|
|
||||||||||
|
|
||||||||||
|
|||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||
लघुकथा एक तेजस्वी विधा है* -कमल किशोर गोयनका लघुकथा एक शक्तिशाली विधा है । वह अत्यंत सीमित कालावधि में पाठक को एक ऐसे संसार में ले जाती है जो उसके आसपास होता है, पर उसका घनीभूत प्रभाव उस कलात्मक रचना को पढ़कर ही उसके मन पर पड़ता है । यह प्रभाव पाठक को भाव-विह्वलता एवं उत्तेजना से भर देता है और वह जहाँ पीड़ित मनुष्य के प्रति संवेदनशील हो उठता है, वहा वह पीड़क के प्रति आक्रोश से भर जाता है । पाठक को इस मानसिक स्थिति तक पहुँचा देने में लघुकथा का तेवर ही सर्वाधिक उत्तरदायी है, क्योंकि लघुकथा का सरोकार तथा उसकी धार इतनी पैनी तथा आक्रामक है कि वह पाठक को घायल किए बिना नहीं मानती । लघुकथा के तेवर की यही कसौटी है कि वह अपने समय का सत्य होती है । वह अपने पाठक को अपने अनुकूल बना लेती है ।
लघुकथा की अवधारणा और परिभाषा ‘लघुकथा’ शब्द में घटना अथवा बिंब को उभारने अथवा उतारने की सार्थकता निहित है । लघुकथा शब्द से स्पष्ट है कि इसमें कथा का लघु रूप है, अर्थात् उपन्यास, कहानी की तुलना में लघुकथा में कथा का तत्व लघु है जो सुक्ष्म से सुक्ष्म हो सकता है, धागे और पतली लकीर-सा । इससे एक और बात भी स्पष्ट है कि लघुकथा में कथातत्व अनिवार्य है । इसके अभाव में लघुकथा नहीं हो सकती है, बाकी उसे आप जो भी कहना चाहें । ऐसी स्थिति में लघुकथाकार का मुख्य दायित्व ही यह होता है कि वह अपनी रचना में कथातत्व को साकार कर दे, चाहे वह क्षण की अनुभूति ही क्यों न हो ।
अनेक लघुकथाकारों ने लघुकथा की अनेक प्रकार से परिभाषा दी है, फिर भी कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं आ पाई है । असल में अभी यह संभव भी नहीं है । साहित्य में जो विधा अभी युवा भी नहीं हो पाई है, उसे परिभाषा में बाँधना उचित नहीं है । मैं भी यदि लघुकथा की परिभाषा दूँगा तो वह कितनी स्वीकृत होगी, कह नहीं सकता । मेरे विचार में लघुकथा की सर्वोत्तम परिभाषा यही हो सकती है कि वह मानव-जीवन की आलोचना है । जहाँ तक आवश्यक तत्वों का प्रश्न है, लघुकथा में ‘कथा’ का होना आवश्यक है । ‘लघुकथा’ शब्द में ‘कथा’ शब्द इसी का प्रतीक है, अन्यथा ‘कथा’ शब्द को संयुक्त करने की आवश्यकता ही नहीं थी । इसके साथ लघुकथा को आज के समय के सत्य का वाहक भी होना है, लेकिन यह अभिव्यक्ति कलापूर्ण होनी चाहिए । लघुकथा आज स्थूल रूप लेती जा रही है । अधिकांश लघुकथाएं रचना बन ही नहीं पातीं । इस स्थिति को तोड़ना होगा । लघुकथा की जो परिभाषाएँ दी गईं हैं, उनमें प्रायः लघुकथा की विशेषताओं तथा उपकरणों को गिनाने की चेष्टा अधिक है, उसकी मूल आत्मा को पकड़ने की कम । असल में लघुकथा भी साहित्य की एक विधा है और उस पर साहित्य के सभी सामान्य नियम लागू होते हैं । यह ठीक है, वह एक स्वतंत्र विधा है, परंतु है वह साहित्य की ही न, तब वह साहित्य की मूल प्रवृत्तियों से स्वयं को मुक्त नहीं कर सकती । लघुकथा का जन्म लघुकथा बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों की प्रमुख विधाओं में से एक है और इसका रूपाकार तथा इसकी अवधारणा इसी कालखंड में निधारित होनी है । लघुकथा और कहानी एक ही कुल की संतानें है, लेकिन इससे सिद्ध नहीं होता कि लघुकथा कहानी का छोटा रूप है । लघुकथा अब एक स्वतंत्र विधा है, वैसे ही जैसे उपन्यास और कहानी एक ही कुल में जन्म लेने पर भी स्वतंत्र विधाएं है ।
लघुकथा के जन्म के संबंध में कई विचार हैं । कुछ का विचार है कि हमारी प्राचीन बोध-कथाओं, नीति-कथाओं की प्रेरणा से लघुकथा का जन्म हुआ है, और कुछ का विचार है कि पश्चिम से कहानी जब हिंदी में आई तो उसके कारण लघुकथा भी लिखी जाने लगी । मेरे विचार से लघुकथा का कहानी से गहरा संबंध है । यही कारण है कि कहानी के रचना-काल से ही लघुकथा भी लिखी जाने लगी थी । स्वयं प्रेमचंद ने ही हिंदी-उर्दू में 6-7 लघुकथाएं लिखीं थीं । पर लघुकथा का विशिष्ट रूप सातवें दशक में दिखाई देता है और अब तो वह प्रत्येक पत्रिका में अपना दावा प्रस्तुत करती है । लघुकथा के प्रांरभिक काल के संबंध में शोध होने पर ही वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सकती है पर मेरे मत से 1901 में प्रकाशित कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ हिंदी की पहली लघुकथा है जिसे छत्तीसगढ़ के माधवराव सप्रे ने लिखी है । यह ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ (मासिक)में प्रकाशित हुई थी । इसे देवी प्रसाद वर्मा ने सारिका के फरवरी 1968 के अंक में हिंदी की पहली कहानी – कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न लेख के साथ प्रकाशित कराई थी । यह कहानी अपने आकार-प्रकार, संवेदना-शिल्प आदि की दृष्टि से पहली आधुनिक लघुकथा के रूप में स्वीकृत होने की अधिकारिणी है । अब यह लघुकथा-प्रेमियों, शोधार्थियों तथा समीक्षकों को चाहिए कि इस दावे की परीक्षा करें और साथ ही 1901 के बाद की लघुकथाओं को खोजें तथा प्रारंभिक काल की लघुकथाओं के संकलन प्रकाशित करें । मैंने पहले एक लेख प्रकाशित किया था – ‘प्रेमचंदःलघु कहानी के जनक’ । यह लेख मैंने कई वर्ष पहले लिखा था और तब मैंने माधवराव सप्रे की कहानी – एक टोकरी भर मिट्टी- पढ़ी नहीं थी । अतः अब मैं प्रेमचंद को लघु कहानी का जनक न कहकर उन्हें इस विधा की प्रकृति को समझनेवाला लघुकथाकार कहना चाहूँगा ।
कहानी की तरह ही वर्तमान लघुकथा भी आधुनिक जीवन की देन है, इस अर्थ में कि यह सीधे मनुष्य की परिस्थितियों, उसके तनाव और संघर्ष तथा अस्तित्व एवं नियति से जुड़ी होती है । लघुकथा की यह आधुनिक चेतना ही उसे ‘आधुनिक’ बनाती है । इस तरह पुरानी लघुकथा को परंपरागत और आज की लघुकथा को आधुनिक कहने में मेरी सहमति है । लघुकथा का आकार-प्रारूप जहाँ तक लघुकथा के प्रारूप का पश्न है उसका सर्वमान्य उत्तर कठिन है । साहित्य में पहले से कुछ भी निर्धारित नहीं होता और न हो सकता है । नई-नई अभिनव कल्पनाएँ करनेवाले लेखक आते हैं तथा स्थापित मान्यताओं को भंजित कर नई रचना देकर नई परंपरा आरंभ करते हैं । अतः लघुकथा के प्रारूप को शब्दों में परिभाषित करना मुझे तो कठिन लगता है ।
लघुकथा का अर्थ है – ऐसी कथा जो लघु हो । लघुकथा की यह लघुता कहानी की सापेक्षता में ही तय हो सकती है, क्योंकि कहानी से स्वयं को अलग करने के लिए ही लघुकथा ने अपना विशिष्ट रूपाकार बनाया है । लघुकथा को उसकी शब्द-सीमा से पहचानने की चेष्टा मुझे अनुचित लगती है । क्योंकि शब्द-सीमा, शब्द-संख्या या शब्दों का समूह रचना नहीं बनाते, बल्कि उन शब्दों में छिपी संवेदना की संजीवनी-शक्ति ही ही उनमें प्राणों की प्रतिष्टा करती है । सामान्य रूप से कहानी यदि 10-12 पृष्ठों की मानी जाए तो लघुकथा 4-5 पृष्ठ अर्थात् 1500 शब्दों से बड़ी नहीं होना चाहिए । यह इसकी अधिकतम सीमा हो सकती है, परंतु इसकी लघुसीमा भी तय की जानी चाहिए । अफसोस की बात है कि इस पर किसी लघुकथाकार ने विचार नहीं किया, जिसके कारण 2-3 पंक्तियाँ के संवाद, चुटकुले, परिहास, विनोद, उक्तियाँ भी लघुकथा बतलाकर प्रकाशित हो रही हैं । यह अत्यंत दुःखद स्थिति है, जिस पर अंकुश आवश्यक है ।
लघुकथा में शीर्षक लघुकथा में शीर्षक ही वह बिंदु है जिससे पाठक की अध्ययन-यात्रा शुरू होती है और उसका अंत भी इसी बिंदु पर होता है । पाठक सबसे पहले लघुकथा का शीर्षक ही पढ़ता है और यदि वह उसे आकर्षक प्रतीत होता है तो वह लघुकथा को पढ़ता है और उसकी भाव-भूमि से गुज़रता है । यदि शीर्षक अनाकर्षक है तथा पाठक के मन में लघुकथा को पढ़ने के लिए उत्सुकता पैदा नहीं करता तो ऐसी लघुकथा की पाठक उपेक्षा कर देता है और वह पाठक की संवेदना का हिस्सा नहीं बन पाती । अतः यह आवश्यक है कि लघुकथा का शीर्षक आकर्षक, मौलिक, संक्षिप्त तथा जिज्ञासा उत्पन्न करने एवं उसकी संवेदना के केंद्रीय बिंदु को प्रस्तुत करनेवाला हो । लघुकथाकार को शीर्षक का चयन बड़ी सावधानी से करना चाहिए । शीर्षक की विशेषता यह हो कि तीर की तरह पाठक के हृदय में घुसकर उसे बेचैन बना दे । वह लघुकथा को पढ़ने के लिए विवश हो जाए । वास्तव में, शीर्षक लघुकथा के मस्तिष्क पर लगा तिलक है जो लघुकथा की आतमा को सांकेतिक रूप में अभिव्यक्त करता है । इससे रचना के रसास्वादन की भूमिका तैयार हो जाती है और पाठक रचना तक पहुँच पाता है ।
लघुकथा, कहानी और व्यंग्य एक पाठक की हैसियत से मुझे कहानी और लघुकथा दो भिन्न-भिन्न विधाएँ लगती हैं । लघुकथा का अपना रचना-तंत्र है, जो उसने धीरे-धीरे विकसित कर लिया है । कहानी और लघुकथा के कथानक में मेरे विचार से काफी बड़ा अंतर है । कहानी में कथा के साथ-साथ पात्र व परिवेश जुड़ा रहता है, जो उसका अनिवार्य हिस्सा होता है, लेकिन लघुकथा अत्यंत ही लघुविधा है और उसमें ऐसे अनिवार्यता नहीं है । उसके पात्र में जितनी कथा आ सकती है, उतनी ही समाएगी । लघुकथा में कहानी की कथा नहीं समा सकती है, जैसे दोहे में खंडकाव्य नहीं समा सकता। अतः मेरे विचार में लघुकथा में जो कथा का तत्व है वह एक क्षण का भी हो सकता है और दो का भी, लेकिन विस्तृत नहीं होना चाहिए । उसे ‘कंडेस’ करने की शक्ति लघुकथा में होनी चाहिए ।
जिसे मिनी कहानी कहा जा रहा है वह छोटी कहानी के अलावा और क्या है ? लेकिन लघुकथा के लिए नए-नए नामों का आविष्कार करने की होड़ सी लग गई है, मेरे मित्र डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी ने लघुकथा को लघुव्यंग्य का नाम दिया है और प्रमाणार्थ ‘व्यंग्य-ही-व्यंग्य’ शीर्षक से एक संकलन भी प्रकाशित किया है । एक लघु पत्रिका ने इसे ‘अणुकथा’ नाम दिया है । मेरे विचार में नामों के नए-नए आविष्कार ने अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है और हालत यह हो गई है कि एक रचना को लघुकथा कहता है, तो दूसरा मनी कथा, तीसरा लघुव्यंग्य और चौंथा अणुकथा । अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलापने में बड़ी अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है, जिसे निश्चय ही समाप्त होना चाहिए ।
जहाँ तक व्यंग्य का संबंध है, लघुकथा व्यंग्य का पर्याय नहीं है और न मैं यह मानता हूँ कि व्यंग्य के बिना कोई लघुकथा हो ही नहीं सकती । व्यंग्य लघुकथा की एक शक्ति है, उसे वह धारदार बनाता है, परंतु यह स्थिति तो अन्य विधाओं के साथ भी है । वैसे व्यंग्य का प्रयोग बड़ी कुशलता चाहता है । एक सिद्धहस्त लेखक ही व्यंग्य का कलात्मक प्रयोग कर सकता है, जो लघुकथाओं में बुहत कम दिखाई देता है । यदि व्यंग्य से, शुद्ध व्यंग्य के प्रति लेखकीय दुराग्रह से कला खंडित होती है तो ऐसी रचना क्षणिक प्रभाव के बाद समाप्त हो जाती है ।
लघुकथा और वैचारिकता साहित्य की अन्य विधाओं में वैचारिकता का जो स्थान है, वही लघुकथा में है । साहित्य भावनाप्रधान होता है, उसमें संवेदनाएं प्रमुख होती हैं और विचार-तत्व को भावना-अनुभूति से सहयोग करके चलना होता है । जब साहित्य में विचार प्रमुख हो जाता है, तो वह भावना को पंगु बना देता है और इस प्रकार साहित्य की मूर्ति खंडित हो जाती है । लघुकथा में भी यदि विचार प्रमुख हो गया तो वह नीरस होकर अलोकप्रिय हो जाएगी और पाठक के मन को झंकृत करने की क्षमता खो देगी । मैं विचारशून्य लघुकथा की कल्पना नहीं करता, वैसे ही जैसे मैं भावनाशून्य लघुकथा की कल्पना नहीं कर सकता । लघुकथा में भी भाव एवं विचार का उचित सम्मिलन होना चाहिए । लघुकथा का वर्तमान लघुकथा का वर्तमान स्थिति काफी हलचल से भरी है । देश के कई प्रांतों –हरियाणा, बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदि से नित-नए प्रकाशनो, विचार-गोष्ठियों, पुरस्कारों, पत्रिकाओं के विशेषांकों आदि के समाचार आते हैं । बिहार में तो राजकीय स्तर पर पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है । लघुपत्रिकाओं में जो विधा आंदोलन बनी, बड़ी पत्रिकाओं में वही बहुत दिनों तक उपेक्षा का शिकार रही है । लघुकथा का एक दुर्भाग्य और है कि इसे किसी बड़े लेखक का आशिर्वाद नहीं मिला और स्थिति इतनी खराब है कि जब कुछ बडे लेखकों के बीच लघुकथा पर बात की जाती है तो कोई मुँह बिगाड़कर कह उठता है कि लघुकथा भी कोई विधा है, और यह प्रतिभाहीन, छपास के भूखे तथा दस लघुकथा लिखकर राष्ट्रीय लेखक बनने के दिवास्वप्न लेनेवालों की विधा बन गई है ।
लघुकथा इस समय की सबसे चर्चित विधा है, कोई पत्रिका ऐसी नहीं जो लघुकथा न छापती हो । प्रत्येक छोटे-बड़े नगर-कस्बे में लघुकथाकारों के झुंड-के-झुंड आपको मिल जाएंगे । कुछ विश्वविद्यालयों ने अपने एमए के पाठ्यक्रम में लघुकथा को स्वीकार कर लिया है और कुछ शोधार्थी लघुकथा पर शोध भी कर रहे हैं । असल में लघुकथा धीरे-धीरे प्रतिष्ठित हो रही है । लघुकथा के विकास के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न हो रहे हैं । प्रत्येक वर्ष नए-नए संकलन आ रहे हैं, संगोष्ठियाँ हो रही है, आलोचना की पुस्तकें निकल रही हैं । मैं सोचता हूँ कि लघुकथा का इतिहास लिखा जाना चाहिए । नब्बे वर्षों की प्रतिनिधि लघुकथाओं का संकलन तैयार होना चाहिए । विदेशी भाषाओं और हिंदीतर भारतीय भाषाओं में रची श्रेष्ठ लघुकथाओं का हिंदी अनुवाद ज़रूरी है ।
लेकिन जो खटकने वाली बात है वह यह कि लघुकथाकार प्रतिष्ठित नहीं हो रहे हैं, जैसे कामायनी लिखकर जयशंकर प्रसाद, गोदान लिखकर प्रेमचंद, साकेत लिखकर मैथिलीशरण गुप्त और मैला आँचल लिखकर रेणु प्रतिष्ठित हुए थे । मुझे विधा की अपेक्षा इस विधा के लेखकों के राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित न होने की समस्या अधिक बड़ी दिखाई देती है, जो निश्चय ही एक गंभीर प्रश्न है । इस समय लघुकथा प्रायः वे लोग ही लिख रहे हैं, जिनमें कालजयी लेखक-जैसी प्रतिभा नहीं है । आज लेखकों की एक ऐसी भीड़ जुट गई है जो कुड़ा-करकट को लघुकथा अर्थात् एक साहित्यिक रचना कहकर पेश कर रही है, लेकिन कमज़ोर रचना किसी को ताकतवर लेखक नहीं बना सकती ।
लघुकथा में आज की स्थिति यह है कि चुटकुला, लोकोत्तियाँ, सुक्तियाँ आदि न जाने कितने प्रकार की गद्य-रचनाओं को लघुकथा कहकर परोसा जा रहा है, लेकिन उनसे लघुकथा-जैसा रसास्वादन प्राप्त नहीं होता । ये सभी लघुकथाएं हैं भी नहीं । आज लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी पैदा हो गई है जो कुछ महीनों में ही यशस्वी लेखक बन जाना चाहते हैं । शार्टकट संस्कृति अब साहित्य में भी आ गयी है, पर जीवन के अन्य क्षेत्रों में चाहे इससे कुछ उपलब्धियाँ हो जाएँ, साहित्य में तो यह असम्भव ही है । जो लेखक लघुकथा के नाम पर कूड़ा-कबाड़ा लिख रहे हैं और उन्हें छपवा रहे हैं, वे अपना तथा साहित्य दोनों का अहित कर रहे हैं । लघुकथा एक तेजस्वी विधा है जो दोहे की तरह सीधे मन में उतरती है और पाठक को विह्वल करती है । यह विधा बच्चों के लिए नहीं है । यह दीपक की लौ के समान है, जिसे यदि कोई बच्चा छुएगा तो अपनी उँगली जला लेगा । जब तक दीपक की लौ के समान स्वयं जलेगा नहीं, तब तक वह सशक्त लघुकथाकार नहीं हो सकता । लघुकथा की सिद्धि हिंदी में ऐसी घटनाएँ कम ही हुई है, जब कोई विधा अपने समय में इतनी महत्वपूर्ण हो गई हो । लघुकथा हमारे वर्तमान जीवन का अंग बन गई है और इसलिए साहित्य में भी उसकी स्थिति अनिवार्य-जैसी बन गई है । आज के साहित्यिक जीवन में लघुकथा की इस लोकप्रियता के मूल में कई कारण हैं । एक तो यह कि आज पाठक के पास लंबे उपन्यास एवं लंबी कहानियों के पढ़ने का समय और धैर्य ही नहीं है, अतः वह कथा-कुल की सबसे छोटी विधा लघुकथा को पढ़ना आसान समझता है । जीवन के छोटे-छोटे सत्य अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे अधिकांश जनता को उद्वेलित किये हुए हैं । जो विधा देश की अधिकांश जनका की धड़कनों, तनावों, द्वंद्वों, संघर्षों, विवशतों, आकांक्षाओं, स्वप्नों को वाणी दे, उसकी अनिवार्यता को खंडित करने का साहस कौन कर सकता है । अनिवार्यता इसलिए भी कि, क्योंकि उसमें जीवन के रंग-बिरंगे रंग हैं, बहुआयामी जीवन के चित्र हैं, मनुष्य और अन्य जीवों, भावनाओं को पात्र बनाकर जीवन को अंकित करने की क्षमता भी है तथा पाठक को जीवन से सीधे जोड़ती है । लघुकथा में लेखक का वैसा हस्तक्षेप नहीं है जैसा कि उपन्यास और कहानी में है, अतः इसमें लघुकथा और जीवन के बीच किसी और की सत्ता नहीं होती । इस अर्थ में लघुकथा लेखक-विहीन विधा है कि रचना में उसकी उपस्थिति कला को खंडित करती है, उसे बोझिल बनाती है तथा पाठक और रचना के बीच व्यवधान बनती है ।
लघुकथा कोई आसान विधा नहीं है । इसमें लघु प्रसंग अथवा क्षण को शब्दों में मूर्तिमान करना दीर्घ अभ्यास एवं प्रतिभा से ही संभव है ।
(* -प्रेमचंद विशेषज्ञ के रूप में विख्यात और प्रतिष्ठित आलोचक कमल किशोर गोयनका इधर लघुकथा के व्याकरण रचने के लिए भी जाने जाते हैं । हमने पाठकों के लिए विशेष तौर पर उनके द्वारा समय-समय पर दिये गये वक्तव्यों, साक्षात्कारों, और उनके विचारों को समेट कर उन्हें एक लेख का रूप देने का प्रयास किया है ताकि हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा - लघुकथा - की आत्मा को समझा जा सके । - संपादक )
oकमल किशोर गोयनका ए - 98, अशोक विहार, फेज़ प्रथम दिल्ली - 110052
|
|||||||||||
|
|
|
|
|||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|||||||||||
|
|||||||||||