रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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व्यक्तित्व

 

           प्रशासनिक संस्कृति- स्मरणीय संस्मरण

-डॉ.महेश चंद्र द्विवेदी

(उत्तरप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं साहित्यकार डॉ. महेश चंद्र द्विवेदी इधर लगातार अपनी रचनात्कमकता से साहित्य जगत् को आकृष्ट करते रहे हैं । हिंदी और अंगरेंज़ी दोनों में समानांतर लेखन रत श्री द्विवेदी की कहानियों एवं व्यंग्य में समकालीन दुनिया की विद्रुपताओं का धुमिल चेहरा साफ-साफ देखा जा सकता है । पुलिस प्रशासन के अंदरूनी हिस्सों को परत-परत खोलता आत्मकथात्मक संस्मरण का पहला भाग आपने सृजनगाथा के मार्च अक में पढ़ा । प्रस्तुत है दूसरा भाग। हमारे पाठकगण इसे आगामी अंकों में लगातार पढ़ सकेंगे । आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी - संपादक )

 

3- कमिट सुइसाइड, रिजाइन, टेक लीव ऐण्ड गो होम-स्टि्क्टली इन दैट आर्डर

 

         यद्यपि पुलिस ट्रेनिंग कालेज, मुरादाबाद के वाइस प्रिंसिपल श्री श्रीवास्तव का आईपीएस प्रोबेशनरों को दिया गया प्रथम उपदेश कि सफल पुलिस आफ़िसर बनने के लिये सेंट्ल पुलिस ट्रेनिंग कालेज, माउंट आबू मे सीखा हुआ सब कुछ भूल जाइये, मुझे उनके व्यंग्यमय व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति प्रतीत हुई थी, परंतु मेरे भविष्य के सेवाकाल मे प्रतिदिन ऐसे अवसर आते रहे जो उनके उपदेश मे निहित सत्य को उजागर करते थे। मैने पाया कि माउंट आबू मे दी गई संविधान एवं कानून की शिक्षा का अक्षरश: पालन पुलिसजन को आदर्श जनतांत्रिक व्यवस्था मे तो 70-80 प्रतिशत तक  सफलता दिला सकती है परंतु भारतीय सामाजिक, राजनैतिक एवं न्यायिक परिवेश मे इसका अक्षरश: अनुपालन न केवल आत्मघाती होगा वरन्  समाजघाती भी होगा। इस सम्बंध मे एक घटना का वर्णन रुचिकर, ज्ञानवर्धक एवं आवश्यक प्रतीत होता है।

 

       प्रशिक्षण के बाद मेरी प्रथम नियुक्ति सर्किल आफीसर, फूलपुर, इलाहाबाद के पद पर हुई थी। एक दिन थाना सराय ममरेज़ से वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पास सूचना आई कि एक गाँव मे एक चोर चोरी करने गया था जिसे गांववालों ने मार दिया है। मुझे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने घटनास्थल पर जाकर जांच व आवश्यक कार्यवाही करने का आदेश दिया। मैने गांव मे जाकर पूछताछ की तो सभी ने मेरे समक्ष बयान दिया कि चोर सेंध लगाकर घर मे घुसा था कि तभी जगहर हो गई और चोर घर से भागा। गांव वालों ने उसे दौडाया और मारपीट की जिससे उसकी मृत्यु हो गई। मुझे माउंट आबू मे पढाया गया था कि रात के समय चोर घर के अंदर हो, तब  तो उसे पकड़ने के लिये आवश्यक होने पर इतनी चोट पहुंचाई जा सकती है जो उसकी मृत्यु का कारण बन जाये, परंतु उसके घर से बाहर निकलकर भागने पर इतनी चोट पहुंचाना एक संज्ञेय और गम्भीर अपराध है। अत: मैने ग्रामीणों के बयान के आधार पर उन्हीं के विरुद्ध मुकदमा कायम करा दिया। शाम को इलाहाबाद वापस आने पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को मैने घटना की पूरी रिपोर्ट दी। मेरे द्वारा यह बताने पर कि मैने ग्रामीणों के विरुद्ध मुकदमा कायम करा दिया है, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जो अपनी संयत भाषा के लिये विख्यात थे, अपने को रोक न सके और बोल पडे,मैने ऐसा चूतिया पुलिस आफीसर तो अपनी ज़िदगी मे नहीं देखा है।

       

         बाद मे एक दिन मुझे बुलाकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समझाने लगे,''

    आई ऐम सौरी फौर माई वर्ड्स, बट यू शुड रिएलाइज् दैट इफ़ दी

    विलेजर्स विल बी पा्रैसीक्यूटेड इन सच केसेज़, हू विल कम आउट टु

    फेस थीव्ज़ ऐंड डैक्वाइट्स''। तब कुछ कुछ मेरी समझ मे आया कि

    अनुभवी वाइस प्रिंसिपल ने हम लोगों को माउंट आबू की पढाई भूल

    जाने को क्यों कहा था।

 

        पर ऐसा नहीं है कि इन अनुभवी वाइस प्रिंसिपल ने हमे जो-जो भी बताया, वह सब शत-प्रतिशत यथावत सही निकला हो। एक दिन उत्तर प्रदेश मे डकैती की समस्या पर वाइस-प्रिंसिपल महोदय ने अपना भाषण इस प्रकार प्रारंभ किया था,'' डेक्वाइटी इज़ दी मोस्ट इम्पौर्टेंट क्राइम ऐंड इट इज़ दी प्राइमरी रेस्पौंसिबिलिटी आफ़ दी एस पी टु कंट्ोल डेक्वाइटी इन हिज़ डिस्टि्क्ट, ऐंड इफ़ ही फेल्स टु डू इट, ही शुड कमिट सुइसाइडड, रिजाइन, टेक लीव, ऐंड गो

 

 

       होम - स्टि्क्अली इन दैट और्डर'' अत: सर्किल आफीसर, फूलपुर के पद पर नियुक्ति के दौरान मेरे मस्तिष्क मे अपने सर्किल मे डकैती न पड़ने देने की गम्भीर चिंता रहती थी। इसी बीच मेरे बगल के सर्किल मे ताबड़तोड़ डकैतियां पडीं और क्राइम मीटिंग मे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने इस विषय मे काफी क़ुछ कहा। फिर उस सर्किल के सर्किल आफिसर की तबियत खराब हो गई, जिससे वह छुट्टी पर चले गये। उस सर्किल का चार्ज मथुरा सिंह, जो कानिस्टिबिल के पद से प्रोन्नत होकर सर्किल आफ़िसर बने थे, को दे दिया गया। और आश्चर्य कि उनके चार्ज लेते ही उस सर्किल मे नई डकैतियों की संख्या नगण्य हो गई और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने संतोष की सांस लीं। एक दिन हम तीन-चार सर्किल आफ़िसर जब आपस मे बातें कर रहे थे तो मथुरासिंह बोले, '' डकैती रोकने मे क्या है? मुझे किसी ज़िले का कोई भी सर्किल दे दिया जाय, मै एक दिन मे डकैती रोक दूंगा।'' मै आश्चर्यचकित था परंतु उनके सामने कुछ बोला नहीं। उनके वहा से उठ जाने के बाद दूसरे सर्किल आफ़िसर ने स्वत: बताया, '' डकैती-कंटो्ल मे मथुरासिंह बडे नामी हैं। पहली मीटिंग मे ही थानेदारों को स्पष्ट कर देते हैं कि यदि किसी के थाने मे डकैती लिखी गई तो मिस्कंडक्ट एंट्री दिला देंगे और अगर दूसरी लिखी गई तो छोटे दरोगा बनवा देंगे। बस फिर क्या है अगर डकैती के दौरान दो-एक लोग मारे भी जाते हैं तो थानेदार घटना को धारा 396 आईपीसी क़ी जगह धारा 460 आईपीसी में दर्ज करता है, जो चोरी की श्रेणी मे रखा जाता है।''

 

      तब मुझे डकैती कंट्रोल का असली रहस्य कुछ-कुछ समझ मे आया। और यह भी समझ मे आया कि डकैतिया तो गाव-गाव मे रोज़ पड़ती रहतीं हैं फिर भी आज तक किसी पुलिस अधीक्षक ने वाइस प्रिंसिपल महोदय की 'कमिट सुइसाइड, रिजाइन, टेक लव ऐंड गो होम' की सलाह पर अमल क्यों नहीं किया।

 

      वैसे मथुरा सिंह को मै आजकल के पुलिस अधिकारियों के पासंग के बराबर भी नहीं मानता हूं क्योंकि आजकल जब उनकी नियुक्तिया माहवारी टेंडर पर हो रही हैं और तब भी डकैती समेत सभी अपराधों का ग्राफ उन्होने मुख्यमंत्री के आदेशानुसार 70 प्रतिशत गिरा दिया है।

 

4- मुकदमा खराब करना हो तो चौकीदार या एसपी क़ो गवाही मे पेश कर दो

 

       मेरे पिता जी अंग्रेजी ज़माने के पुलिसवाले थे और थानेदार के पद से सेवानिवृत्त हुये थे। उनके ज़माने मे एस पी, ज़ो प्रायः अंग्रेज़ होता था, से बडे बडे लोग घबराते थे। पुलिस विभाग के थानाध्यक्ष भी पूर्वानुमति, जो डिप्टी एस पी क़ी संस्तुति पर ही मिलती थी, प्राप्त करने के उपरांत ही एस पी के समक्ष पेश हो सकते थे; और फिर एस पी से उन्हें डॉट-फटकार या गेट-आउट ही सुनने को मिलती थी। अत: जब मै पी टी सी से आई पी एस क़ा प्रशिक्षण पूरा कर बवर्दी-दुरुस्त अपने गाव गया था, तो मेरे पिता जी मेरी मॉ से हसकर बोले थे, '' जिनके सामने जाने मे परियां घुटने कांपतीं थीं, वह अब आंगन मे नाच रहे हैं।''

 

       मुझे उस समय प्रसन्नता एवं गर्व दोनों का अनुभव हुआ था। गर्व की भावना मुख्यत: पुलिस सेवा के विभिन्न स्तर के पदों की मान-मर्यादा के अंतर एवं निम्न स्तर के कर्मचारियों द्वारा उच्चधिकारियों के हर प्रकार के आदेशों का अनुपालन करने की प्रथा पर आधारित थी। आगे चलकर यह पदगत भेदभाव, जो प्रशासकीय एवं व्यक्तिगत व्यवहार मे सभी पुलिसकर्मियों को स्वीकार्य था एवं सबसे अपेक्षित भी था, मेरे एवं अन्य साथी अधिकारियों के स्वभाव मे समा गया था। यह भेदभाव हमारे सामंती समाज के मूल्यों की देन तो था ही, साथ ही साथ अंग्रेजों द्वारा भी उसे पोषित किया गया था, क्योंकि शासक और शापित का अंतर बनाये रखने मे यह बडा कारगर अस्त्र था। मैने अपने बचपन मे एक नौटंकी देखी थी जिसमे जोकर ने एक गाना गाया था,

 

     ''खुशामद मे ही आमद है, इसी से बडी ख़ुशामद है।''

 

     इस पंक्ति मे अंतर्निहित भाव प्रायः हम भारतीयों के मानस मे सदैव विद्यमान रहता है और प्रशासकों मे वह और अधिक पुष्ट हो जाता है। यह भाव जहां एक ओर उन व्यक्तियों, जो अपने को हानि अथवा लाभ पहुचा सकते हैं, को प्रसन्न करने हेतु कृत्य अथवा अकृत्य सब कुछ करने को प्रेरित करता है, वहीं दूसरी ओर पुलिसकर्मियों मे घोर अनुशासन की मानसिकता भी उत्पन्न करता है, जो भारतीय समाज मे शांति एवं स्थिरता बनाये रखने के हित मे आवश्यक है। इसी मानसिकता के कारण वे उच्चाधिकारियों का रुख देखकर कानून व्यवस्था बनाये रखने हेतु अथवा अपराधियों को दण्डित कराने हेतु असत्यवादन अथवा झूठी गवाही तैयार करने से कतराते नहीं हैं। मैने अपने सेवाकाल के दौरान पाया कि भारतीय परिस्थितियों मे, जहा जनसाधारण की दिनचर्या तथा राजनैतिक एवं न्यायिक व्यवस्था मुख्यत: असत्य पर आधारित है, ऐसा अनुशासन का भक्तिभाव बहुत हद तक पुलिस कार्य मे वांछनीय परिणाम दिलाने मे उपयोगी है। मेरा अनुभवजन्य विश्वास है कि पुलिस का पूर्ण रूप से सत्य पर कायम रहना एवं लिखित कानून का दृढ़ता से पालन करना समाज मे अराजक तत्वों का वर्चस्व स्थापित करने का कारक बन सकता है, क्योंकि 'लोहा झूठ एवं फ़रेब को लोहा ही काट सकता है'। मुझे एक बडे अनुभवी पुलिस अधिकारी ने बताया था कि यदि कचहरी मे मुकदमा खराब करना अभियुक्त को सजा से बचाना हो, तो चौकीदार या एस पी क़ो गवाही मे पेश कर दो- चौकीदार समझ मे कमी के कारण कुछ ऐसा बोल देगा कि अभियुक्त छूट जायेगा और एस पी सिर्फ़ सच बोलेगा जिससे अभियुक्त छूट जायेगा।

 

      स्पष्टत: उस पुलिस अधिकारी ने अपने अनुभव से यह ज्ञान अर्जित किया था कि सत्य बोलकर किसी अपराधी को दंडित कराना लगभग असम्भव है। कालांतर मे मैने पाया कि सत्याचरण द्वारा प्राय: सम्भावित शांति-भंग की स्थिति को भी नियंत्रित करना कठिन होता है, क्योंकि नेताओं द्वारा भावावेश उभाड़कर लायी गई भीड़ सत्य से प्रभावित नहीं होती है वरन् चाहे असत्य ही क्यों न हो, अपनी मनमाफ़िक बात सुनकर शांत हो जाती है।

 

       मै वर्ष 1974 मे एस पी सहारनपुर था और उन दिनों चुनावी माहौल चल रहा था। कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग वहा मुस्लिमों मे अपना अपना प्रभाव बढाने मे जुटी हुई थीं। होली के दिन लगभग 10 बजे मुझे वायरलेस से सूचना मिली कि एक पुलिस चौकी को मुसलमानों ने घेर रखा है। उनका आरोप है कि एक हाजी की दाढी पर हिंदुओं ने रंग फेंका और आपत्ति करने पर उसकी दाढी पकड़कर इतनी जोर से खींची कि उसकी मृत्यु हो गयी। हजारों मुस्लिम उस व्यक्ति को एक चारपाई पर लिटाकर जुलूस बनाकर आये हैं और मांग कर रहे हैं कि हत्यारों को तुरंत पकडा जाये नहीं तो खू.न का बदला खू.न से लेंगे। चुनावी माहौल मे इस प्रकार की घटना गम्भीर दंगे का रूप लेने मे कुछ भी देर नहीं लगती है, अत: मै अविलम्ब चौकी की ओर चल दिया। वहां मैने जब चौकी इंचार्ज से बात की तो उसने बताया कि उसे पता चला है कि हाजी झूठमूठ मुर्दा बनकर पडा है, चुनाव मे मुस्लिमों को अपने पक्ष मे करने हेतु मुस्लिम लीग वाले दंगा कराने के उद्येश्य से उसे लिटाकर लाये हैं।

 

      मैने सोचा कि अगर उस समय भीड़ को सच बात बतायी जाये, तो भीड़ के नेता उन्हें किसी प्रकार की सत्यता की जांच का मौका मिलने से पहले ही दंगा करा देंगे, क्योंकि तथ्य तो केवल नेताओं को ज्ञात होगा, और शेष भीड़ उनके छलावे पर विश्वास कर रही होगी। अत: मैने भीड़ को सम्बोधित करने से पहले पुलिसजन भेजकर चार साधारण स्तर के लोगों को पकड़वा कर चौकी पर बिठा लिया और फिर कुर्सी पर खडे होकर भाईचारा पर संक्षिप्त भाषण देते हुए मैने घोषणा की कि हाजी जी पर रंग डालने और आक्रमण करने वालों को पकड़ लिया गया है । अगर वे चाहें तो दो-दो व्यक्ति अंदर आकर देख सकते हैं। बस फिर क्या था- रोष का आधार ही समाप्त हो गया और भीड़ हाजी जी की चारपाई उठाकर छंटने लगी।

 

       थोड़ी देर बाद संतरी, जो गेट पर खडा था, ने आकर बताया कि चौकी से बाहर निकलते ही हाजी जी चारपाई से उतरकर पैदल चलने लगे थे। जिन व्यक्तियों को पकड़कर चौकी पर लाया गया था, उन्हें चाय पिलाकर और होली की बधाई देकर हम लोगों ने विदा कर दिया। बिना बात पकडे ज़ाने पर बुरा मानने के बजाय वे प्रसन्न एवं आश्चर्यचकित थे कि पुलिसवालों ने उन्हें न मारा-पीटा, न जेल भेजा और चाय भी पिलाई।

(क्रमशः अगले अंक में)

Oमहेश चंद्र द्विवेदी

ज्ञान प्रसार संस्थान

1/137, विवेक खंड, गोमती नगर

लखनऊ, उत्तरप्रदेश-226010

 

 

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