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मो सम कौन कुटिल खल कामी - प्रेम जनमेजय तुलसी बाबा ने कहा …“मो सम कौन कुटिल खल कामी '' और आजकल के बाबा, बापू, संत आदि गाते हैं… ''तुम सम कौन कुटिल खल कामी ।'' तुलसी जैसे संत केवल अपने और अपने ही बारे में सोचते थे । तुलसी बाबा ने कुटिल खल कामी कहा तो अपने को, रघुनाथ गाथा रचि तो वो भी स्वंत: सुखाय । भई अपना ही सुख सबकुछ हो गया, प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता आदि का सुख कुछ नहीं हुआ । होंगे वे जो तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास आदि संतों की प्रशंसा के गीत गाते हैं, मैं तो आज के संतों के गीत गाता हूँ । धन्य हैं हमारे कलयुगी संत जो सदा अपने भक्तों के बारे में ही सोचते हैं । वो माया-मोह के विष को शिव की तरह इसलिए गले लगाते हैं कि उनके भक्त माया मोह से मुक्त हो सकें । सांसारिक लोग कितने कुटिल, माया ग्रस्त, खल, कामांध हैं और कीचड़ में सने हुए हैं जबकि इसके विपरीत हमारे परमज्ञानी संत भक्तों से अधिक कीचड़ में लथपथ होने के बावजूद 'कमल' की तरह कैसे निर्लिप्त हैं । परमज्ञानी संत निरंतर चेताते रहते हैं कि भक्तों सावधान, तुम रुपये पैसे के चक्कर में पड़कर अपना अगला जन्म व्यर्थ मत करो अपितु माया को हम संतों को वश में करने के लिए दे दो । तुम तो कर्म किए जाओ क्योंकि तुम्हें कर्म का अधिकार है और फल की चिंता हम पर छोड़ दो क्योंकि फल पर हमारा अधिकार है । सत्यस्वरूप संत एक सच्चे उद्योगपति की तरह जाना जाता है, वैसे तो आजकल संतई भी एक तरह का उद्योग हो गया है और बिना 'उद्योग' के संतई जमती कहाँ हैं । जैसे एक सच्चा उद्योगपति कामगारों के कर्म-फल पर अपना अधिकार रखता है और एक सच्चे संत की तरह सार स्वयं ग्रहणकर थोथा कामगारों को थमा देता है, वैसे ही एक सच्चा संत भी जाना जाता है ।
कुटिल -खल -कामी बनने का बाज़ार गर्म है । एक महत्वपूर्ण प्रतियोगिता चल रही है.. तेरी कमीज मेरी कमीज से इतनी काली कैसे ? इस क्षेत्रा में जो जितना अग्रणी है उसका जीवन उतना ही सफल है । कुटिल-खल-कामी होना जीवन में सफलता की महत्वपूर्ण कुंजी है । इस कुंजी को प्राप्त करते ही समृद्धि के समस्त ताले खुल जाते है । जीव को यदि सच्चा देशसेवक, कुशल पुलसिया, सफल कानून वेत्ता, अमर साहित्यसेवी, अनन्य धार्मिक, चतुर उद्योगपति आदि बनना है तो उसे इस कुंजी को प्राप्त करना ही होगा । अपने लाल को यह कुँजी थमाने को विवश माँ वैसे तो सच कह, झूठ मत कह, सबका भला सोच आदि का पाठ पढ़ाती है, पर बच्चा दुनिया की दौड़ में कहीं पिछड़ ना जाए, सफल चार्टैड एकाउंटेंट, सफल वकील, सफल जनसेवक आदि बनने से रह ना जाए , बेचारी माँ दुनिया की नज़रें बचाकर उल्टा पाठ भी पढ़ाती है । माँ नही चाहती कि उसका बेटा यह उलटबांसी सीखे पर 'दुनिया के हितचिंतक ' चाहते हैं कि विश्व की भावी पीढ़ी कुशल व्यावसायी तो बने कुशल मनुष्य ना बने । प्रतियोगी तथा खुली व्यवस्था के दौर में सबकुछ खुला होना ही चाहिए ।
मैं उनके सामने नत्मस्तक था और वे मेरे नत् मस्तक को ज्ञान से वैसे ही भर रहे थे जैसे अमेरिका नत् मस्तक देशों को 'प्रजातंत्र' के ज्ञान से भरता है । उनके अनुसार मैं मोह माया में अत्यधिक फंस चुका था और मुझे इस माया मोह से बाहर निकालना उनकार् कत्तव्य था जैसे संसार के अन्य राष्ट्र आतंकवादी तत्वों से भरे हुए हैं और उन्हें उसमें से निकालना अमेरिकी चिंता है । वे अत्यधिक कत्तव्यनिष्ठ हैं, अत: मैं नहीं चाहता तो भी वो मेरा बलात्कार कर मुझे इस माया- मोह से निकालते ही । जैसे लोहे को लोहा काटता है, ज़हर को ज़हर काटता है, भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार काटता है तथा आतंकवाद को आतंकवाद काटता है, वैसे ही माया को माया काटती है । पिछले बरस उनकी जिन अंगुलियों में चांदी का छल्ला था उनमें अब अनेक हीरे पन्नों से युक्त अंगूठियां जगमगाकर संदेश दे रही थीं कि संसार का प्रकाश चॉदी के छल्ले की तरह ही झूठा है तथा इस असार संसार का बाबा ने सार गह लिया है । पहले बाबा कुटिया में रहा करते थे और तुच्छ संसार के भोग विलास से दूर रहते थे परन्तु जबसे उन्होंनें दूसरों को इस भोग से दूर रहने कर ज्ञान दिया और माया मोह में फंसे जीवों ने इसे मानना आरम्भ कर दिया तबसे बाबा की कुटिया मुटिया गई है । भक्तों को संकट से बचाने के लिए बाबा ने मोह माया को अपने गले लगा लिया है । जब भी कोई भक्त उनकी एयरकंडीशड कार या कमरे की बात करता है तो वे उस भक्त को समझाते हैं कि ये सब वो भक्तों को इस मोह माया से दूर करने के लिए कर रहे हैं और जो नहीं समझता उसे समझाने के पुलसिया तरीके भी उनको आते हैं। हम जैसे मूर्खों को ज्ञान देने के लिए वे इन्हें धारण करने का कष्ट उठाते रहे हैं । साधु, साधु, साधवी !
जब भी सरकार पर संकट आता है, मंत्राी- मंडल बनता बिगड़ता है, सीबीआई की जॉच बैठती है या फिर चुनाव के लिए टिकट बंटते हैं तो आश्रम की शोभा देखने वाली होती है । लगता है जैसे देवता स्वर्ग से उतरकर धरती पर आ गए हैं । ऐसे में पवित्रा भारतभूमि की अप्सराएँ, संत महात्माओं की सेवा कर कृतकृत्य होती हैं । जो अप्सराएँ सेवा करने के लिए ना नुकुर करती हैं वो बाबाओं के कोप का भाजन बनती हैं। केवल अप्सराएँ ही क्यों संतों के इस प्रसाद को आश्रम के सेवकों को भी समान भाव से ग्रहण करना पड़ता है । बाबा समदर्शी हैं, उनकी साधना की राह में जो भी आता है उसे इस असार संसार से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है । बाबा के कोप में भी जीव की मुक्ति का मार्ग छिपा हुआ है । धन्य हैं बाबा, धन्य है उनकी भक्तवत्सलता । इस भक्तवत्सलता को अंधा कानून कहाँ समझता है । जो सूरदास हो, जिसकी ऑंखों पर गंधारी की तरह पट्टी बंधी हो, वो संतों की लीला को कहाँ समझ सकता है । संतों की लीला को समझने के लिए तो अन्दर की ऑंखें चाहिए, बाहरी चक्षु तो भ्रम ही पैदा करते हैं ।
मैंनें कहा, ''प्रभु मन बहुत अशांत रहता है । आपके भक्त चाहते हैं कि आप हमारे शहर में अपना प्रवचन कर हमें कृतार्थ करें ।'' संत बोले - विचार उत्तम है । संसार में पाप बहुत बढ़ गया है । सांसारिक मोह माया से ग्रस्त प्रभु से दूर होते जा रहे हैं । एक सच्चा गुरु ही भक्तों को ज्ञान दे सकता है, सच्चा मार्ग दिखा सकता है । कितने भक्त हमारा प्रवचन सुनना चाहते हैं ?'' मैंनें गर्व से कहा - लगभग दस हजार प्रभु । '' प्रभु ने मेरा गर्व खंडित करते हुए कहा,''पचास हजार से कम की सभा में हम नहीं जाते है। हमारे लिए कैसी व्यवस्था होनी चाहिए, ये सब आपको व्यवस्थानंद जी बता देंगें ।'' व्यवस्थानंद जी ने बताया कि बाबा एक प्रवचन का कम- से कम डेढ़ लाख लेते हैं पर क्योंकि मैं उनका 'अपना' हूँ इसलिए एक लाख लेंगें।
(हमारे पड़ोस का बनिया भी मुझे अपना मान डिस्काउंट देता है ।) इसके अतिरिक्त बाबा के तथा उनके अनुचरों की व्यवस्था के लिए बीस हज़ार, आने-जाने के पंद्रह हजार आदि-आदि करते अनादि ब्रह्म के उस भक्त ने तीन लाख का बजट बना दिया ।''
मुझ अज्ञानी ने कहा – “तीन लाख ! ये तो बहुत है, इतना धन कहाँ से आएगा ?'' व्यवस्थानंद ने समझाया - बाबा के नाम पर यदि इतना भी नहीं एकत्रिात कर सकते तो तुम्हारी भक्ति और भक्त-बुद्धि को धिक्कार है । भक्त तो वर्ष में बाबा के एक बार के सतसंग के माध्यम से अपने और परिवार के लिए वर्षभर का जुगाड़ बिठा लेते हैं । इसका अर्थ हुआ कि तुम अभी बाबा की महिमा का मूल्य नहीं समझते हो । अभी अज्ञानी और नासमझ हो ।
सचमुच मैं नासमझ ही हूँ वरना मंत्री महोदय के उस संकेत का अर्थ समझ जाता जो उन्होंनें मुझे प्राधिकरण की अध्यक्षता थमाते हुए दिया था - '' ये कुर्सी तुम्हें पार्टी की सेवा के लिए दी जा रही है। हर माह एक करोड़ पार्टी को पहुँच जाना चाहिए ।'' बीस हज़ार की मासिक रुपल्ली देने वाली कुर्सी से करोड़ों का दूध कैसे दुहा जाता है मुझ अज्ञानी को पता नहीं था अत: मैंनें हकलाते हुए कहा - '' इतना पैसा मैं कहाँ से जुटाउंगा? '' हकलाने वालों के लिए सत्ता के गलियारों में कोई स्थान नहीं होता । देश के कर्णधार मुस्कराए और बोले - हमारा राजनैतिक दल सत्ता में है और सत्ता के आसपास भिनभिनाते भंवरों से रस कैसे निकाला जाता है, इसका भी तुम्हें ज्ञान नहीं । इन भंवरों को हम लोग फूलों पर बैठने के अनुमति देते हैं, उनका मधु चूसने का अवसर देते हैं और यदि उन भंवरों से रस संग्रह करने की तकनीक तुम्हें नहीं आती है तो तुम अभी इस स्थान के योग्य नहीं हो, कुछ समय पांडे जी के साथ रहकर दीक्षा ग्रहण करो, कुछ राजनैतिक संस्कार ग्रहण करो ।'' यह कहकर उन्होंनें, 'नैक्स्ट' कहा और मेरे स्थान पर किसी ज्ञानी को बैठा दिया । मेरे स्थान पर जो ज्ञानी बैठा, उसने प्रभु का दूध से अभिषेक किया, स्वयं मलाई खाई और भक्तों को छाछ पिलाया ।
राजनैतिक और धार्मिक संतों की महिमा का मूल्य न समझने के कारण मुझे धर्म और सत्ता, दोनों की हानि हुई । जब जब ऐसी हानि होती है तो हानि ही होती है तथा इस हानि के फलस्वरूप कोई अवतार भी नहीं लेता है। प्रतीक्षा व्यर्थ है अबोध बालक!
तुलसी और कबीर जैसे संतों नें मानव जीवन को अनमोल कहा है, आजकल के संतो ने उस अनमोल जीवन का मूल्य एकत्रित किया है । आजकल के संतों ने ही सार को ग्रहण किया है तथा थोथा अपने भक्तों को प्रसाद रूप में दे दिया है ।
मेरे तुच्छ से मस्तिष्क में ये तुच्छ से सवाल आते हैं - यदि सभी जीवों में एक ही आत्मा है तो कुत्ते और मेरी आत्मा में क्या अंतर है ? सबमें तो वो ही जीव है जो उस अलक्ष्य का अंश है ,अब अगर मैं मनुष्य की योनी या कुत्ते की योनी में जन्म लेता हूं तो क्या अंतर पड़ जाता है ? अनेक ऐसे मानव है जिन्होनें जन्म तो मानव योनी में लिया है पर कर्म कुत्ते से भी गए बीते हैं । उनसे तो कुत्ता ही बेहतर । कुत्ते भी कहते हुए पाए जाते हैं कि ऐसे मानव के जीव को हम अपनी योनी में नहीं घुसने देंगें ।
जानवर का जन्म क्या अच्छा नहीं है संतो ! मेरे विचार से पशु - योनी में जन्म लेकर जीव सत्तर प्रतिशत संत हो जाता है । उसे न मकान की चिंता रहती है, न भ्रष्टाचार करने की आवश्यकता पड़ती है । न वह मनुष्यों का चारा खाता हैं न रक्षा साधनों में कुछ डकारता है । न काहू से कोई दोस्ती न काहू से बैर जैसा स्वभाव होता है उनका । मालिक ने जो कहा उसे ही सत्य माना । स्वामी के प्रति जो भक्ति डिवोशन कुत्तागिरी मिलती है वैसी क्या किसी संत में भी मिल सकती है । संतन को कभी-कभी सीकरी से काम हो जाता है पर जानवरों को किसी सीकरी से काम नहीं होता है हां सीकरी को अनेक बार वफादार कुत्तों से अवश्य काम पड़ जाता है, उनकी वफादारी से सीकरी बची रहती है । मानव-जन्म लेकर तो प्रभु को भी लीला करनी पड़ती है अपनी पत्नी का अपहरण करवाना पड़ता है उसे वनवास भेजना पड़ता है, शम्बूक जैसों की हत्या करनी पड़ती है । कुत्ते के जन्म में तो जीव धर्मराज के संग स्वर्गारोहण के लिए जाता है । जीवन में कुत्तागिरी भी कितनी फलीभूत हो जाती है ।
भक्त लोग स्वयं ही निर्णय करें कि प्रभु प्राप्ति के लिए मनुष्य जीवन अनमोल है कि पशु जीवन । संत बनने के लिए स्वयं को कुटिल खल कामी कहना उचित है अथवा भक्तों को इसका अहसास दिलाना कि उनसे बड़ा कुटिल, खल, कामी कोई नहीं । कुटिल मन के चेहरे पर सरलता की मुस्कान बिखेरना सरल काम नहीं है । बहुत साधना करनी पड़ती है तब जाकर चेहरे पर आध्यात्मिक तेज, मोहक मुस्कान आ पाती है तथा वाणी मछली फांसने का कांटा बन पाती है ।
जीवन की गंदगी को आत्मीय भाव से ग्रहण कर उससे लिपटे सूअर को आपने देखा है, चेहरे पर कैसा संतई का भाव होता है ! ऐसा ही संतई का भाव मुझे आजकल के बाबाओं और संतों के चेहरों पर दिखाई देता है । धन्य हैं हमारे कलयुगी संत जिन्हें माया मोह की गंदगी से लिपटे रहने के बावजूद उससे घिन्न नहीं आती है । ये दीगर बात है कि मूर्ख अज्ञानियों को उनसे घिन्न आती है । मैं भी ऐसा ही मूर्ख अज्ञानी हूँ । प्रभु मुझे क्षमा करें क्योकि मेरे ऑंख, कान और मेरा मुँह बापू के बन्दरों की तरह सत्ता के हाथों द्वारा बन्द नहीं है । oप्रेम जनमेजय संपादक-व्यंग्य यात्रा 73 साक्षर अपार्टमेंट्स ए- 3 पश्चिम विहार, नई दिल्ली - 110063
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