा के लिए मौन। पत्थर बन गई। निर्जीव पत्थर।
दीदी ने मुझे पाला है। शायद माँ जैसा ही प्यार दिया है। माँ की कमी मुझे महसूस नहीं होने दी। बड़ी बहनें पहले तो भाई की उम्मीद पूरी न होने के कारण बहुत उदास रहीं। मुझे अक्सर बुरा-भला कहतीं, धीरे-धीरे दिल को समझा लिया था परंतु गली-मुहल्ले वालों की छींटाकशी देर तक मेरा पीछा करती रही।
मैं अक्सर सोचती हूँ- ‘क्या कसूर था मेरा? क्यों मुझे घृणा का पात्र बनाया गया?’
मैं प्रसूति अस्पताल में काम करती हूँ। रोज़ ही मेरी आँखों के सामने दो-चार बच्चे पैदा होते हैं। अब कई बार डॉक्टर मुझ से ही दाई का काम करवा लेती है। जब भी लड़की पैदा होती है, अपने साथ मायूसी लेकर आती है। सबसे पहले निराशा की कालिमा नवजात बच्ची की माँ के चेहरे पर उतरती है। मैं भी उदास हो जाती हूँ। सोचती हूँ कि क्या क़सूर है इस मासूम का ?
जब किसी के बेटा पैदा होता है, मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती। बेशक पैदा होने की ख़ुशी में उसके घर वालों की तरफ़ से मुझे बीस-तीस रुपए मिल जाते हैं और लड्डू भी। मुझे इस दुनिया से अजीब सी चिढ़ हो गई है। एक नफ़रत है। गुस्सा है, मैं इस गुस्से को किस पर निकालूँ समझ नहीं आता।
इस दुनिया में मेरे पिता ही एकमात्र ऐसे शख़्स हैं जिन्होंने मेरी पैदाईश पर मुझसे घृणा नहीं की। शायद थोड़े से उदास हुए हों परंतु उन्होंने मुझे महसूस नहीं होने दिया। कितने मजबूर है मेरे पिता जी। बिस्तर से उठ नहीं सकते। मेरे घर लौटते ही हाल-चाल पूछते हैं। अक्सर कहा करते है ‘तू मेरा बेटा है। बेटा तू ही सबसे बाद तक मेरे पास रहेगी। तेरी शादी के बाद ही इस संसार को अलविदा कहूँगा।’
आज काम कुछ ज़्यादा ही था। चार केस एक साथ निपटाने पड़े। पता ही नहीं चला मैं कब बिस्तर पर आ लेटी और मुझे नींद आ गई। शायद पिताजी को किसी चीज़ की ज़रूरत हो। देखूँ तो सही। पितीजी ने अभी तक आवाज़ क्यों नहीं दी ?
मेरा नाम सीता है। मैसूर साड़ी सेंटर में मॉडल हूँ। परिवार की बड़ी लड़की हूँ। अब लड़की तो रही नहीं, तीस की हो गई हूँ। अब तो मैं औरत हूँ, शायद संपूर्ण महिला भी नहीं हूँ। मेरे पैदा होने पर घर वालों ने ख़ुशी मनाई थी। घर में सीता-सावित्री आई थी। कक्षा दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते घर में बारी-बारी से तीन बहनें आ गईं। मम्मी सदा के लिए चलती बनीं। दसवीं के बाद मेरी पढ़ाई ख़त्म हो गई। घर की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर ही थी। बहनों की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई, मेहमानों की आव-भगत, बिरादरी में उठना-बैठना, सारे काम मेरे ज़िम्मे थे।
पिताजी दाना मंडी में गुप्ता सेठ की आढ़त की दुकान पर मुनीम थे। मुनीमी करते-करते वे बूढ़े हो गए। उनकी आँखें कमज़ोर हो गई थीं। उन्हें पक्षाघात हो गया था। मुझ पर अब बाप की बीमारी की बोझ भी आन पड़ा।
बहनें बड़ी हुईं। उनकी शादियों की फ़िक्र भी मुझे ही करनी थी। शादियों पर ख़र्च भी काफ़ी होना था। घर में तो कुछ भी नहीं था। पिताजी ने थोड़ा-बहुत जो बचाया था वह उनकी कलमुंही बीमारी पर लग गया। उनकी कौन सी कोई सरकारी नौकरी थी जो बीमारी के इलाज़ के लिए ख़र्च मिलता या कोई मुआवज़ा मिलता। ऐसी प्राइवेट नौकरी की कोई पेंशन भी नहीं मिलती।
आढ़तीये गुप्ता सेठ के एक बेटे की मेन बाज़ार में बड़ी दुकान है - मैसूर साड़ी सेंटर। पिताजी के अनुरोध पर उसने मुझे अपनी दुकान में नौकरी दे दी है। मेरा काम दुकान के प्रवेश द्वार पर एक तरफ़ बने शीशे के केबिन में मॉडल बन कर खड़े रहना है। मेरी डयूटी दो बजे से शुरू होती है क्योंकि ज़यादातर ग्राहक दोपहर से आना शुरू होते। मैं जाते ही दुकान के पीछे बने छोटे से कमरे में जा घुसती और कोई नए फैशन की साड़ी फैलाए, शीशे के केबिन में आ खड़ी होती हूँ। ज़रूरत पड़ने पर ही मुझे कुछ शब्द बोलने पड़ते हैं-‘आईए, अंदर आईए! पसंद कीजिए।’ ‘सुंदर, अति सुंदर!’
मैं सोचती हूँ, चमकीली साड़ियों के वज़न तले छुपी एक औरत को भी कोई देखेगा, कोई पंसद करेगा ? कहीं इसी तरह न सारी उम्र गुज़र जाए। काश! साड़ी पसंद करने आया कोई युवक मुझे भी पंसद कर ले जाए। परंतु कौन आएगा ?
अगर कोई आया तो क्या मैं चली जाऊँगी?
मेरी तो अभी कई ज़िम्मेदारियाँ बाक़ी हैं।
रात को नौ बजे मैं घर पहुँचती हूँ। छोटी बहनें रसोई का काम ख़त्म कर अपने-अपने कमरों में कोई सिलाई-कढ़ाई या पढ़ने-पढ़ाने में मग्न होती हैं। पिताजी अपने कमरे से आवाज़ देते हैं- ‘सीता बेटी, आ गई? नौकरी तो एक एक्टिंग होती है। बेटा, ध्यान से यह एक्टिंग करना। गुप्ता सेठ ने नौकरी देकर मुझ पर बहुत अहसान किया है। सामान की अधिक बिक्री तुम्हारी नौकरी की कन्फरमेशन है।’
आज मेरा खाना खाने की इच्छा नहीं हो रही। पिताजी से पूछ लूँ अगर उन्हें कुछ खाना है तो गर्म करके दे दूँ। नहीं तो, जो कहेंगे बना दूँगी। मेरे हाथों की ही बनी खिचड़ी उन्हें पसंद आती है। आज पिताजी ने कोई आवाज़ ही नहीं दी। मुझे तो आए हुए काफ़ी समय हो गया। कहीं बहुत ज़्यादा ही तबीयत न ख़राब हो गई हो। चलकर ख़ुद देखती हूँ।
तीनों बहनें फ़र्श पर बैठी हैं चुपचाप। हमेशा की तरह पिताजी अडोल बिस्तर पर लेटे हुए हैं। परंतु, हमेशा से विपरीत आज उन्होंने चादर सर पर ओढ़ रखी है।
ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे मुँह से चीख निकली है- ‘पितीजी!’
तीनों बहनें दौड़ कर मेरे गले आ लगती हैं।
‘दीदी!
वे ज़ोर-ज़ोर से रो रही हैं, ‘अब कौन हमें सहारा देगा ?’
मैं पिताजी की चारपाई की पाटी पकड़ कर बैठ जाती हूँ।
नीलम शर्मा ‘अंशु’
ठाकुरपुकुर हाउसिंग प्रोजेक्ट, कालीतला,
एम. जी. रोड, कोलकाता – 700104
fmrjneelamanshu@gmail.com

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